
महिलाओं के खिलाफ अपराध की बात अक्सर उस वक्त शुरू होती है, जब कोई बड़ी घटना हो चुकी होती है. लेकिन उससे पहले होने वाली उन हरकतों पर कम ही बात होती है. आज दिल्ली के सार्वजनिक स्थानों पर यह महिलाओं के दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुका है जब कोई लगातार उन्हें घूरता है, पीछा करता है, रास्ते में रोकता है या बार-बार बात करने की कोशिश करता है.
इन घटनाओं में हर बार पुलिस की गाड़ी नहीं आती. हर घटना में एफआईआर भी दर्ज नहीं होती. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कुछ हुआ ही नहीं. इसी को समझने के लिए आजतक की चार महिला पत्रकार देर रात दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचीं. उन्होंने सुनसान गलियों या वीरान जगहों को नहीं चुना. वे उन जगहों पर गईं जहां दिल्ली की रोजमर्रा की जिंदगी चलती है. ये जगह थीं- बाजार, अस्पताल, कॉलेज, मंदिर और दफ्तरों के इलाके.

मूलचंद: एक 'नहीं' के बाद भी बार-बार सवाल
शाम करीब 7:30 बजे मूलचंद अस्पताल के पास का इलाका था. दफ्तरों से लौटने का समय था. सड़क पर गाड़ियां, पैदल चलने वाले लोग और ट्रैफिक मौजूद था. इसी भीड़ के बीच महिला पत्रकार ऐश्वर्या पल्लिवाल को एक कार सवार ने रोककर पूछा, 'ड्रॉप कर दूं?' रिपोर्टर ने मना कर दिया. लेकिन बात वहीं खत्म नहीं हुई.
उस व्यक्ति ने फिर पूछा, 'कंपनी चाहिए?'
रिपोर्टर ने दोबारा मना किया. युवक ने खुद को 'अच्छा लड़का' बताया. तीसरी बार साफ मना करने के बाद उसने कार आगे बढ़ा दी. लेकिन करीब 50 मीटर आगे जाने के बाद उसने कार वापस मोड़ ली.
फिर सवाल आया, 'पक्का?'
यानी एक महिला को अपनी बात मनवाने के लिए तीन बार 'नहीं' कहना पड़ा.
यह सड़क पर होने वाली ऐसी घटनाओं की मुश्किल तस्वीर दिखाता है, जिन्हें हमेशा सीधे अपराध की श्रेणी में रखना आसान नहीं होता. महिला के लिए यह डर या असहजता पैदा कर सकता है, लेकिन बाहर से देखने वाले के लिए यह सिर्फ बातचीत जैसी लग सकती है.

पश्चिमी दिल्ली में भी ऐसे ही मिले हालात
पत्रकार जेसिका गोयल ने पश्चिमी दिल्ली के पटेल नगर, कीर्ति नगर, राजौरी गार्डन, जनकपुरी और तिलक नगर का दौरा किया. सब कुछ सामान्य दिख रहा था. लेकिन इसी सामान्य माहौल में कई बार पुरुष बाइक या कार रोककर महिलाओं को देखते नजर आए.
पटेल नगर और कीर्ति नगर में बाइक और कार सवारों के रुककर घूरने की घटनाएं सामने आईं. राजौरी गार्डन के बस स्टॉप पर भी कुछ बाइक बिना किसी साफ वजह के रुकीं. जनकपुरी में हैप्पी मॉडल स्कूल के पास एक कार कुछ दूरी तक जेसिका के पीछे आती दिखी.
कार सवार व्यक्ति ने उनसे बात नहीं की. वह कार से बाहर निकला, सिगरेट जलाई और बार-बार जेसिका की तरफ देखता रहा. दूर से देखने पर कहा जा सकता है कि कुछ हुआ ही नहीं. लेकिन एक महिला के लिए पीछा किया जाना भी एक घटना है. लगातार देखा जाना भी एक घटना है. बिना वजह पास आना भी एक घटना है. और किसी के व्यवहार से लगातार असहज महसूस करना भी मायने रखता है.
भारती कॉलेज के पास कुछ जगहों पर अंधेरा और कम रोशनी नजर आई. तिलक नगर में एक व्यक्ति जेसिका के बेहद करीब से निकला और ऐसा लगा कि वह उसे छूने की कोशिश कर रहा था. न कोई बड़ा हंगामा हुआ. न पुलिस की गाड़ी आई. बस दिल्ली की सड़क पर एक और दिन गुजर गया जब किसी महिला को इस तरह असहज होना पड़ा.

एम्स: एक घंटे में 7-8 गाड़ियां रुकीं
इसके बाद टीम दक्षिण दिल्ली पहुंची. लाजपत नगर और एम्स इलाके में पत्रकार कार्तिकी अरोड़ा ने करीब एक घंटे तक एक जगह खड़े होकर स्थिति देखी. इस दौरान 7 से 8 गाड़ियां रुकीं. ज्यादातर लोगों ने कहीं छोड़ने की पेशकश की. कुछ गाड़ियां आगे निकल गईं, लेकिन कई बार लोग दोबारा लौटे, जबकि उन्हें पहले ही मना किया जा चुका था.
कैमरे में एक व्यक्ति को कहते सुना गया- 'मिलेंगी?'
यानी यहां भी एक घंटे में 7-8 गाड़ियां रुकीं. 2-3 गाड़ियां मना करने के बाद वापस आईं. 2-3 लोगों ने पूछा- 'मिलेंगी?'
कार्तिकी किसी से लिफ्ट मांगने के लिए वहां खड़ी नहीं थीं. वह किसी गाड़ी को रोक भी नहीं रही थीं. फिर भी करीब एक घंटे में कई गाड़ियां उनके पास आकर रुकीं. एक महिला के लिए ये छोटी-छोटी घटनाएं लगातार होती रहें तो वह हर गाड़ी, हर आदमी और हर मोड़ पर नजर रखने लगती है. हर असहज करने वाला व्यवहार शब्दों में नहीं होता.
कई बार सिर्फ किसी का लगातार देखना ही काफी होता है. ऐसा ही कुछ हौज खास विलेज के एंट्री गेट पर दिखा. यहां एक व्यक्ति बैठा महिलाओं को देखता रहा. वह न उठा, न उसने कुछ कहा. वह बस बैठा रहा और अगली महिला के वहां से गुजरने का इंतजार करता रहा.
एक बाइक वहां से गुजरी. दो महिलाएं भी आगे बढ़ीं. बाइक सवार ने अपना सिर लगभग 180 डिग्री तक घुमाकर उनकी तरफ देखा. सवाल यह है कि अगर किसी महिला को इस तरह घूरना इतना आम हो जाए कि ऐसा करने वाले को पकड़े जाने की भी चिंता न रहे, तो समाज में इसे लेकर असहजता कब खत्म हो गई?
एक हनुमान मंदिर के बाहर चार-पांच पुरुष बैठे थे. एक अधेड़ महिला मंदिर में आईं. उन्होंने पूजा की और बाहर निकलते समय झुकीं. इसी दौरान वहां बैठे एक व्यक्ति की नजर उनके शरीर पर टिकी रही. यहां भी सवाल है कि महिलाएं पूजा के लिए झुकती हैं. लेकिन उनके लिए यह किसी दूसरे व्यक्ति को उन्हें घूरने का मौका क्यों बनना चाहिए?
हौज खास में दो विदेशी महिलाएं पुरुषों के एक ग्रुप के सामने से गुजरीं. यहां सिर्फ एक व्यक्ति नहीं देख रहा था. एक ने देखा. दूसरे को इशारा किया. फिर दूसरे ने भी मुड़कर देखा. यानी कभी-कभी किसी महिला को घूरना एक व्यक्ति की हरकत नहीं रहता, बल्कि पूरे ग्रुप के लिए मनोरंजन जैसा व्यवहार बन जाता है. महिला के लिए परेशानी सिर्फ एक व्यक्ति की नजर नहीं होती. परेशानी यह भी है कि आसपास बैठे लोगों को इसमें कुछ गलत नजर नहीं आता.

दिल्ली के 'सुरक्षित' इलाकों में भी यही सवाल
इसके बाद टीम कनॉट प्लेस पहुंची. राजधानी का सबसे व्यस्त और रोशनी वाला इलाका. भीड़, दुकानें और लगातार आवाजाही. कागज पर ऐसी जगह को सुरक्षित माना जा सकता है. लेकिन ध्यान से देखें तो यहां भी वही हरकतें नजर आती हैं. एक नजर. फिर दूसरी. लंबे समय तक घूरना. महिला का इसे महसूस करना. और फिर उसका अपना व्यवहार बदल जाना. ऐसी स्थिति में कोई एक पल ऐसा नहीं होता, जिसे देखकर तुरंत कहा जा सके कि यही अपराध है. लेकिन लगातार होते ये छोटे-छोटे अनुभव मिलकर एक बड़ा असर पैदा करते हैं.
'पुरुषों का घूरना तो बहुत सामान्य हो गया है'
एक राहगीर लड़की प्रयांशी ने बताया कि उनके लिए पुरुषों का इस तरह घूरना अब बहुत सामान्य हो गया है. उन्होंने एक घटना याद करते हुए बताया कि वह ऑटो में बैठी थीं. दो लोग, जो शराब के नशे में लग रहे थे, उनसे बार-बार कह रहे थे, 'मैम, हमारे साथ चलो.'
उनका कहना था कि ऐसी घटनाएं इतनी बार होती हैं कि अब सामान्य लगने लगी हैं. उन्होंने यह भी कहा कि वह सिर से पैर तक पूरी तरह ढकी हुई थीं, फिर भी इस तरह के व्यवहार का सामना करना पड़ा. उनका सवाल था कि आखिर महिलाओं को और क्या करना चाहिए? क्या उन्हें सुरक्षा के लिए बंदूक लेकर चलना पड़ेगा?
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि महिलाओं को ही घर में रहने या जल्दी लौटने की सलाह क्यों दी जाती है. पुरुषों पर ऐसी पाबंदियों की बात क्यों नहीं होती? उनके मुताबिक, 'पुरुषों को बेहतर व्यवहार करना सीखना होगा और बच्चों की परवरिश भी इसी सोच के साथ करनी होगी.'

जब महिलाएं इसके साथ जीना सीख लेती हैं
ऐसे ही जारा रिक्शे का इंतजार कर रही थीं. उनके सामने बैठे एक व्यक्ति की नजर लगातार उन पर थी. उन्हें यह असहज लगा. लेकिन दिल्ली में साढ़े तीन साल रहने के बाद उन्होंने कहा कि वह ऐसी घटनाएं इतनी बार देख चुकी हैं कि अब इनके साथ जीना सीख गई हैं. उन्होंने कहा कि महिलाएं धीरे-धीरे ऐसे व्यवहार की आदी हो जाती हैं और मान लेती हैं कि ऐसा होता रहेगा.
इसका असर सड़क से बाहर भी पड़ता है. उनके मुताबिक, ऐसे अनुभवों की वजह से महिलाएं देर रात बाहर निकलने में सहज महसूस नहीं करतीं. कई बार परिवार से बाहर जाने की बात कहने में भी झिझक होती है. उन्हें बहाने बनाने पड़ते हैं. यानी किसी पुरुष की सड़क पर की गई हरकत का असर महिला की अपनी आजादी तक पहुंच सकता है.
एक छूने की कोशिश ने बदल दिया सार्वजनिक जगहों का अनुभव
इंदु ने दिल्ली मेट्रो की भीड़ में हुई एक घटना के बारे में बताया. उनके मुताबिक, किसी व्यक्ति ने जानबूझकर उन्हें गलत तरीके से छूने की कोशिश की. उन्होंने कहा, 'मुझे महसूस हुआ. यह गलती से नहीं हुआ था.' इंदु दूसरे कोच में चली गईं. लेकिन घटना वहीं खत्म नहीं हुई. अब जब वह पार्क में दौड़ती हैं तो पीछे मुड़कर देखती रहती हैं कि कहीं कोई उनका पीछा तो नहीं कर रहा. उनके मुताबिक, यह लगातार बना रहने वाला डर है. यानी एक घटना, एक छूने की कोशिश और कुछ सेकंड का अनुभव आगे चलकर महिला के सार्वजनिक जगहों पर इस्तेमाल करने के तरीके को बदल सकता है.
महिला सुरक्षा की चर्चा सिर्फ बलात्कार के बाद क्यों?
महिलाओं की सुरक्षा पर चर्चा किसी बड़े अपराध के बाद ही शुरू नहीं होनी चाहिए. हाल में दिल्ली-एनसीआर में बलात्कार की घटनाओं के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर स्वत: संज्ञान लिया. पुलिस ने भी रात में गश्त, जांच और सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई है. आंतरिक सुरक्षा आकलन में संवेदनशील माने गए कुछ कॉलेजों के आसपास ITBP के जवान भी तैनात किए गए हैं. लेकिन सवाल है कि आखिर हम किस चीज की सुरक्षा कर रहे हैं? एक गेट की? एक सड़क की? एक कॉलेज की? या उस महिला के अधिकार की, जो बिना डर के सार्वजनिक जगह पर सिर्फ अपना काम करना चाहती है? सुरक्षा जरूरी है. पुलिस जरूरी है. सड़क पर रोशनी जरूरी है. CCTV जरूरी है. तेजी से जांच जरूरी है. जवाबदेही जरूरी है. लेकिन इसके साथ एक और चीज की जरूरत है. वह चीज न वर्दी पहनती है, न बैरिकेड लगाती है और न CCTV कैमरे में दिखाई देती है. वह है महिलाओं के प्रति समाज का रवैया.
(इनपुट: जेसिका गोयल और कार्तिकी अरोड़ा)