
यूरोप में पड़ रही रिकॉर्डतोड़ हीटवेव ने सिर्फ लोगों की जिंदगी मुश्किल नहीं बनाई है, बल्कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते असर पर भी नए सवाल खड़े कर दिए हैं. बदलते मौसम के साथ यूरोप की पारंपरिक हाउसिंग डिजाइन भी चर्चा में है. फ्रांस की राजधानी पेरिस से लेकर ब्रिटेन के लंदन तक हजारों लोग ऐसे घरों में रह रहे हैं, जिन्हें दशकों पहले कड़ाके की सर्दी से बचाने के लिए बनाया गया था. अब वही घर भीषण गर्मी के दौरान 'हीट ट्रैप' यानी ऐसी इमारतों में बदलते जा रहे हैं, जो गर्मी को अंदर कैद कर लेती हैं. यही वजह है कि कई घर दिन में 'ओवन' जैसे महसूस होने लगे हैं और लोगों को राहत पाने के लिए नए-नए उपाय अपनाने पड़ रहे हैं.
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पेरिस में रहने वाले 21 वर्षीय यूलिस ज़ाकरी का सिर्फ 9 वर्गमीटर का अटारी वाला कमरा कुछ घंटे धूप पड़ते ही 'ओवन' जैसा हो जाता है. उन्होंने बताया कि कमरे में इतनी गर्मी हो जाती है कि साबुन तक पिघल गए और शराब की बोतलों के अंदर दबाव बढ़ने से कॉर्क बाहर निकलने लगे. रात में उन्हें गीले तौलिये ओढ़कर सोना पड़ता है.
आखिर यूरोप के घर ऐसे क्यों बने हैं?
इस सवाल का जवाब यूरोप के मौसम और इतिहास में छिपा है.दशकों तक यूरोप की सबसे बड़ी चुनौती भीषण ठंड रही. फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और दूसरे देशों में सर्दियों के दौरान तापमान कई जगह शून्य से नीचे चला जाता है. ऐसे में घरों को इस तरह बनाया गया कि अंदर की गर्मी बाहर न निकल सके.
इसी वजह से अधिकांश पुराने यूरोपीय घरों में मोटी दीवारें, मजबूत इंसुलेशन, डबल या ट्रिपल ग्लेज़्ड खिड़कियां और ऐसी छतें बनाई गईं जो गर्मी को भीतर रोककर रखें. मकसद था कि हीटिंग सिस्टम से पैदा हुई गर्मी लंबे समय तक घर के अंदर बनी रहे और ऊर्जा की बचत हो.
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अब यही डिजाइन बन रही परेशानी
जलवायु परिवर्तन के कारण यूरोप में गर्मियां पहले की तुलना में कहीं ज्यादा लंबी और गर्म हो रही हैं. लेकिन ज्यादातर घरों की डिजाइन अब भी ठंड को ध्यान में रखकर बनी हुई है.
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरनमेंटल डिजाइन एंड इंजीनियरिंग की प्रोफेसर एना मावरोजियानी के मुताबिक, यूरोप में आज भी कई नई इमारतें ऐसी बन रही हैं जिनका मुख्य उद्देश्य सर्दियों में गर्मी बचाकर रखना है. ऐसे में जब बाहर तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंचता है, तो वही इंसुलेशन गर्मी को बाहर निकलने नहीं देता और घर अंदर से बेहद गर्म हो जाते हैं.

हर घर में एसी क्यों नहीं है?
कई लोगों के मन में सवाल आता है कि अगर इतनी गर्मी है तो लोग एयर कंडीशनर क्यों नहीं लगाते? रॉयटर्स के अनुसार, यूरोप के केवल करीब 25 प्रतिशत घरों में ही एयर कंडीशनिंग की सुविधा है, जबकि अमेरिका और जापान में यह आंकड़ा लगभग 90 प्रतिशत है.
विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोप में सालों तक एसी की जरूरत बहुत कम महसूस हुई क्योंकि वहां गर्मियां अपेक्षाकृत हल्की होती थीं. दूसरी वजह ऊर्जा की खपत और कार्बन उत्सर्जन को कम रखने की नीति भी रही है. बड़े पैमाने पर एसी का इस्तेमाल बिजली ग्रिड पर दबाव बढ़ाता है और शहरों में बाहर निकलने वाली गर्म हवा 'अर्बन हीट आइलैंड' प्रभाव को और बढ़ा सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि बड़ी संख्या में एयर कंडीशनर चलने से घरों की गर्म हवा बाहर निकलती है, जिससे शहर का तापमान और बढ़ सकता है. इसे 'अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव' कहा जाता है. इस स्थिति में शहर आसपास के इलाकों की तुलना में ज्यादा गर्म महसूस होते हैं.
स्पेन के घरों से क्या सीख सकता है यूरोप?
दिलचस्प बात यह है कि यूरोप के सभी देशों की स्थिति एक जैसी नहीं है.
स्पेन जैसे गर्म देशों में सदियों से ऐसे घर बनाए जाते रहे हैं जिनमें हल्के रंग की बाहरी दीवारें, मोटी दीवारें, छोटी खिड़कियां, बाहर की ओर शटर और प्राकृतिक हवा के आवागमन की व्यवस्था होती है. इससे धूप कम अंदर जाती है और घर अपेक्षाकृत ठंडे रहते हैं.विशेषज्ञों का मानना है कि फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों को अब भविष्य की इमारतों में ऐसे डिजाइन अपनाने होंगे.
क्या सिर्फ एसी ही समाधान है?
विशेषज्ञों का कहना है कि नहीं.प्रोफेसर एना मावरोजियानी के मुताबिक, सबसे प्रभावी तरीका यह है कि गर्मी को घर के अंदर आने ही न दिया जाए. इसके लिए बाहरी शटर, छज्जे, बेहतर वेंटिलेशन, रिफ्लेक्टिव छतें, अधिक पेड़-पौधे और ऐसी शहरी योजना की जरूरत है जो तापमान कम रखने में मदद करे.
जलवायु परिवर्तन ने बदल दी तस्वीर
रॉयटर्स की रिपोर्ट बताती है कि पश्चिमी यूरोप इस समय ऐसी हीटवेव का सामना कर रहा है जिसने जनजीवन, बिजली व्यवस्था, स्कूलों और पर्यटन पर असर डाला है. वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण यूरोप में अत्यधिक गर्मी की घटनाएं पहले की तुलना में अधिक बार और अधिक तीव्र हो रही हैं. ऐसे में सिर्फ लोगों की आदतें बदलना काफी नहीं होगा, बल्कि घरों और शहरों की डिजाइन भी बदलनी पड़ेगी.
यूरोप के घर खराब डिजाइन की वजह से नहीं, बल्कि अलग जलवायु के लिए बनाए गए थे. जब ये घर बने थे, तब सबसे बड़ी चुनौती ठंड थी, गर्मी नहीं. लेकिन अब बदलते मौसम ने दशकों पुरानी वास्तुकला को नई परीक्षा के सामने खड़ा कर दिया है. यही वजह है कि जो घर कभी लोगों को बर्फीली सर्दियों से बचाते थे, वही आज रिकॉर्डतोड़ हीटवेव में 'ओवन' जैसे महसूस हो रहे हैं.