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बैलेट, बाबा और बूथ कैप्चरिंग... भारत को ये वापस चाहिए, और वो भी अभी

विपक्षी दल बैलेट पेपर पर वापस लौटने की बिल्कुल सही मांग कर रहे हैं. भारत एक सख्त देश है, और सिर्फ कमजोर देशों को ही सॉफ्टवेयर पर भरोसा होता है.

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कोई भी मशीन वह रोमांच कभी नहीं दे सकती जब चुनाव अधिकारी एक पर्ची को रोशनी के सामने उठाता था (Photo- ITG)
कोई भी मशीन वह रोमांच कभी नहीं दे सकती जब चुनाव अधिकारी एक पर्ची को रोशनी के सामने उठाता था (Photo- ITG)

ईवीएम (EVM) ने भारतीय चुनावों का सारा मज़ा खराब कर दिया है. भारत ने ही दुनिया को सिखाया था कि 'इंतजार का फल मीठा होता है'. लेकिन अब हमें जो मिल रहा है, वह है कड़वाहट.  वो भी इंस्टेंट यानी तुरंत.

दो महीने तक रैलियां, रथ यात्राएं, रोडशो और मुफ्त की रेवड़ियों का शोर चलता है, और नतीजा दोपहर के खाने से पहले ही आ जाता है. इतनी जल्दी तो चाय भी ठंडी नहीं होती. आप 60 दिनों का पूरा सीजन झेलते हैं और उसका फिनाले दो मिनट में खत्म हो जाता है. मैगी बनने में इससे ज्यादा समय लगता है, ज्ञानेश जी.

इसीलिए इंडिया (INDIA) गठबंधन की बैलेट पेपर की मांग जायज लगती है. इंडिया गठबंधन के साथियों, इस मांग पर डटे रहो. आपके लिए यह भरोसे की बात हो सकती है. हम बाकी लोगों के लिए यह सिर्फ मनोरंजन (कंटेंट) की बात है. हम एक लंबे और रोमांचक क्लाइमेक्स के लिए तरस रहे हैं.

वोट काउंटिंग वाले दिन ही ऐसे दिन होते थे जब इस लोकतंत्र को देखने में सच में मजा आता था. बढ़त ऊपर-नीचे होती रहती थी, टेस्ट मैच के पांचवां दिन की तरह. 40,000 वोटों से पीछे चल रहा उम्मीदवार वार्ड नंबर 7 का बक्सा खुलते ही 12,000 से आगे हो जाता था, और हारने वाले पक्ष को 'दोबारा गिनती' (रीकाउंट) की याद आती थी. अब मशीन कहती है 2.3 लाख और कहानी खत्म. वो रोमांच कहां गया? वो बड़कू चाचा कहां गए जो एक थरमस और तीन-चार अफवाहों के साथ 72 घंटे तक काउंटिंग सेंटर के बाहर बैठे रहते थे?

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सॉफ्टवेयर तो कमजोर देशों के लिए होता है. भारत एक सख्त देश है. हमें तो हार्डवेयर चाहिए. अगर हम चुनाव करा ही रहे हैं, तो ढंग से कराएं, और लोकतंत्र के साथ-साथ पुराने जमाने के आरोपों को भी वापस लाएं. बिना कागज वाले लोकतंत्र में ज्ञानेश जी के सिर पर ठीकरा फोड़ने के लिए कोई कागजी सबूत (पेपर ट्रेल) ही नहीं बचता. ईवीएम पर सिर्फ हैक होने का आरोप लगाया जा सकता है, जो कि बहुत ही उबाऊ और टेक्निकल सा तरीका है. जरा इसकी तुलना उस सुनहरे दौर से कीजिए.

बूथ कैप्चरिंग, जो कि वाकई में एक हुनर था, उसकी शुरुआत 1957 में ही हो गई थी. बेगूसराय, इसके लिए आई लव यू.

प्लानिंग, मैनपावर, लाठियां (तब बंदूकें आसानी से नहीं मिलती थीं) और सही टाइमिंग की समझ की जरूरत होती थी इसके लिए. बहुत मेहनत लगती थी. इससे लोगों को काम मिलता था, और यह एक तरह से 'मेक इन इंडिया' की पहल थी. बूथ लूटने वाले को जून की कड़कती धूप में पैदल चलकर स्कूल की इमारत तक जाना पड़ता था और वोटरों को डराना पड़ता था. यह सौरभ भारद्वाज जैसे किसी कंप्यूटर गीक के कारनामे की तरह नहीं था, जो सबके सामने कोड क्रैक कर दे, सिवाय चुनाव आयोग के.

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जिन लोगों ने पुराने अच्छे दिन देखे हैं, उन्हें बैलेट बॉक्स में फर्जी वोट डालना याद होगा. वह हमारा अपना क्राउडफंडिंग था. लोकतंत्र को बचाने के लिए 100% वोटिंग. हम सबको, बच्चों तक को, वे सारे बैलेट मोड़ने पड़ते थे. भले ही उसमें कोई कारीगरी न हो, लेकिन उन्होंने कभी धोखाधड़ी नहीं की. वहां कई बार ठप्पा लगाने वाले लोग होते थे. 'एक आदमी, एक वोट' सिर्फ किताबों में था, असलियत में तो 'एक आदमी, 40 वोट' चलता था. कलाई थक जाती थी और स्याही का पैड सूख जाता था. असली मेहनत का काम. आज का वोटर बस बटन दबाता है और मशीन माइक्रोवेव की तरह 'बीप' कर देती है. पुराना वोटर अपना पूरा जोर लगा देता था. मेहनत की इज्जत का असली नाम था 'छापो'.

फिर रद्द होने वाले वोटों (invalid votes) का नजारा भी शानदार होता था. चौकोर खाने के ठीक बीच में, लाइन को पार करते हुए, किनारे को छूते हुए या दो निशानों पर एक साथ लगाया गया ठप्पा आम तौर पर कोई कन्फ्यूजन या दोनों पार्टियों से प्यार नहीं होता था, बस एक अनाड़ीपन होता था. इसके चक्कर में हजारों वोट रद्द हो जाते थे. कितना अफसोस होता था.

कोई भी मशीन आपको वह रोमांच कभी नहीं दे सकती जब चुनाव अधिकारी एक पर्ची को रोशनी के सामने उठाता था, और 10 एजेंट आपस में इस बात पर बहस कर रहे होते थे कि वह धब्बा चुनाव निशान का है या कुछ और.

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इसके ऊपर से खोई हुई चाबियां, गलत गोदाम में चले गए बक्से, पूरे समय सोता रहने वाला पोलिंग एजेंट, और वह कभी न भूलने वाला काउंटिंग हॉल जहां बढ़त बदलते ही ठीक उसी पल बिजली चली जाती थी. बिल्कुल फिल्मी नजारा.

कुछ लोग कहेंगे कि बैलेट पेपर से चुनाव बहुत धीमा, और धांधली भरा होता है. यह हारने वालों की बातें हैं. अगर बैलेट पेपर मुश्किल है, तो टेस्ट क्रिकेट भी तो मुश्किल है. प्यार भी तो मुश्किल है. हम क्रिकेट से प्यार करने वाले देश में रहते हैं. टेस्ट क्रिकेट ही असली क्रिकेट है. टी20 का खुमार नया है, उतर जाएगा. टेस्ट क्रिकेट के लिए हमारा प्यार हमेशा बना रहेगा. टेस्ट क्रिकेट को वापस लाओ.

लोकतंत्र को अपना समय लेने दो. नतीजों को चौथे या पांचवें दिन आने दो. दोबारा गिनती, स्टे ऑर्डर और स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर बागपत स्टाइल वाली लड़ाई के बाद. आइए अपने लोकतंत्र के लिए कुछ कुर्बानियां दें, जैसे हमारे पूर्वजों ने दी थीं.

बटन दबाकर मिलने वाले लोकतंत्र में कोई मजा नहीं है. बैलेट को वापस लाओ. इस पर ठप्पा लगाओ और बक्सों में ठूंसो, जैसा हम पहले किया करते थे. भारत जिंदाबाद. भारतीय लोकतंत्र जिंदाबाद! जय हिंद! भारत माता की जय! ज्ञानू को जाना ही होगा!

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