हाल ही में जब छात्रों के डिजिटल आंदोलन के दबाव में आकर सरकार को शिक्षा मंत्री का इस्तीफा तक स्वीकार करना पड़ा, तो यह साफ हो गया कि सोशल मीडिया की आवाजें सिर्फ इंटरनेट का ट्रेंड नहीं हैं. अब X और इंस्टाग्राम की रील से निकले दो नए मुद्दे मोदी सरकार के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं. ये मुद्दे हैं- ‘E10 लाओ’ और ‘आरक्षण हटाओ’. ये दोनों मामले अलग-अलग मोर्चों पर सरकार के लिए नया राजनीतिक सिरदर्द बनते दिख रहे हैं.
सोशल मीडिया एक्टिविटी को देखें तो एक तरफ E20 पेट्रोल का विरोध तेजी से बढ़ रहा है. सरकार ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने का नियम लागू किया है, लेकिन कार और बाइक चलाने वाले मिडिल क्लास का दावा है कि इससे गाड़ियों के इंजन खराब हो रहे हैं, माइलेज कम हो रहा है और मेंटेनेंस का खर्चा बढ़ गया है. जिसे बीजेपी के सोशल मीडिया हैंडल्स और मंत्री नितिन गडकरी सिरे से खारिज करते हैं. इंस्टाग्राम और X पर ‘E10 लाओ’ और 'say no to E20', ‘E20 जनता पार्टी’ जैसी मुहिम के जरिए लोग गुस्सा जाहिर कर रहे हैं. टीम भारत के नाम से इस मुद्दे पर कैंपेन चला रहे लोगों को बुधवार को पेट्रोलियम मंत्रालय ने संवाद के लिए बुलाया था. जिसमें एक प्रमुख मांग यह रखी गई कि पुरानी गाड़ी चला रहे लोगों को E10 पेट्रोल उपलब्ध करवाया जाए. और E20 पेट्रोल की कीमत 20 फीसदी कम की जाए. कई ऑटो ब्लॉगर्स और विपक्षी पार्टियां, खासकर आम आदमी पार्टी इस मुद्दे पर वीडियो बनाकर पॉलिसी पर सवाल उठा रही हैं.
दूसरी तरफ इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ नाम का कैंपेन उभरा है. इंस्टाग्राम पर इसी नाम से बने अकाउंट को करीब 60 लोग फॉलो कर रहे हैं. अजीत भारती और अनुराधा तिवारी जैसे डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स इस मुहिम को हवा दे रहे हैं. इसके अलावा न्यूज चैनलों पर आनंद रंगनाथन और हर्ष दुबे जैसे लोग इस नैरेटिव को आगे बढ़ा रहे हैं. इस आंदोलन का तरीका पारंपरिक धरने से अलग है. यह समर्थकों से कह रहा है कि वे सड़कों पर उतरने के बजाय प्रधानमंत्री और मंत्रियों के सोशल मीडिया कमेंट सेक्शन को आरक्षण विरोधी मैसेजों से भर दें ताकि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का सिस्टम हिल जाए.
कितनी बड़ी आबादी, यानी कितने वोटर पर असर
इन दोनों मुद्दों की सबसे खास बात यह है कि ये किसी छोटे समूह के नहीं, बल्कि देश की एक बड़ी आबादी से जुड़े मामले हैं. E20 पेट्रोल के विरोध का असर देश के करीब 20 से 25 करोड़ दोपहिया और चार-पहिया वाहन मालिकों पर पड़ रहा है. एक आंकलन के मुताबिक देश की सड़कों पर 75 फीसदी से ज्यादा वाहन 2023 से पहले खरीदे गए हैं, जिन्हें E20 ’नॉन-कंप्लायंट’ यानी ये E20 नहीं, E10 के अनुकूल हैं. यानी, इस बदलाव की पीड़ित कम्युनिटी देश का कोर मिडिल क्लास वोटर है, जिसे अपनी गाड़ी खतरे में दिख रही है. वहीं आरक्षण विरोधी मुहिम देश की लगभग 30 फीसदी सामान्य वर्ग की आबादी, विशेषकर युवाओं को प्रभावित करती है. सामान्य वर्ग का युवा नौकरियों और परीक्षाओं के कट-ऑफ से हताश होकर इस मुहिम से जुड़ रहा है. हालांकि, आरक्षण पर किसी भी तरह की आंच आने से बहुसंख्यक दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग में भारी गुस्सा फैल सकता है, जो इस मुद्दे को बेहद संवेदनशील बना देता है.
सरकार की नींद क्यों उड़ी हुई है
इन दोनों मामलों में सरकार और भारतीय जनता पार्टी का रुख अलग-अलग रणनीतियों को दर्शाता है. E20 पेट्रोल पर पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय को बार-बार सामने आकर सोशल मीडिया के दावों को भ्रामक बताना पड़ रहा है. सरकार का कहना है कि इथेनॉल से माइलेज में बेहद मामूली कमी आती है और यह इंजन के लिए सुरक्षित है, लेकिन वाहन चालकों का असंतोष थमता नजर नहीं आ रहा. दूसरी ओर आरक्षण के मुद्दे पर बीजेपी की मजबूरी भरी चुप्पी साफ दिखाई देती है. आरक्षण इतना संवेदनशील विषय है कि बीजेपी के आधिकारिक हैंडल और बड़े नेता इस ट्रेंड पर पूरी तरह मौन हैं. पार्टी जानती है कि आरक्षण के खिलाफ कुछ भी बोलने से विपक्ष को दलित और पिछड़ा विरोधी नैरेटिव बनाने का मौका मिल जाएगा. इसलिए सरकार सोशल मीडिया पर माहौल बिगड़ने से रोकने के लिए आपत्तिजनक पोस्ट करने वाले अकाउंट्स पर कानूनी कार्रवाई का रुख अपना रही है.
विधानसभा चुनावों को लेकर डर
आने वाले विधानसभा चुनावों के लिहाज से यह दोतरफा माहौल बीजेपी के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकता है. शहरी और मध्यम वर्ग हमेशा से बीजेपी का सबसे मजबूत वोट बैंक रहा है. यदि E20 पेट्रोल से परेशान मध्यम वर्ग और नौकरियों के अवसर को लेकर हताश सामान्य वर्ग का युवा छिटकता है, तो चुनावी गणित बिगड़ सकता है. इसके साथ ही यदि आरक्षण हटाओ का शोर बढ़ता है, तो विपक्षी दल इसे राजनीतिक हथियार बनाकर दलित और पिछड़े वोट बैंक को बीजेपी के खिलाफ लामबंद कर लेंगे. पार्टी न तो इस मुहिम का समर्थन कर सकती है और न ही अपने कोर युवा वोटर को खुलकर नकार सकती है, जो उसे राजनीतिक धर्मसंकट में डालता है.
छात्र आंदोलन (CJP) के सामने सरकार के झुकने के बाद इन दोनों मुद्दों को नजरअंदाज करना बीजेपी के लिए कतई सुरक्षित नहीं होगा. CJP आंदोलन ने यह साबित कर दिया है कि यदि युवा वर्ग किसी मुद्दे पर एकजुट होकर डिजिटल स्पेस पर हावी हो जाए, तो वह सरकार को अपनी बात मानने पर मजबूर कर सकता है. उस सफलता के बाद अब E10 लाओ और आरक्षण हटाओ जैसे अभियानों को चलाने वाले समूहों को भी लगता है कि वे सोशल मीडिया के जरिए सरकार पर दबाव बना सकते हैं. ऐसे में अगर सरकार ने E20 पेट्रोल पर लोगों की व्यावहारिक चिंताओं को सिर्फ अफवाह बताकर टाल दिया या आरक्षण पर युवाओं की हताशा को संवाद से नहीं सुलझाया, तो यह असंतोष चुनावों से ठीक पहले एक बड़े राजनीतिक तूफान का रूप ले सकता है.