दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाइट बुधवार को हाईजैक और क्रैश होने से बच गई. एक भारतीय पायलट की बहादुरी और यात्रियों के साहस की वजह से अनहोनी टल गई. लेकिन, हर बार ऐसा नहीं होता है. करीब 5 दशक पहले कुछ ऐसा ही हुआ था. जब इजरायली यात्रियों से भरी एक फ्लाइट को हाईजैक कर युगांडा ले जाया गया था.
आईडीएफ की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक, 27 जून 1976 को एयर फ्रांस का एक यात्री विमान तेल अवीव से पेरिस जा रहा था. एथेंस में ठहराव के बाद विमान ने जैसे ही उड़ान भरी, चार हथियारबंद लोगों ने उसे हाईजैक कर लिया. यात्रियों को बंधक बना लिया गया और विमान का रास्ता बदलकर युगांडा के एंटेबे एयरपोर्ट पर उतार दिया गया.
उस वक्त युगांडा के राष्ट्रपति ईदी अमीन थे. उनकी सेना भी आतंकियों की मदद कर रही थी. हाईजैकर्स ने यहूदी और इजरायली यात्रियों को बाकी लोगों से अलग कर दिया. उनकी मांग थी कि दुनिया के अलग-अलग देशों में कैद सैकड़ों लोगों को रिहा किया जाए. ऐसा नहीं होने पर उन्होंने बंधकों को मारने की धमकी दी.
इजरायल के सामने चुनौती बेहद मुश्किल थी. हजारों किलोमीटर दूर बंधक बनाए गए अपने नागरिकों को छुड़ाना था, लेकिन आतंकियों की संख्या, उनकी स्थिति और आगे की योजना के बारे में पुख्ता जानकारी नहीं थी. समय भी तेजी से निकल रहा था.
ऐसे में इजरायल ने एक सीक्रेट मिलिट्री ऑपरेशन तैयार किया. चार विमानों में सवार कमांडो युगांडा पहुंचे और अचानक कार्रवाई कर 103 बंधकों को सुरक्षित निकाल ले गए. इस अभियान को दुनिया ऑपरेशन एंटेबे के नाम से जानती है.
एथेंस से एंटेबे तक आतंकियों के कब्जे में विमान
एयर फ्रांस की फ्लाइट 139 ने 27 जून 1976 को तेल अवीव से उड़ान भरी थी. एथेंस में ठहराव के बाद विमान को पेरिस जाना था. लेकिन उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद चार यात्रियों ने विमान पर कब्जा कर लिया.
इनमें जर्मनी के उग्रवादी संगठन बाडर-माइनहॉफ से जुड़े विल्फ्रेड बोसे और ब्रिगिट कुलमान के अलावा फिलिस्तीन के पॉपुलर फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ फिलिस्तीन के दो सदस्य शामिल थे.
विमान को युगांडा के एंटेबे एयरपोर्ट ले जाया गया. वहां पहुंचते ही आतंकियों ने यहूदी और इजरायली यात्रियों को बाकी बंधकों से अलग कर दिया. इजरायली वायुसेना के पूर्व नेविगेटर लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) अवि मोर ने बाद में इस प्रक्रिया की तुलना नाजी शासन के दौरान यहूदियों के चयन से की थी. आतंकियों ने बंधकों को मारने की समयसीमा भी तय कर दी. इजरायल के लिए अब हर घंटा अहम था.
बिना पुख्ता जानकारी के तैयार हुआ बचाव अभियान
इजरायल ने शुरुआत में बातचीत और कूटनीतिक रास्तों से बंधकों को छुड़ाने की कोशिश की. सरकार ने बातचीत के लिए तैयार होने का संकेत दिया. इससे सेना को बचाव अभियान की योजना बनाने के लिए कुछ अतिरिक्त समय मिल गया.
आतंकियों ने नई समयसीमा 4 जुलाई तय की थी. इसी बीच इजरायली सुरक्षा एजेंसियां एंटेबे एयरपोर्ट की जानकारी जुटाने में लगी रहीं. अवि मोर के मुताबिक, मिशन के दौरान सबसे बड़ी परेशानी भरोसेमंद जानकारी की कमी थी. आतंकियों की सही स्थिति और बंधकों के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं थी.
एक रात मोर के घर उनका साथी सैनिक पहुंचा. उनकी पत्नी को कमरे में जाने के लिए कहने के बाद उन्हें मिशन की जानकारी दी गई. अगली सुबह 6 बजे तक वह इजरायली कमांडो यूनिट सायरेट मतकल के साथ अभ्यास में शामिल हो चुके थे.
1 जुलाई को ऑपरेशन के मुख्य कमांडर ब्रिगेडियर जनरल डैन शोमरोन ने बचाव योजना प्रधानमंत्री यित्जाक राबिन, रक्षा मंत्री शिमोन पेरेस और सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के सामने रखी. मंजूरी मिलने के बाद मिशन को अंतिम रूप दिया गया.
मर्सिडीज और जीप लेकर पहुंचे कमांडो
इजरायल ने चार विमान युगांडा भेजे. पहले विमान से कमांडो उतरे. उनके साथ दो जीप और एक काली मर्सिडीज कार भी थी, जो देखने में राष्ट्रपति ईदी अमीन की गाड़ी जैसी थी. योजना थी कि कमांडो इन गाड़ियों में पुराने टर्मिनल तक पहुंचेंगे और युगांडा की सेना समझकर आतंकियों को संभलने का मौका नहीं मिलेगा.
सैनिकों को आदेश था कि टर्मिनल तक पहुंचने से पहले गोली न चलाएं. लेकिन रास्ते में एक भारी हथियारों से लैस युगांडाई सैनिक उनके वाहन के करीब आ गया. तब एक इजरायली सैनिक ने उस पर गोली चला दी. इसके बाद कमांडो की पहचान छिपी नहीं रह सकी और उन्हें तेजी से टर्मिनल की ओर बढ़ना पड़ा.
छह मिनट में पहुंचे बाकी विमान, शुरू हुआ रेस्क्यू
पहले विमान के उतरने के छह मिनट बाद दूसरा और तीसरा विमान भी एयरपोर्ट पहुंच गया. इनमें अतिरिक्त सैनिक थे, जिन्हें युगांडा की सेना से मुकाबले और बचाव अभियान में मदद करनी थी.
अवि मोर दूसरे, तीसरे और चौथे विमान के नेविगेटर थे. चौथा विमान बंधकों को वापस इजरायल ले जाने के लिए तैयार रखा गया था. पहले विमान के कमांडो ने पुराने टर्मिनल पर कार्रवाई शुरू की. कुछ ही मिनटों में आतंकियों को मार गिराया गया और बंधकों को निकालने का रास्ता साफ हो गया.
करीब 20 मिनट के भीतर यात्रियों को चौथे विमान में बैठाने की प्रक्रिया शुरू हो गई. हालांकि, इस दौरान कमांडो यूनिट के प्रमुख लेफ्टिनेंट कर्नल योनातन नेतन्याहू को गोली लग गई. बंधकों को विमान तक पहुंचाने में मदद करते समय उनकी मौत हो गई. कम से कम पांच अन्य इजरायली सैनिक भी घायल हुए.
58 मिनट में युगांडा से निकले विमान
सैनिकों ने बंधकों को विमान में बैठाया और नेतन्याहू का शव भी साथ ले गए. इजरायली विमान एंटेबे पहुंचने के करीब 58 मिनट बाद वहां से रवाना हो गए. इस अभियान में 103 बंधकों को सुरक्षित निकाला गया. हालांकि, तीन बंधकों की मौत हुई थी. एक अन्य बंधक डोरा ब्लोच, जिन्हें पहले अस्पताल में भर्ती कराया गया था, बाद में युगांडा में मार दी गईं.
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4 जुलाई 1976 की सुबह बचाए गए यात्री और सैनिक इजरायल के बेन गुरियन एयरपोर्ट पहुंचे. वहां लोगों की भारी भीड़ उनके स्वागत के लिए मौजूद थी. इस अभियान को बाद में ऑपरेशन योनातन नाम भी दिया गया, जो शहीद कमांडर योनातन नेतन्याहू के सम्मान में रखा गया था. बेहद कम जानकारी, सीमित समय और हजारों किलोमीटर दूर दुश्मन के इलाके में अंजाम दिए गए इस बचाव अभियान ने सैन्य इतिहास में एक खास जगह बनाई.