सुबह की भागदौड़ में कॉफी का कप हाथ में लेकर निकलना आज आम बात है. ऑफिस जाना हो, मीटिंग के लिए जल्दी हो या रास्ते में सफर करना हो, पेपर कप वाली कॉफी अक्सर साथ रहती है. लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि कॉफी कप के ढक्कन में पीने वाले बड़े छेद के अलावा एक छोटा सा और छेद भी होता है?
यह छोटा सा छेद देखने में भले ही मामूली लगे, लेकिन कॉफी पीने के दौरान इसका काम काफी अहम होता है. इसे न तो सिर्फ डिजाइन के लिए बनाया जाता है और न ही कॉफी की खुशबू बाहर निकालने के लिए. इस छोटे छेद का मुख्य काम कप के अंदर हवा का दबाव संतुलित करना है.
कप के ढक्कन में क्यों दिया जाता है छोटा छेद?
रीडर्स डाइजेस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, पैकेजिंग एक्सपर्ट स्टानिस्लाव क्रिकुन के अनुसार, जब ढक्कन पूरी तरह बंद होता है और हम पीने वाले छेद से कॉफी पीते हैं, तो कप से बाहर निकलने वाली कॉफी की जगह हवा का अंदर जाना जरूरी होता है.
अगर हवा अंदर नहीं जाएगी तो कप के अंदर दबाव बदलने लगेगा. इसका असर कॉफी के बहाव पर पड़ता है. कॉफी कभी रुक-रुककर निकल सकती है और फिर अचानक ज्यादा मात्रा में बाहर आ सकती है. इससे कॉफी छलकने का खतरा बढ़ जाता है.यही काम करता है ढक्कन का वह छोटा छेद. यह कप के अंदर हवा को पहुंचने देता है, जिससे दबाव संतुलित रहता है और कॉफी लगातार और आसानी से बाहर आती है.
इसे ऐसे समझिए... मान लीजिए आपने पानी से भरी बोतल को पूरी तरह बंद कर दिया और उसमें से पानी निकालने की कोशिश की. पानी लगातार आसानी से निकलने के बजाय रुक-रुककर बाहर आ सकता है. कॉफी कप के ढक्कन में दिया गया छोटा छेद इसी समस्या को कम करता है. जैसे ही आप कॉफी पीते हैं, कॉफी के बाहर निकलने के साथ हवा अंदर चली जाती है. यानी यह छोटा छेद एक तरह के मिनी एयर वाल्व की तरह काम करता है.
ढक्कन बनाने वाले लोग इस बात का भी ध्यान रखते हैं कि हवा और कॉफी के रास्ते एक-दूसरे में बाधा न डालें. इसीलिए छोटे एयर-होल को आमतौर पर पीने वाले छेद से अलग जगह पर बनाया जाता है. इससे हवा अंदर जाती रहती है और कॉफी अपने रास्ते से बाहर आती रहती है.
ढक्कन के डिजाइन में इस बात की टेस्टिंग भी की जाती है कि छेद किस जगह रखने पर कॉफी का बहाव सबसे अच्छा रहेगा और छलकने की संभावना कम होगी.
क्या इस छोटे छेद का बस यही काम है?
मुख्य काम तो हवा का दबाव संतुलित करना ही है, लेकिन इसके कुछ और फायदे भी हैं. छोटा छेद कप से थोड़ी हवा और भाप निकलने देता है. इससे कॉफी के तापमान पर हल्का असर पड़ सकता है और पहली चुस्की का अनुभव थोड़ा बेहतर हो सकता है. कप के अंदर दबाव सही रहने से कॉफी का बहाव ज्यादा कंट्रोल में रहता है. इससे अचानक कॉफी उछलने या छलकने की संभावना कम हो जाती है.
हवा के आने का रास्ता मिलने से कॉफी लगातार और अनुमान के मुताबिक बहती है. यानी आपको हर घूंट में अचानक कॉफी का तेज झटका नहीं मिलता. अगर आप अगली बार कॉफी कप का ढक्कन ध्यान से देखेंगे तो आपको कई छोटी-छोटी चीजें नजर आएंगी. इनमें से ज्यादातर का कोई न कोई काम होता है.
कुछ ढक्कनों में साधारण खुला हुआ छेद होता है, जबकि कुछ में फ्लिप वाला छोटा फ्लैप दिया जाता है. इससे कॉफी को गर्म रखने और कप के हिलने पर छींटे कम करने में मदद मिल सकती है. कई ढक्कनों पर पीने वाले छेद के आसपास किनारा थोड़ा उठा हुआ होता है. इसका मकसद कॉफी की बूंदों को सीधे कप के बाहर बहने से रोकना है.
कुछ ढक्कनों पर पीने वाले हिस्से के आसपास हल्की सी गहरी जगह बनी होती है. अगर कप हिलने पर कॉफी वहां तक पहुंच जाए तो यह हिस्सा उसे वापस कप के अंदर जाने में मदद करता है.
हादसों ने भी बदला कॉफी कप का डिजाइन
गर्म कॉफी गिरने से होने वाले जलने के हादसों ने भी कंपनियों को ढक्कन के डिजाइन पर ज्यादा ध्यान देने के लिए मजबूर किया. धीरे-धीरे ऐसे ढक्कन बनाए गए जो कप पर ज्यादा मजबूती से फिट हों, कॉफी का बहाव नियंत्रित करें और गर्म पेय को छलकने से बचाएं.
1980 के दशक के मध्य तक ऐसे खास डिजाइन सामने आने लगे जिनमें पीने के लिए पहले से बना हुआ हिस्सा और ज्यादा बेहतर फिटिंग होती थी. बाद में ढक्कनों में हवा के बहाव, भाप और कॉफी के झाग को संभालने के लिए भी अलग-अलग डिजाइन आजमाए गए.