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फॉर्म 6 पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के मायने क्या हैं, और क्या चुनाव आयोग फंस गया है?

फॉर्म 6 को लेकर मचे घमासान के बीच CJI सूर्यकांत की टिप्पणी और चुनाव आयोग के रुख ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं. मूल फॉर्म 6 में बदलाव के बिना भी इसके साथ घोषणा पत्र की अनिवार्यता पर विवाद गहरा गया है. जानिए आखिर क्या है फॉर्म 6 की पूरी मिस्ट्री, सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या और इसके चलते लाखों मतदाताओं के प्रभावित होने का पूरा गणित.

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फॉर्म 6 को लेकर सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी से चुनाव आयोग के इर्द-गिर्द घमासान शुरू हो गया है.
फॉर्म 6 को लेकर सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी से चुनाव आयोग के इर्द-गिर्द घमासान शुरू हो गया है.

नए मतदाता जोड़ने वाले फॉर्म 6 में किसी तरह बदलाव को मंजूरी देने की बात से चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत के पल्ला झाड़ लेने के बाद सियासी भूचाल आ गया है. पूरा विपक्ष चुनाव आयोग पर टूट पड़ा है, क्योंकि उसने पहले इस बारे में अपनी सफाई में सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी का हवाला दिया था. मंगलवार को राहुल गांधी सहित कई बड़े विपक्षी नेता निर्वाचन भवन की ओर मार्च कर रहे हैं. उधर, कॉकरोच जनता पार्टी भी 10 अक्टूबर को दिल्ली कूच करने की तैयारी कर रही है. इस उठापटक के बीच कई बुनियादी सवाल खड़े होते हैं, जिनको लेकर दूध का दूध, और पानी का पानी करना जरूरी है.

फॉर्म 6 से जुड़े बवाल में आखिर कितनी और किस स्तर की गंभीरता है? क्या चुनाव आयोग ने वाकई को गंभीर अपराध किया है? या, यह सिर्फ एक गफलत और भ्रम के सहारे लड़ी जा रही लड़ाई है? इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में CJI सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी व अन्य की याचिका पर सुनवाई हुई. जब CJI सूर्यकांत के सामने यह दलील पेश की गई कि फॉर्म 6 में बदलाव कर दिए गए हैं, तो उन्होंने साफ तौर पर कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म 6 में किसी भी तरह के बदलाव की कोई मंजूरी नहीं दी है.

सीजेआई का यह बयान तकनीकी और कानूनी रूप से बिल्कुल सटीक है. हकीकत यह है कि चुनाव आयोग ने फॉर्म 6 में मूल रूप से कोई बदलाव किया ही नहीं है. फॉर्म 6 की संरचना और उसके नियम ठीक वैसे ही हैं, जैसे वे पहले थे. अदालत के सामने जब यह दलील रखी गई कि फॉर्म में कोई फेरबदल हुआ है, तो सीजेआई ने उसी दलील को खारिज करते हुए यह स्पष्टीकरण दिया था. इसलिए इस बात में कोई सच्चाई नहीं है कि चुनाव आयोग ने अदालत के रुख से कोई गैर-कानूनी काम किया है.

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सुप्रीम कोर्ट का वो आदेश, और फॉर्म 6 के साथ जुड़ गया घोषणा पत्र

फॉर्म 6 के साथ जोड़े गए घोषणा पत्र की कानूनी वैधता को समझने के लिए मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले और सुनवाई को देखना जरूरी है. इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की विशेष शक्तियों यानी उसकी 'रेजिड्यूरी अथॉरिटी' (Residual Authority) का जिक्र किया था. संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने का पूरा संवैधानिक अधिकार प्राप्त है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि जब विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसी असाधारण प्रक्रिया चलाई जाती है, तो चुनाव प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखने के लिए आयोग के पास अतिरिक्त दिशा-निर्देश और व्यवस्थाएं लागू करने का अधिकार क्षेत्र होता है. आयोग ने इसी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए फॉर्म 6 के साथ एक अलग घोषणा पत्र (Declaration Form) को जोड़ा था. सुप्रीम कोर्ट ने आयोग की इस प्रक्रिया और अधिकार को जायज ठहराया था.

घोषणा पत्र जोड़ने की मंशा में क्या खोट था?

चुनाव आयोग द्वारा फॉर्म 6 के साथ घोषणापत्र संलग्न करने के पीछे की मंशा को लेकर भी कई सवाल उठाए गए. आयोग का रुख यह रहा है कि इसका मकसद सिर्फ यह सुनिश्चित करना था कि नई वोटर लिस्ट में केवल वैध और पात्र नागरिक ही शामिल हो सकें. दो दशकों से अधिक समय बाद हो रहे SIR के कारण मतदाता सूची में फर्जी या डबल एंट्री को रोकने के लिए यह कदम उठाया गया था. इस घोषणा पत्र में कोई कठिन शर्त नहीं थी, बल्कि आवेदक को केवल अपने माता-पिता के नाम और उनकी मतदाता सूची से जुड़ी सामान्य जानकारी देनी थी, ताकि उनकी वंशावली और प्रामाणिकता की पुष्टि हो सके.

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इसी बीच ऐसी खबरें भी आईं कि इस व्यवस्था को लागू करने को लेकर चुनाव आयुक्तों के बीच आपस में तकरार या असहमति थी. हालांकि, इस पर चुनाव आयोग ने स्थिति साफ करते हुए स्पष्टीकरण दिया कि आयोग में निर्णय प्रक्रिया पूरी तरह लोकतांत्रिक है और फॉर्म 6 के साथ घोषणा पत्र लागू करने का फैसला सभी चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से ही लिया गया था.

दावों का सच: कौन सही और कौन गलत?

यदि इस पूरे विवाद का निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए, तो दोनों पक्षों के बयानों का अपना कानूनी और प्रशासनिक संदर्भ है. एक तरफ यह बात पूरी तरह सच है कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म 6 में किसी बदलाव की अनुमति नहीं दी थी, क्योंकि खुद फॉर्म 6 में आयोग ने कोई कानूनी या ढांचागत बदलाव किया ही नहीं था.

वहीं दूसरी तरफ, चुनाव आयोग का यह दावा भी अपनी जगह बिल्कुल सही है कि फॉर्म 6 के साथ संलग्न किए जाने वाले अतिरिक्त घोषणा पत्र को सुप्रीम कोर्ट ने जायज ठहराया था. अदालत ने माना था कि एसआईआर (SIR) जैसी विशेष और गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के संचालन के लिए ऐसा घोषणा पत्र मांगना आयोग के कानूनी और संवैधानिक अधिकार क्षेत्र के भीतर आता है. इसलिए दोनों ही बातें अपने-अपने संदर्भ में सही हैं और इनमें कोई परस्पर विरोधाभास नहीं है.

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सबसे बड़ा पेंच: क्या इस व्यवस्था से मतदाता वंचित रह गए?

तमाम कानूनी तर्कों और अदालती फैसलों के बावजूद, इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा व्यावहारिक और चिंताजनक पेंच यहीं आकर फंसता है. सवाल अब इस बात पर बना हुआ है कि क्या चुनाव आयोग द्वारा डिजिटल प्लेटफॉर्म ECInet और फॉर्म 6 के साथ इस घोषणा पत्र को 'अनिवार्य' (Mandatory) बनाना एक प्रशासनिक चूक या गलती साबित हुआ?

आंकड़े और जमीनी शिकायतें यह इशारा करती हैं कि इस घोषणा पत्र की जटिलताओं और उसमें मांगी गई जानकारियों को न भर पाने के कारण बड़ी संख्या में आम और ग्रामीण लोग नए मतदाता बनने की प्रक्रिया से बाहर रह गए या वंचित हो गए.

भले ही यह व्यवस्था कागजों पर मतदाता सूची को शुद्ध करने की मंशा से बनाई गई थी, लेकिन इसकी अनिवार्यता ने एक व्यावहारिक अड़चन खड़ी कर दी. अब मुख्य बहस इसी बिंदु पर सिमट गई है कि क्या चुनाव आयोग का यह सख्त कदम जमीनी स्तर पर सही साबित हुआ या फिर इसके कारण देश के कई वैध नागरिक बिना किसी गलती के वोटर बनने के अपने अधिकार से वंचित रह गए.

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