आमतौर पर जब हम अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस का नाम सुनते हैं तो हमारे मन में डर और बेचैनी पैदा हो जाती है. वहां जाने के बारे में ज्यादातर लोग सोच भी नहीं पाते. लेकिन बिहार के समस्तीपुर जिले में एक ऐसी महिला हैं, जिनकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा इसी पोस्टमार्टम हाउस में काम करते हुए बीता है. उनका नाम है मंजू देवी. करीब 50 साल की मंजू देवी अब तक 20 हजार से ज्यादा शवों का पोस्टमार्टम कराने में डॉक्टरों की मदद कर चुकी हैं. इनमें बच्चे, महिलाएं, पुरुष, बुजुर्ग और हादसों में जान गंवाने वाले लोग भी शामिल हैं. खास बात यह है कि वह यह काम किसी शौक के लिए नहीं बल्कि परिवार चलाने की मजबूरी में करती रही हैं.
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इतने संवेदनशील और मुश्किल काम के बदले उन्हें प्रति शव नहीं, बल्कि एक दिन के काम के लिए सिर्फ 380 रुपये मिलते हैं. चाहे एक दिन में एक शव आए या कई शव, उनकी मजदूरी 380 रुपये ही रहती है. जिस दिन कोई शव पोस्टमार्टम के लिए नहीं आता, उस दिन उन्हें कोई पैसा नहीं मिलता. मंजु देवी कहती हैं कि वे 20 हजार पोस्टमार्टम चुकी हैं. महिला ने आगे बताया कि छेनी से स्कल खोलती हैं. हथौड़ी से खोपड़ी खुलती है. कोई जरूरत पड़े तो स्कल से माथा काटा जाता है. चेस्ट एब्डोमेन अलग औजार से खोला जाता है. उसके बाद कैंची से कपड़ा काटा जाता है. सुई धागा से बॉडी सिलते हैं.
मंजू देवी ने बताया कि आम लोगों में पोस्टमार्टम को लेकर कई तरह की गलतफहमियां हैं. उन्होंने साफ किया कि पोस्टमार्टम डॉक्टर करते हैं, जबकि वह डॉक्टर की सहायिका के तौर पर काम करती हैं. जब किसी हादसे या दूसरी घटना में किसी व्यक्ति की मौत होती है तो शव को पुलिस के जरिए पोस्टमार्टम हाउस लाया जाता है. जरूरी प्रक्रिया और रजिस्टर का काम पूरा होने के बाद डॉक्टर आते हैं और शव की जांच करते हैं. डॉक्टर जिस हिस्से में चीरा लगाने के लिए कहते हैं, मंजू देवी उसमें उनकी मदद करती हैं. वह बताती हैं कि चोट के हिसाब से डॉक्टर के निर्देश पर अलग-अलग हिस्सों में प्रक्रिया की जाती है. उनका काम काफी जिम्मेदारी और सावधानी वाला होता है.
पोस्टमार्टम में कौन-कौन से औजार इस्तेमाल होते हैं?
मंजू देवी ने पोस्टमार्टम के दौरान इस्तेमाल होने वाले कुछ औजारों के बारे में भी बताया. उनके पास चाकू, ब्लेड, कैंची, सुई-धागा, छेनी और हथौड़ी जैसे उपकरण होते हैं. चेस्ट और पेट खोलने के लिए ब्लेड और दूसरे औजारों का इस्तेमाल किया जाता है. वहां सिर की जांच के लिए खोपड़ी खोलने में छेनी और हथौड़ी की जरूरत पड़ती है. कैंची का इस्तेमाल कपड़े काटने जैसे कामों में किया जाता है. हालांकि इन औजारों को देखकर किसी भी सामान्य व्यक्ति को डर लग सकता है, लेकिन मंजू देवी के लिए यह रोजमर्रा के काम का हिस्सा बन चुका है.
बच्चों का भी किया है पोस्टमार्टम
जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने बच्चों के शवों का पोस्टमार्टम कराने में भी डॉक्टर की मदद की है, तो उन्होंने बताया कि हां, बच्चों के शव भी आते हैं. उन्होंने कहा कि कभी-कभी बहुत छोटे बच्चे भी पोस्टमार्टम के लिए आते हैं. ऐसे मामलों में उन्हें भी भावनात्मक तकलीफ होती है. खासकर बच्चों को देखकर उनके मन में मां वाली भावना जाग जाती है. हालांकि वह कहती हैं कि काम तो काम है और उसे करना पड़ता है. अगर वह डरकर या भावुक होकर काम छोड़ देंगी तो परिवार का खर्च कैसे चलेगा.
क्या पोस्टमार्टम हाउस में डर नहीं लगता?
पोस्टमार्टम हाउस का नाम सुनते ही कई लोगों के मन में भूत-प्रेत और आत्मा जैसी बातें आने लगती हैं. मंजू देवी से भी पूछा गया कि क्या उन्हें कभी वहां डर लगा या कोई अजीब अनुभव हुआ. उन्होंने साफ कहा कि उन्हें आज तक ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला. उनका कहना है कि वह रात में भी पोस्टमार्टम के लिए आ चुकी हैं. कभी-कभी रात 12 बजे, 1 बजे या 2 बजे भी काम के लिए आना पड़ता है, लेकिन उन्हें आत्मा या भूत जैसी कोई चीज नहीं दिखाई दी. वह कहती हैं कि अगर डरेंगे तो परेशानी और बढ़ेगी, इसलिए डरने की जरूरत नहीं है.
पोस्टमार्टम हाउस में शव होने की वजह से वहां की स्मेल भी आम लोगों के लिए सहन करना मुश्किल हो सकता है. लेकिन मंजू देवी का कहना है कि लगातार काम करने के कारण अब उन्हें इसकी आदत हो चुकी है. वह बताती हैं कि शुरुआत में परेशानी होती होगी, लेकिन अब उन्हें वैसी गंध महसूस नहीं होती. लंबे समय से इस काम को करते-करते उनका शरीर और मन दोनों इस माहौल के अभ्यस्त हो चुके हैं.
मजबूरी में शुरू किया था यह काम
मंजू देवी की कहानी का सबसे भावुक हिस्सा यह है कि उन्होंने यह काम अपनी इच्छा से शुरू नहीं किया था. उन्होंने बताया कि उनके पति को लीवर कैंसर था. परिवार में उनकी सास भी बीमार रहती थीं और उस समय उनके बच्चे छोटे थे. घर चलाने और परिवार का इलाज कराने के लिए उन्हें काम की जरूरत थी. इसी दौरान परिवार में पहले से चले आ रहे इस काम को उन्होंने संभाल लिया. उन्होंने बताया कि उनकी सास ने उन्हें यह काम सौंपा और इसके बाद उन्होंने अपने बच्चों के पालन-पोषण के लिए पोस्टमार्टम हाउस में काम करना शुरू कर दिया. पति के इलाज में काफी पैसा खर्च हुआ, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका. इसके बाद भी मंजू देवी ने हिम्मत नहीं छोड़ी और बच्चों की जिम्मेदारी संभालती रहीं.