भारत के राजनीतिक दल क्रेडिबिलिटी के भारी संकट से जूझ रहे हैं, और इसके जिम्मेदार वे खुद ही हैं. थोड़ा-बहुत कसूर सोशल मीडिया का भी है, जो न कुछ भूलता है और न आसानी से माफ करता है. लेकिन ज्यादातर नाकामी उनकी अपनी है, और वो है सही काम न करने की आदत. इस जड़ता ने उन्हें सतही, पक्षपाती और ऐसे कामों की ओर धकेल दिया जिसका जनहित से कोई लेना-देना नहीं.
राजनीति हमेशा से हमाम रही है और हमाम में सब नंगे हैं, इसलिए एक-दूसरे पर उंगली उठाने से कोई बेवकूफ नहीं बनता. असली नुकसान यह हुआ है कि जब कोई पार्टी राष्ट्रीय हित का जायज मुद्दा भी उठाती है, तो हर कोई यही मान लेता है कि इसके पीछे कोई संकीर्ण राजनीतिक खेल है. भेड़िया आया, भेड़िया आया चिल्लाने की यही असली कीमत है. जिस दिन सच में भेड़िया आता है, पूरा गांव घरों के अंदर ही रहता है.
इनकी छात्र इकाइयां तो और भी बदतर हैं. वे अपने मातृ-संगठनों के नेताओं की हूबहू नकल करती हैं. पूरे लश्कर और काफिले के साथ. दिल्ली यूनिवर्सिटी के पिछले चुनाव की रैली रोल्स रॉयस, बेंटले और फेरारी के काफिले में आई थी.
दिल्ली हाईकोर्ट ने वीडियो देखकर कहा था कि उसने इनमें से कुछ गाड़ियों के तो नाम तक नहीं सुने हैं और उसे समझ नहीं आ रहा कि छात्रों के पास इतना पैसा आ कहां से रहा है. उस काफिले में तो सर्वशक्तिमान थार भी एक आम आदमी की खटारा गाड़ी जैसी लग रही थी.
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यह सब तब हो रहा है जब देश का आम मध्यमवर्गीय वाहन चालक E20 पेट्रोल से फ्यूल इंजेक्टर और इंजन खराब होने पर रो रहा है, और उससे मुस्कुराकर कहा जा रहा है कि माइलेज का जो नुकसान हो रहा है वो मामूली है, इस पर रोने की जरूरत नहीं है. इससे सबक यही मिलता है कि रोल्स रॉयस में बैठे लड़के ही गंभीर लोग हैं. आप और आपका फ्यूल इंजेक्टर गंभीर नहीं हैं.
हमारी राजनीतिक पार्टियों के लिए मेरे पास एक मुफ्त का विचार है. क्योंकि मुफ्त बातों की ही वे आज भी इज्जत करते हैं. हर पार्टी को अपने खुद के एक ‘आंदोलन विंग’ की जरूरत है. जाहिर है, अपने नाम पर नहीं. उसे एक ‘स्पेशल पर्पस व्हीकल’ चाहिए. एक ऐसी गुमनाम सी छोटी दुकान जिसे वह किसी प्रदर्शन में ले जाकर खड़ा कर सके, बैरिकेड पर छोड़कर खुद सीटी बजाते हुए आगे निकल सके.
सीमित जिम्मेदारी, बेनामी बॉयज़. जमीर के लिए एक शेल कंपनी. और इसकी जरूरत इसलिए है, क्योंकि लोग अब उन्हें संजीदा प्लेयर मानना बंद कर चुके हैं. वे सिर्फ राजनीतिक खिलाड़ी बनकर रह गए हैं, और युवाओं के शब्दकोश में ‘राजनीति’ एक गाली है. बैरिकेड तोड़ने, आवाज का डेसिबल बढ़ाने और किसी प्रदर्शन को आज के दौर के सुरों के साथ मिलाने के लिए आपको युवाओं की ही जरूरत होती है.
भारतीय राजनीति एक फलता-फूलता धंधा है, और 'अच्छा वक्त कमजोर लोग पैदा करता है, और कमजोर लोग बुरा वक्त लाते हैं.' बुरा वक्त आ चुका है. इस सब की जड़ में उनका आलस है. रास्ते में कहीं पार्टियों ने यह तय कर लिया कि आंदोलन खड़ा करना तो बहुत मेहनत का काम है, इससे तो बहुत आसान है कि जनता को आंदोलन बनाने दो और बाद में झंडा और फोटोग्राफर लेकर पहुंच जाओ. इसलिए अब जब वे मार्च निकालते हैं, तो किसी को कोई 'मुद्दा' नजर नहीं आता. लोगों को उसमें 'साज़िश' दिखती है.
गुस्सा भाड़े का लगता है (भीड़ तो खैर होती ही है), आंसू वक्त देखकर बहाए जाते हैं, और पूरी नौटंकी में किसी फिक्स मैच की हल्की सी बदबू आती है, जिसका नतीजा टॉस से पहले ही तय होता है. यही वजह है कि नए आंदोलन इन्हें मंच से दूर रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देते हैं. किसान आंदोलन हो, शाहीन बाग हो, जंतर-मंतर हो या रांची का जयपाल सिंह स्टेडियम -आयोजक मंच की पहरेदारी करते हैं और साफ कह देते हैं कि नेता आ सकते हैं, पार्टी के झंडे नहीं. सीमा पार मत करना. जब कोई आंदोलन आपके समर्थन को 'छुआछूत' या गंदगी मानने लगे, तो इसे अपनी बेइज्जती मत समझिए, इसे अपना परफॉरमेंस रिव्यू मानिए.
स्टूडेंट विंग तो सबसे दर्दनाक नमूना हैं. उन्हें अगली पीढ़ी के नेताओं की पौध तैयार करने के लिए बनाया गया था. वे चुपचाप अगली पीढ़ी के 'सरकारी ठेकेदारों' का वेटिंग रूम बन चुकी हैं. भूखे, जल्दबाज़ी में, और हंसते-हंसते बिकने को तैयार. इसीलिए NSUI, ABVP, यहां तक कि ASAP का रैली निकालना भी अब उनकी मूल पार्टी के मार्च जैसा ही दिखने लगा है.
और इसीलिए CJP की जरूरत है. मैं इस घिसे-पिटे आरोप से थक चुका हूं कि यह फैंसी ड्रेस में AAP का ही एक विंग है. यह बात सिर्फ इसलिए उड़ाई गई क्योंकि इसके संस्थापक ने कभी AAP के साथ थोड़ा वक्त बिताया था. हो सकता है यह हो. हो सकता है न हो. अगर हो भी, तो जलन कोई रणनीति नहीं होती.
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याद रखिए कि इस आंदोलन ने असल में क्या करके दिखाया. इसने एक जज के ताने को पकड़ा, उस बेइज्जती को अपने नाम का तमगा बनाया, खुद को आलसियों और बेरोजगारों की आवाज कहा, और फिर सिर्फ एक लीक हुए एग्जाम पेपर पर इंस्टाग्राम पर लाखों लोगों को अपने पीछे खड़ा कर लिया. उतने तो बीजेपी या कांग्रेस मिलकर भी नहीं जुटा पातीं. एक मजाक ने प्रोफेशनल रणनीतिकारों को मात दे दी.
इसलिए अपनी CJP दबे पांव फंड कीजिए, थोड़ी दूरी बनाकर चलाइए, और उस दिन के लिए इसमें ईंधन भरकर रखिए जब कोई खास काम निपटाना हो और अपनी फिंगरप्रिंट छोड़ना असहज लगे. हमेशा यह पूछने के बजाय कि दूसरे के पास पैसा कहां से आ रहा है, एक बार के लिए अपना खुद का थोड़ा-बहुत पैसा खर्च कीजिए. उन युवाओं को खाना खिलाइए जो आज भी मानते हैं कि काम का मूल्य उसके कमीशन से ज्यादा है.
इस सारी जमा-पूंजी का फायदा ही क्या, अगर उसमें से कुछ हिस्सा उस समाज को वापस न लौटाया जाए जिसने यह सब आपको सौंपा है? अगले चुनाव पर होने वाले फूहड़ खर्चों के अलावा भी कुछ चीज़ें हैं जो फंडिंग के लायक हैं. वैसे, अगर समझदारी से निवेश किया जाए, तो यह तरीका चुनाव के बहुत सारे खर्चे बचा भी देगा.
चलिए यह नाटक न करें कि यह 'सिद्धांत' या नैतिक नियमों से जुड़ा है. हमारे राजनीतिक ड्रामे में नैतिकता हमेशा से दिखावे से कहीं ज्यादा बदतर रही है, और परफॉरमेंस ही इकलौती चीज है जो भरोसेमंद तरीके से जीत दिलाती है. इसलिए परफॉरमेंस वाला नाटक भी उसके साथ जीत जाता है. यह सबसे सस्ती कीमत पर किसी और की मुसीबत को खरीदने की कला है.
एक हैशटैग, एक दिन का मार्च, और सबसे सस्ता तरीका- उधार का आंदोलन, जो आपका ब्रांड बेदाग रखते हुए किसी और का झंडा लहराता है. क्योंकि अगर आपने खुद वही काम किया, तो आपको 'राजनीति से प्रेरित' कहकर खारिज कर दिया जाएगा. आपके गुस्से पर एक राजनीतिक झंडा और एक पक्षपाती रंग चिपका हुआ है.
इसलिए गुस्से को किराये पर ले लीजिए, क्योंकि आपका अपना गुस्सा तो अब ऑथेंटिक नहीं रहा. बस इतना याद रखिए कि लोग आज भी फर्क पहचान सकते हैं उस पार्टी में जो समस्या सुलझाने आती है, और उसमें जो सिर्फ उसके बगल में खड़े होकर फोटो खिंचवाने आती है. उन्होंने बस यह बात जोर से कहना बंद कर दिया है, जो कि और भी बुरी खबर है, क्योंकि जो वोटर अब आपसे शिकायत करने का तकल्लुफ भी नहीं उठाता, उसने आमतौर पर आपसे किसी भी चीज की उम्मीद करना पूरी तरह छोड़ दिया है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)