scorecardresearch
 

जिसे समझते हैं टूटता तारा, वो असल में क्या होता है? क्यों मांगते हैं विश

क्या आपने भी कभी टूटता तारा देखकर विश मांगी है? लेकिन जिसे आप तारा समझते हैं, वह असल में एक खगोलीय घटना है. जानिए इसके पीछे का विज्ञान और सदियों पुरानी विश मांगने की परंपरा की पूरी कहानी.

Advertisement
X
सूरज की तरह असली तारे बेहद विशाल और गर्म गैसों के गोले होते हैं (Photo: Pexel)
सूरज की तरह असली तारे बेहद विशाल और गर्म गैसों के गोले होते हैं (Photo: Pexel)

फिल्मों से लेकर आम जिंदगी तक, 'टूटता तारा' और इच्छा मांगने का कनेक्शन काफी पुराना है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर टूटते तारे से विश क्यों मांगी जाती है? और सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिसे हम 'टूटता तारा' कहते हैं, वह असल में तारा होता ही नहीं.

क्या आपने भी कभी टूटता तारा देखकर विश मांगी है? लेकिन जिसे आप तारा समझते हैं, वह असल में एक खगोलीय घटना है. जानिए इसके पीछे का विज्ञान और सदियों पुरानी विश मांगने की परंपरा की पूरी कहानी.

टूटता तारा असल में क्या है?

जिसे अंग्रेजी में 'शूटिंग स्टार' कहा जाता है, वह वास्तव में मीटियर होता है. यह अंतरिक्ष में मौजूद किसी छोटे पत्थर या धूल के कण का हिस्सा हो सकता है. जब ऐसा कण बेहद तेज रफ्तार से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है, तो उसके आसपास की हवा तेजी से गर्म और आयनाइज होने लगती है. इसी प्रक्रिया के कारण आसमान में चमकती हुई रोशनी की लकीर दिखाई देती है.

कई मेटोराइड बेहद छोटे होते हैं. कुछ रेत के कण जितने होते हैं, तो कुछ छोटे पत्थरों के आकार के. हालांकि इनकी रफ्तार काफी ज्यादा हो सकती है. पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते समय इनकी गति कई किलोमीटर प्रति सेकंड होती है.यही वजह है कि हमें आसमान में कुछ पल के लिए चमकती हुई लकीर दिखाई देती है और लगता है जैसे कोई तारा टूटकर नीचे गिर रहा हो.

Advertisement

असली तारे क्यों नहीं टूटते?

हमारे सूरज की तरह असली तारे बेहद विशाल और गर्म गैसों के गोले होते हैं. वे पृथ्वी से इतनी दूर होते हैं कि उनका हमारे वायुमंडल में आकर 'टूटना' या गिरना संभव नहीं है. इसलिए 'टूटता तारा' सिर्फ बोलचाल का नाम है. वैज्ञानिक भाषा में आसमान में दिखाई देने वाली यह चमक मीटियर कहलाती है.

अगर अंतरिक्ष का वह टुकड़ा पूरी तरह वायुमंडल में जलने के बजाय पृथ्वी की सतह तक पहुंच जाए, तो उसे मीटियोराइट कहा जाता है. यानी मीटियोरॉइड अंतरिक्ष में मौजूद वस्तु है, मीटियर वायुमंडल में दिखाई देने वाली चमक है और मीटियोराइट वह हिस्सा है जो जमीन तक पहुंचता है.

फिर टूटते तारे से विश मांगने की शुरुआत कैसे हुई?

अब आते हैं सबसे दिलचस्प सवाल पर. आखिर टूटते तारे को देखकर विश मांगने की परंपरा कहां से आई? इसके पीछे किसी एक जगह या एक व्यक्ति को निश्चित रूप से जिम्मेदार नहीं माना जा सकता. 

हालांकि एक लोकप्रिय मान्यता प्राचीन ग्रीस से जुड़ी है. माना जाता है कि प्राचीन यूनानी दार्शनिक और खगोलशास्त्री टॉलेमी ने लिखा था कि कभी-कभी देवता पृथ्वी की ओर देखते हैं और उस दौरान तारों के बीच से कोई तारा नीचे आता हुआ दिखाई दे सकता है. लोगों के बीच इससे यह धारणा बनी कि ऐसे दुर्लभ पल में मांगी गई इच्छा देवताओं तक पहुंच सकती है.

Advertisement

समय के साथ ऐसी मान्यताएं अलग-अलग संस्कृतियों में अलग रूपों में दिखाई देने लगीं. टूटता तारा अचानक आता है, कुछ ही क्षण दिखाई देता है और फिर गायब हो जाता है. शायद यही दुर्लभता इसे रहस्यमयी और शुभ संकेत मानने की वजह बनी.

हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि 'टूटते तारे को देखकर विश मांगने की परंपरा प्राचीन ग्रीस से ही शुरू हुई' यह बात एक लोकप्रिय ऐतिहासिक कहानी है, इसे पूरी तरह साबित करने वाला ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है.
 

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement