झारखंड के दुमका के रहने वाले 30 साल के हिलारियुस पिछले 10 साल से फाइलेरियासिस की बीमारी से पीड़ित हैं. लेकिन आर्थिक तंगी के कारण उसका इलाज नहीं हो पा रहा था. ऐसे में एक व्यक्ति ने उनकी इस स्थिति के बारे में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को सोशल मीडिया के माध्यम से अवगत कराया. इस मामले की जानकारी मिलते ही उन्होंने तुरंत दुमका के डीसी को मरीज का इलाज कराने का आदेश दिया है.
फाइलेरियासिस बीमारी क्या है और कैसे होती है इसके बारे में भी जानना जरूरी है. फाइलेरियासिस परजीवी के कारण होती है. मच्छरों के जरिए यह इंसानों में फैलती है. जब फाइलेरियासिस से संक्रमित मच्छर किसी व्यक्ति को काटता है तो उसको यह बीमारी होती है. इसमें मच्छर व्यक्ति की स्किन के नीचे बहुत छोटे पैरासाइट लार्वा छोड़ देता है. यह लार्वा फिर आपके लिम्फैटिक सिस्टम में चले जाते हैं, जहां वे बड़े कीड़ों में बदल जाते हैं और प्रजनन करते हैं. इससे यह उस हिस्से में रुकावट पैदा करते हैं. जिस हिस्से में यह पनपते रहते हैं वहां धीरे- धीरे सूजन आती है. अगर समय पर इसका इलाज न हो तो सूजन बढ़ती ही रहती है. अधिकतर मामलों में इसका असर पैरों पर देखा जाता है.
हाथीपांव नाम से जानी जाती है ये बीमारी
दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज एंड एसोसिएट हॉस्पिटल में चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एल. एच घोटेकर ने इस बीमारी के बारे में बताया है. वह कहते हैं कि फाइलेरियासिस की बीमारी को आम भाषा में हाथीपांव भी कहा जाता है. भारत के कुछ इलाकों जैसे बिहार, झारखंड में यह आम है. संक्रमित मच्छर जब किसी व्यक्ति को काट लेता है तो यह बीमारी हो जाती है, हालांकि आमतौर पर मच्छर के एक बार काटने से फाइलेरिया नहीं होता है. यह तब होता है जब संक्रमित मच्छर किसी व्यक्ति को कई बार काटे. यानी जिन इलाकों में इस बीमारी से संक्रमित मच्छर ज्यादा होते हैं वहां के लोगों को इसका खतरा अधिक होता है.
डॉ घोटेकर बताते हैं कि भारत सरकार की ओर से फाइलेरिया से बचाव के लिए विशेष अभियान चलाए जाते हैं, जिसके तहत साल में एक बार बचाव की दवा मुफ्त पिलाई जाती है. प्रभावित क्षेत्रों के सभी नागरिकों को यह दवा जरूर लेनी चाहिए.
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फाइलेरियासिस के आम लक्षण क्या होते हैं
हाथ-पैर और जननांगों में गंभीर और दर्दनाक सूजन
बार-बार संक्रमण
तेज़ बुखार
कंपकंपी होती है
गंभीर खुजली होना
स्किन का रंग बदलना
कैसे होता है फाइलेरियासिस बीमारी का इलाज
डॉ घोटेकर बताते हैं कि इसका मुख्य इलाज एंटीपैरासिटिक दवाएं हैं, जैसे कि डायथाइलकार्बामाज़ीन, आइवरमेक्टिन और एल्बेंडाज़ोल. यह दवाएं उन इलाकों में 'मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन' (MDA) कैंपेन के ज़रिए बांटी जाती हैं जहां यह बीमारी आम है. अगर ये बीमारी गंभीर रूप ले लेती है और सालों तक इसका इलाज नहीं होता है तो फिर सर्जरी से इसको ठीक किया जाता है.
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इस बीमारी से बचाव के लिए क्या करें
फुल बाजू के कपड़े पहनें
मच्छरदानी का उपयोग करें
घर के आसपास पानी इकट्ठा न होने दें