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भोपाल गैस पीड़ितों की बस्तियों में मल युक्त पानी! 70% सैंपल फेल, इंदौर के भागीरथपुरा जैसा संकट, रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

भोपाल गैस पीड़ित संगठनों ने दावा किया कि यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के आसपास 63 में से 43 पानी के नमूनों में फीकल कोलीफॉर्म मिला. सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के पालन पर भी सवाल उठे.

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गैस त्रासदी के 4 दशक बाद भी जहर पीने को मजबूर लोग.(Photo: Representational)
गैस त्रासदी के 4 दशक बाद भी जहर पीने को मजबूर लोग.(Photo: Representational)

यूनियन कार्बाइड गैस त्रासदी के चार दशक बाद भी कारखाने के आसपास रहने वाले लोगों की मुश्किलें खत्म होती नहीं दिख रहीं. अब गैस पीड़ित संगठनों ने दावा किया है कि इन इलाकों में सप्लाई होने वाला पीने का पानी बड़े पैमाने पर मल से दूषित है. चार गैस पीड़ित संगठनों ने शुक्रवार को पत्रकार वार्ता में अपनी जांच रिपोर्ट जारी करते हुए आरोप लगाया कि भोपाल नगर निगम की लापरवाही के कारण यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से सटे इलाकों में इंदौर के भागीरथपुरा जैसी स्थिति बनने का खतरा पैदा हो गया है.

संगठनों के मुताबिक, जुलाई में 30 बस्तियों के 63 नलों से पानी के नमूने लेकर जांच कराई गई. उनका दावा है कि इनमें से 43 नमूनों में फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया मिले, जो पानी के मल से दूषित होने का संकेत है. रिपोर्ट के अनुसार, जांच किए गए 30 में से 19 समुदायों तक दूषित पानी पहुंच रहा है. संगठनों का यह भी दावा है कि अपर लेक (बड़ा तालाब) से सप्लाई होने वाले पानी के 90 प्रतिशत और कोलार डैम से आने वाले पानी के 25 प्रतिशत नमूने दूषित पाए गए.

भोपाल गैस पीड़ित महिला पुरुष संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष नवाब खान ने कहा कि यह स्थिति सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है. वहीं भोपाल गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी संघ की अध्यक्ष रशीदा बी का आरोप है कि इन बस्तियों में दस्त, उल्टी और टाइफाइड के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है और पूरे-पूरे परिवार बीमार पड़ रहे हैं.

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उन्होंने बताया कि साल 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन कार्बाइड के जहरीले कचरे से भूजल प्रदूषण को देखते हुए प्रभावित इलाकों में पाइपलाइन के जरिए स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे. साल 2018 में पाइपलाइन के पानी में मल-संदूषण की शिकायतों पर सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल नगर निगम को सीवेज लाइन और ड्रेनेज व्यवस्था विकसित करने का आदेश दिया था. नगर निगम ने तीन महीने में काम पूरा करने का आश्वासन दिया था, लेकिन आठ साल बाद भी इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई.

भोपाल ग्रुप फॉर इंफॉर्मेशन एंड एक्शन की रचना धींगरा ने कहा कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो इंदौर के भागीरथपुरा जैसी गंभीर स्थिति यहां भी पैदा हो सकती है. उन्होंने मांग की कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन सुनिश्चित किया जाए, जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो, सीवेज और ड्रेनेज परियोजना को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाए तथा पेयजल की गुणवत्ता की स्वतंत्र निगरानी शुरू की जाए.

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