भारतीय संस्कृति में नारीत्व को हमेशा जीवन के सबसे शक्तिशाली आयाम के रूप में दर्शाया गया है. आपने कैलेंडर आर्ट में भी देखा होगा कि काली, शिव की छाती पर खड़ी हैं, जो वहां मृत अवस्था में लेटे हुए हैं. यह इस बात को दर्शाता है कि जब तक नारीत्व का संचार न हो, तब तक पौरुष निर्जीव रहता है. 'शक्ति' का अर्थ है ऊर्जा. जो ऊर्जा परमाणु को क्रियाशील बनाती है, वही ऊर्जा पूरे ब्रह्मांड को भी चलाती है। और इस ऊर्जा को हमेशा स्त्रैण के रूप में पहचाना गया है.
देवी के मूलतः दो आयाम हैं. पारंपरिक रूप से इन्हें काली और गौरी कहा जाता है, एक जो गहरे रंग की हैं और दूसरी जो गोरे रंग की हैं. यहां बात केवल रंग की नहीं हो रही है. भारतीय भाषाओं में 'राग' शब्द का अर्थ रंग होता है, लेकिन इसका इस्तेमाल किसी चीज के 'भाव' को बताने के लिए भी किया जाता है, न कि केवल रंग के संदर्भ में. भारतीय शास्त्रीय संगीत में, धुन को 'राग' कहा जाता है क्योंकि यह संगीत का एक विशेष भाव होता है. यदि आप कोई विशेष भाव पैदा करते हैं, तो वह आपके मन में एक खास तरह की छवि और रंग पैदा करेगा.
कालापन और गोरापन, न तो त्वचा के रंग से जुड़े हैं और न ही अच्छे या बुरे से. कालापन और गोरापन अस्तित्व के दो अलग-अलग आयाम के रूप में देखे जाते हैं- दुनिया में चीजों के होने के लिए इन दोनों की जरूरत होती है. काली, जो सांवले रूप में हैं, उग्र हैं। गौरी, जो गोरे रूप में हैं, सौम्य हैं. सौम्य रूपों को आमतौर पर मंदिर के मुख्य देवता के साथी के रूप में पूजा जाता है.
जहां शिव हैं, वहां उनके साथ गौरी भी होती हैं. शिव मुख्य शक्ति हैं, और गौरी उनके साथ एक साथी के रूप में हैं, क्योंकि वे सौम्य और सभ्य स्त्री हैं, लेकिन काली हमेशा अकेली होती हैं, उनके साथ कोई पुरुष रूप नहीं होता.वे अपने आप में ही पूर्ण शक्ति हैं.
लिंग भैरवीः ज्यामिति की दृष्टि से देखें तो, लिंग भैरवी साढ़े तीन चक्रों से बनी हैं. चूंकि वह काली हैं, तो वह शरीर के निचले आधे हिस्से- मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर और अनाहत के आधे हिस्से को समाहित करती हैं. ये तीन पूरे चक्र मुख्य रूप से खुशहाली, स्वास्थ्य और समृद्धि से जुड़े हैं. आधा चक्र अनाहत परे जाने से संबंधित है. यदि आप इस पहलू से जुड़ते हैं, तो परे की ओर बढ़ते हैं.
भैरवी के पास केवल आधा हृदय है, तो उनसे प्रेम की अपेक्षा न रखें. वह प्रेम करने में सक्षम नहीं हैं, लेकिन उनमें अपार करुणा और शक्ति है. वह आपके जीवन को जबरदस्त तरीके से उन्नत बनाने की क्षमता रखती हैं. उनके संपर्क में आने के कुछ ही दिनों के भीतर, उनकी ऊर्जाएँ आपको आपके वर्तमान स्तर से कहीं ऊपर उठा सकती हैं, अनुभव के स्तर और बाकी दुनिया के संबंध के स्तर, दोनों पर.
लिंग भैरवी, दिव्य नारीत्व का एक अनोखा, जीवंत और दुर्लभ रूप हैं, जिन्हें एक लिंग के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है. आमतौर पर लिंग पौरुष का प्रतीक माना जाता है, लेकिन यह 'लिंग भैरवी' हैं. 'भैरवी' शब्द का अर्थ नारी से जुड़ा है. ‘स्त्रैण-लिंग’ सुनने में शायद तार्किक रूप से गलत लगे, लेकिन पहले भी कुछ ऐसे स्त्रैण-लिंग मौजूद रहे हैं.
स्त्री ऊर्जा को लिंग के रूप में पूजना बहुत दुर्लभ है। बहुत ही एकांत स्थितियों में, कुछ छोटे मंदिर रहे हैं, लेकिन सार्वजनिक स्थानों पर ऐसा नहीं देखा गया. ऐसा शायद पहली बार है जब हमने एक ऐसा स्थान बनाया है जो आम जनता के लिए खुला है और जिसे बिल्कुल अलग तरीके से संचालित किया जाता है. तो, क्या ये रूप केवल सौंदर्यपरक, सांस्कृतिक या दार्शनिक हैं? इसके पीछे कोई दर्शन नहीं है- यह ज्यामिति की कला है. पूर्वी कलाओं का उद्देश्य अस्तित्व की ज्यामिति के साथ समरूपता प्राप्त करना है. भारतीय कला प्रकृति के भौतिक रूप की नकल नहीं है, बल्कि उसकी मूल ज्यामिति की अभिव्यक्ति है, यानी वह अपने भीतर कैसे बनी है.
जब बाहरी रूप की बात आती है, तो हम हाथ या पैर को केवल सुंदर आकार देने पर बहुत अधिक ध्यान नहीं देते. महत्वपूर्ण यह है कि वह रूप आप पर क्या प्रभाव डालता है. -इसमें एक ज्यामितीय पैटर्न और पूर्णता होनी चाहिए.
लिंग भैरवी उग्र और अत्यंत तीव्र हैं, लेकिन साथ ही वे परम करुणामयी हैं. किसी प्राणी में ये गुण एक-दूसरे के विरोधी नहीं होते. ये सभी एक साथ मौजूद हो सकते हैं. उनकी उग्रता का अर्थ क्रूरता या जीवन के प्रति कोई नकारात्मक दृष्टिकोण नहीं है. वे अपने जुनून में उग्र हैं. वे अपनी करुणा में भी अत्यंत उग्र हैं. जीवन ऐसा ही होता है, और लिंग भैरवी बस विशुद्ध जीवन हैं. जीवन अपनी प्रचंडता और सर्वोच्च संभावना में, लेकिन अनियंत्रित. यदि आप भैरवी को अपने जीवन में सर्वोच्च सत्ता मानते हैं, तो वे आपके लिए स्वास्थ्य, खुशहाली, समृद्धि और सफलता के ऐसे आयाम खोल सकती हैं, जिनके संभव होने बारे में आपने कभी सोचा नहीं होगा. उनके साथ होने पर, जीवन कठिन संघर्ष नहीं रह जाता. जिसे भैरवी की कृपा प्राप्त होती है, उसे जीवन या मृत्यु, गरीबी या असफलता की कोई चिंता या भय नहीं रहता, क्योंकि वे व्यक्ति के जीवन को सांसारिक और आध्यात्मिक, दोनों आयामों में समृद्ध बनाती हैं.