डीके शिवकुमार कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री होंगे. डीके शिवकुमार के नाम का प्रस्ताव निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने ही रखा. देखते ही देखते डीके शिवकुमार के आवास के बाहर हलचल बढ़ गई है. वहां बैरिकेडिंग की जा रही है और पुलिस बल की संख्या भी बढ़ा दी गई है.
ये सब उस ब्रेकफास्ट मीटिंग के बाद हुआ जिसमें इडली, वड़ा और चौ-चौ बाथ परोसे गए थे. नाश्ते के बाद का माहौल काफी इमोशनल हो गया जब डीके शिवकुमार की आंखें नम हो गईं. सत्ता के हस्तांतरण की यह प्रक्रिया बड़े ही भावुक माहौल में चल रही थी. डीके शिवकुमार ने सिद्धारमैया के पैर छूकर आशीर्वाद लिए, और फिर दोनों नेता एक दूसरे से गले मिले.
बकरीद के खास मौके पर किसने कुर्बानी दी, और किसने ली, बहस का यह अलग विषय हो सकता है. लेकिन, एक बात तो साफ है - कांग्रेस आलाकमान के निर्देशन में ये सीन क्रिएट करके एकजुटता के संदेश देने की कोशिश तो हुई ही है. सिद्धारमैया को हटाना कांग्रेस नेतृत्व के लिए काफी जोखिमभरा कदम है.
अशोक गहलोत और भूपेश बघेल से अलग मिसाल पेश करते हुए सिद्धारमैया ने हंसते हंसते कांग्रेस आलाकमान के कहने पर कुर्सी तो सौंप दी, लेकिन जाते जाते पिछड़े वर्ग की कास्ट सर्वे रिपोर्ट स्वीकार करके डीके शिवकुमार के लिए चुनौतीपूर्ण टास्क दे दिया है.
1. सिद्धारमैया की विरासत
कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों का खासा दबदबा है. सिद्धारमैया कुरुबा समुदाय से आते हैं, जिसकी वजह से पिछड़े वर्ग के लोगों में उनकी जबरदस्त पकड़ है. डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं, और प्रभावशाली नेता माने जाते हैं. 2023 में कांग्रेस को सत्ता दिलाने का श्रेय भी कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार को ही जाता है, लेकिन मुख्यमंत्री पद की दौड़ में तब सिद्धारमैया सामाजिक समीकरणों और अपनी छवि के कारण भारी पड़े थे.
अपने इस्तीफे की घोषणा से पहले सिद्धारमैया ने कास्ट सर्वे रिपोर्ट स्वीकार करने डीके शिवकुमार के जरिए कांग्रेस नेतृत्व को भी नई चुनौती दे डाली है. देखा जाए तो इस्तीफा देने से पहले कास्ट सर्वे रिपोर्ट स्वीकार करके सिद्धारमैया यह संदेश तो दे ही दिया है कि आखिरी वक्त तक वो अपने उन लोगों के साथ खड़े हैं, जिनकी बदौलत कर्नाटक की राजनीति में उनको मजबूत आधार मिला.
तीन साल सरकार चला चुके सिद्धारमैया को AHINDA (अल्पसंख्यक, पिछड़ा, दलित) का मजबूत चेहरा माना जाता है - आगे के लिए बचे दो साल डीके शिवकुमार के लिए सबको साथ लेकर चलने की चुनौती होगी.
2. जाति सर्वे रिपोर्ट की चुनौती
कर्नाटक में बदलते राजनीतिक घटनाक्रम के बीच पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष मधुसूदन नायक ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को रिपोर्ट सौंप दी. रिपोर्ट काफी पुरानी है, और दो साल पहले इसे लेकर खासा विवाद भी हुआ था. वोक्कालिगा और लिंगायत समुदायों ने रिपोर्ट पर वैसे ही सवाल उठाए थे, जैसे बिहार की जातिगत गणना को कठघरे में खड़ा कर दिया गया था. दोनों समुदायों के नेताओं का आरोप रहा है कि सर्वे पुराना और उसमें वैज्ञानिक रूप से तैयार नहीं किया गया है.
सिद्धारमैया ने पैर छूते वक्त डीके शिवकुमार को जो भी आशीर्वाद दिया हो, लेकिन सर्वे रिपोर्ट स्वीकार करके लोगों को अपना संदेश तो दे ही दिया है. आगे का सिरदर्द डीके शिवकुमार के लिए है. क्योंकि रिपोर्ट पर आगे का फैसला तो नया मुख्यमंत्री ही लेगा, और कैसे अमल करना है ये भी उसे ही तय करना होगा.
वैसे रिपोर्ट को स्वीकार कर लेना अपने आप में काफी नहीं है. क्योंकि, रिपोर्ट स्वीकार कर लेने भर से वह नीति या योजना का रूप नहीं ले सकती. रिपोर्ट को लागू करने के लिए कैबिनेट की मंजूरी जरूरी होगी, और जब तक ऐसा नहीं होता, रिपोर्ट स्वीकार कर लेने का कोई मतलब नहीं है - लेकिन, सिद्धारमैया ने अपनी चाल तो चल ही दी है.
3. संकटमोचक की अग्नि परीक्षा
कर्नाटक की राजनीति में डीके शिवकुमार की ज्यादातर भूमिका संकटमोचक की रही है. आपको याद होगा, जब एचडी कुमारस्वामी कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे और कई विधायकों ने बगावत कर दी थी, तब उनको मनाने भी मुंबई डीके शिवकुमार ही गए थे. सरकार तो नहीं बची, लेकिन डीके शिवकुमार के प्रयासों में कोई कमी नहीं थी.
कर्नाटक के डिप्टी सीएम और कांग्रेस अध्यक्ष होते हुए भी डीके शिवकुमार को ज्यादातर ट्रबलशूटर के रोल में ही पाया गया. अब उसी संकटमोचक को बेहतर प्रशासक के तौर पर साबित करना होगा - और डीके शिवकुमार के लिए यह किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है.
डीके शिवकुमार के सामने सिद्धारमैया की विरासत और सामाजिक समीकरणों को साथ रखने की चुनौती है - और 2028 के विधानसभा चुनावों में सत्ता में वापसी के साथ ही 2029 में राहुल गांधी का हाथ मजबूत करने का टास्क भी मिला है.