बांग्लादेश ने साफ कर दिया है कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान तब तक भारत नहीं जा सकते, जब तक भारत शेख हसीना, उनके सहयोगियों और छात्र नेता उस्मान हादी के कथित हत्यारों का प्रत्यर्पण नहीं करता. बांग्लादेश की ये शर्तें दोनों देशों के बेपटरी रिश्तों की एक बानगीभर है. लेकिन, भारत से किनारा करके बांग्लादेश जो ऑप्शन तलाश रहा है, वह और भी ज्यादा मुसीबत में डालने वाले हैं.
शेख हसीना के कुर्सी से हटते ही ढाका की राजनीति में एक अजीब सा भारत-विरोध देखने को मिला. भारत से अपने सारे रिश्ते-नाते तोड़कर एक नई पहचान बनाने की जो तड़प बांग्लादेश के भीतर उठी थी, वह अब उसी के लिए जी का जंजाल बनती दिख रही है. पहले दो साल तक अंतरिम सरकार की नाव खींचने वाले मोहम्मद यूनुस हों या फिर हाल में फरवरी के चुनाव जीतकर सत्ता के शिखर पर पहुंचे BNP चीफ तारिक रहमान, दोनों के सामने आज सबसे बड़ा संकट यही है कि आखिर मुल्क की गाड़ी को हांककर किस दिशा में ले जाएं? फॉरेन पॉलिसी चौराहे पर आ खड़ी हुई है.
चीन की झोली खुली हुई है, लेकिन उसके हर बड़े ऑफर के पीछे एक खतरनाक जाल बिछा है. अमेरिका और यूरोप के दरवाजे कपड़ों की बिक्री के लिए तो खुले हैं, लेकिन क्या सिर्फ टेक्सटाइल बेचकर पूरा देश चल सकता है? उधर तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब की हवाबाजी से उपजे तथाकथित 'मुस्लिम नाटो' का सपना दिखाया जा रहा है, जिसकी अपनी कोई ठोस बुनियाद ही नहीं है. या फिर इन सबका एक बेमेल घालमेल तैयार कर लिया जाए? सच तो यह है कि भारत से अकारण तल्खी पालकर दुनियाभर में अपने नए ठिकाने तलाशने निकला बांग्लादेश खुद उलझकर रह गया है.
हसीना के गुस्से में अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारता ढाका
शेख हसीना से नाराजगी अपनी जगह हो सकती है, लेकिन उस गुस्से में आकर भारत से दुश्मनी मोल लेना ऐसा ही है जैसे कोई इंसान अपने ही घर की नींव पर कुल्हाड़ी मार ले. बांग्लादेश की अवाम और उसके नए हुक्मरान इस अंधे गुस्से में अपना भला-बुरा तक भूल बैठे हैं. वे उस भारत को आंखें दिखा रहे हैं, जिसने 1971 में अपनी सेना के जवानों का खून बहाकर उन्हें एक आजाद मुल्क का वजूद दिया था.
अगर नक्शा उठाकर देखें तो बांग्लादेश की करीब 94 फीसदी जमीनी सरहद अकेले भारत से लगती है. इसके बावजूद पूरे इतिहास में भारत की तरफ से बांग्लादेश के भीतर कोई घुसपैठ, सीमा विवाद या अंदरूनी गड़बड़ी फैलाने की एक फीसदी कोशिश भी नहीं हुई. भारत ने हमेशा एक बड़े और जिम्मेदार पड़ोसी का फर्ज निभाया है. चाहे बंगाल की खाड़ी में कोई भयानक समुद्री तूफान आए, भीषण बाढ़ की तबाही हो या कोरोना महामारी जैसी इंसानी त्रासदी, भारत हर दुख-सुख में सबसे पहले राशन, दवाई और मदद लेकर बांग्लादेश की सरहद पर खड़ा रहा है.
इतना ही नहीं, आज बांग्लादेश के घरों में जो लाइट जलती हैं और वहां की फैक्ट्रियों के पहिए घूमते हैं, उसके पीछे भारत का दिया हुआ ईंधन और बिजली है. बांग्लादेश की लगभग तमाम ऊर्जा जरूरतों का सहारा भारत ही है. डीजल की पाइपलाइन से लेकर नेशनल ग्रिड से मिलने वाली बिजली तक, भारत ने कभी इस रिश्ते में सौदेबाजी नहीं की. लेकिन ढाका के नए सियासी आकाओं ने भारत-विरोध की सस्ती राजनीति की खातिर इस पूरे भरोसे को दांव पर लगा दिया.
चीन के ऑफर्स की असलियत, छिपा है कर्ज का फंदा
भारत से दूर भागने के चक्कर में बांग्लादेश के हुक्मरानों को सबसे पहले बीजिंग की गोद ही सबसे आरामदायक लगती है. मोहम्मद युनूस तो बीजिंग को लुभाने के लि ये तक कह गए थे कि बांग्लादेश हिंद महासागर का इकलौता गार्जियन है. वे बिना भारत को लूप में लिए पूर्वोत्तर राज्यों (सेवन सिस्टर्स) और नेपाल-भूटान को मिलाकर ट्रेड रूट की परिकल्पना अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर शेयर करने लगे थे. उसी लाइन पर तारिक रहमान भी आगे बढ़ रहे हैं. चीन भी बिना देर किए बड़े-बड़े वादों और भारी-भरकम बजट वाले प्रोजेक्ट्स की थाली सजाकर तैयार खड़ा है. लेकिन चीन का हर मुस्कुराता चेहरा और हर लुभावना ऑफर एक ट्रैप से ज्यादा कुछ नहीं है.
चीन की पूरी कूटनीति ही इस मॉडल पर चलती है कि छोटे और कमजोर देशों को पहले इतना कर्ज दे दो कि वे उसे चुका न पाएं. जब देश कर्ज के बोझ तले दब जाता है, तो चीन उसकी जमीन, बंदरगाहों और रणनीतिक ठिकानों पर कब्जा जमा लेता है. श्रीलंका का हमबनटोटा बंदरगाह और पाकिस्तान की बदहाली दुनिया के सामने जिंदा मिसाल है.
अमेरिका-यूरोप के बाजार में सिर्फ कपड़े बेचकर नहीं चल सकता मुल्क
चीन के अलावा दूसरा रास्ता अमेरिका और यूरोपीय मुल्कों की तरफ जाता है. बांग्लादेश के पॉलिसी मेकर्स को लगता है कि अगर पश्चिमी देश उनसे रेडीमेड कपड़े खरीदते रहेंगे, तो उनका काम आराम से चलता रहेगा. बेशक अमेरिका और यूरोप बांग्लादेशी गारमेंट्स के बहुत बड़े खरीदार हैं, लेकिन क्या केवल कपड़ा एक्सपोर्ट करके 17 करोड़ की आबादी वाले देश की अर्थव्यवस्था को संभाला जा सकता है?
हाल ही में अमेरिका ने बांग्लादेश के साथ व्यापार को लेकर जो रुख अपनाया है, उसने ढाका की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. अमेरिका ने नई ट्रेड डील और शर्तों को पूरी तरह से अपने फायदे की तरफ मोड़ दिया है. डोनाल्ड ट्रंप अपनी शर्तों पर व्यापार करना चाहता है, जिसमें लेबर लॉस, मानवाधिकार और राजनीतिक झुकाव को लेकर कड़े नियम शामिल हैं.
यूरोपियन यूनियन भी अब पर्यावरण और मानवाधिकारों को लेकर बेहद सख्त शर्तें लगा रहा है. ऐसे में यह सोचना कि केवल अमेरिका और यूरोप के भरोसे भारत को किनारे लगाया जा सकता है, एक बचकानी सोच के सिवा कुछ नहीं है.
'मुस्लिम नाटो' के पीछे तुर्की-पाकिस्तान का अपना खेल
तुर्की एक अखबार ने बांग्लादेश के लिए मक्का डिफेंस पैक्ट में शामिल होने का रास्ता सुझाया है. सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए सैन्य समझौते को ‘मुस्लिम नाटो’ भी कहा जा रहा है. बांग्लादेश के कुछ कूटनीतिज्ञों और कट्टरपंथी धड़ों को लगता है कि इस इस्लामी सैन्य या रणनीतिक ब्लॉक का हिस्सा बनकर वे खुद को एक बड़ी ताकत के रूप में पेश कर सकते हैं. लेकिन मिडिल ईस्ट के अपने जमीनी हालात उठाकर देख लीजिए, इस मुस्लिम नाटो की उपयोगिता पर वहीं सवाल उठ रहे हैं.
तो फिर इस 'मुस्लिम नाटो' का ढोल पीट कौन रहा है? इसके पीछे असली दिमाग तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन और कंगाली से जूझ रहे पाकिस्तान का है. तुर्की खुद को पूरे मुस्लिम जगत का नया रहनुमा साबित करना चाहता है, और पाकिस्तान का एकमात्र मकसद किसी भी तरह भारत को घेरना और परेशान करना है. इन दोनों देशों की दिलचस्पी इस बात में बिल्कुल नहीं है कि बांग्लादेश की आवाम का पेट कैसे भरेगा या उसकी अर्थव्यवस्था कैसे सुधरेगी. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बांग्लादेश तुर्की और पाकिस्तान के मोहरे के रूप में इस्तेमाल होने को तैयार होगा?
भारत और नक्शे की सच्चाई, मुंह मोड़ना नामुमकिन
बांग्लादेश चाहे चीन की चौखट पर माथा टेके, अमेरिका के सामने झोली फैलाए या फिर तुर्की-पाकिस्तान के छलावे में आए, आखिरकार दिन ढलने पर उसे अपने भूगोल की सच्चाई का सामना करना ही पड़ेगा. सच्चाई ये है कि भारत की मदद से बांग्लादेश आज आजाद मुल्क है. और अब वह अपना नक्शा नहीं बदल सकता.
बांग्लादेश की 94 फीसदी जमीनी बाउंड्री भारत से सटी है, लेकिन भारत की ओर से बांग्लादेश के भीतर घुसपैठ और गड़बड़ी का मामला 1 फीसदी भी नहीं. बांग्लादेश में आने वाली हर आपदा और दुख-सुख में भारत मदद लेकर सरहद पर खड़ा रहता है. जल बंटवारे से लेकर सीमा पार व्यापार तक, और सस्ती बिजली से लेकर रोजमर्रा के जरूरी सामानों की सप्लाई तक बांग्लादेश का हर रास्ता भारत के सहयोग से होकर ही गुजरता है.
शेख हसीना का गुस्सा अपनी जगह हो सकता है, लेकिन गुस्से में आकर जब कोई देश अपने सबसे भरोसेमंद पड़ोसी मुंह मोड़ने की कोशिश करता है, तो नुकसान उसी का होता है. बांग्लादेश के नए हुक्मरानों को यह बात जितनी जल्दी समझ आ जाए, उतना ही उनके मुल्क के लिए बेहतर होगा.