सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रही सुनवाई में एकनाथ शिंदे गुट ने अपनी दावेदारी के पक्ष में कई तर्क दिए हैं. शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एन.के. कोल ने दलीलें रखी.
कौल ने कहा कि चुनाव आयोग ने सभी जरूरी पहलुओं और संभावित परीक्षणों को ध्यान में रखते हुए अपना फैसला लिया था. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने SIR मामलों में भी माना है कि चुनाव आयोग को चुनाव से जुड़ी प्रक्रिया तय करने की शक्ति हासिल है. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग यह तय नहीं कर रहा कि कोई व्यक्ति कौन सा पद संभाल सकता है. आयोग ने सिर्फ यह तय किया कि किस आधार या परीक्षण के जरिए किसी राजनीतिक दल पर फैसला किया जाएगा.
कौल ने कहा कि चुनाव चिह्न आदेश में आरक्षित और मुक्त चुनाव चिह्न का प्रावधान है. आरक्षित चुनाव चिह्न सिर्फ जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को दिए जाते हैं. किसी पार्टी को राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय पार्टी का दर्जा उसके वोट प्रतिशत और किन राज्यों में उसने चुनाव लड़ा है, इस आधार पर मिलता है.
उन्होंने कहा कि आरक्षित चुनाव चिह्न एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संपत्ति है, क्योंकि मतदाता किसी पार्टी को उसके चुनाव चिह्न से पहचानते हैं. कौल ने कहा कि पार्टी में विभाजन होने पर चुनाव आयोग के सामने दो मुख्य विकल्प होते हैं. पहला, किसी एक गुट को वास्तविक राजनीतिक दल मानना और उसे पार्टी का आरक्षित चुनाव चिह्न देना. दूसरा, यह तय करना कि पार्टी में ऐसा कोई विभाजन हुआ ही नहीं है.
उन्होंने कहा कि जब तक यह तय नहीं होता कि कौन सा गुट असली राजनीतिक दल है, तब तक दोनों पक्षों को अंतरिम चुनाव चिह्न दे सकता है. बाद में जिस गुट को वास्तविक राजनीतिक दल माना जाएगा, आरक्षित चुनाव चिह्न उसी गुट को मिलेगा.
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कौल ने कहा कि यह तर्क सही नहीं है कि जब तक विधायकों की अयोग्यता पर फैसला नहीं हो जाता, तब तक चुनाव आयोग चुनाव चिह्न को लेकर फैसला नहीं कर सकता.
उन्होंने सुभाष देसाई और सादिक अली मामलों का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव आयोग को यह करने का अधिकार है कि किसी विवाद में कौन सा परीक्षण इस्तेमाल किया जाए. राजनीतिक दल अपने परीक्षण सुझा सकते हैं लेकिन विधायी बहुमत भी एक वैध परीक्षण हो सकता है.
उन्होंने कहा कि अगर अयोग्यता की कार्यवाही पूरी होने तक चुनाव आयोग की प्रक्रिया रोक दी जाए तो मामला तो मामला अनिश्चित समय तक लटक सकता है. क्योंकि स्पीकर का फैसला आने में समय लग सकता है और उसके खिलाफ अपील भी हो सकती है. कौल ने कहा कि इस दौरान अगर कोई राजनीतिक दल चुनाव ही नहीं लड़ पाएगा तो पार्टी के अस्तित्व पर भी असर पड़ सकता है.
उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी पार्टी को लंबे समय तक अंतरिम चुनाव चिह्न इस्तेमाल करना पड़े तो मतदाताओं के बीच पुराने चुनाव चिह्न के साथ पार्टी का जुड़ाव कमजोर हो सकता है. इसलिए चुनाव आयोग के फैसले में अनिश्चितकाल तक देरी नहीं की जा सकती.