
हम सब दिन भर में न जाने कितनी बार जेब से फोन निकालकर खटाखट तस्वीरें खींचते हैं. चाय की प्याली हो, दोस्तों की महफिल, सड़क किनारे खिलता कोई फूल या सफर में खिड़की से दिखता ढलता सूरज, हम हर चीज को तुरंत कैद कर लेना चाहते हैं. कभी सोचकर देखिए कि इंसान के भीतर यह आदत आई कहां से? यह कोई आज के मोबाइल या कैमरे की देन नहीं है. इंसान जब से धरती पर आया है, उसकी सबसे बड़ी बेचैनी यही रही है कि जो पल अभी उसकी आंखों के सामने है, वह कहीं फिसल न जाए. हम वक्त को रोक तो नहीं सकते, लेकिन उस पल की एक परछाई अपने पास संभालकर जरूर रख सकते हैं. आज जिसे हम फोटोग्राफी कहते हैं, वह असल में वक्त की इसी बहती नदी से अपने पसंदीदा लम्हों को चुरा लेने की हजारों साल पुरानी इंसानी दास्तान है.
इस कहानी की शुरुआत किसी कांच के लेंस या कैमरे के पुर्जों से नहीं हुई थी. अगर हम अपनी मिट्टी और पुरानी कथाओं के पन्ने पलटें, तो रूप और अक्स को दर्ज करने का पहला सिरा हमारी पौराणिक परंपरा में मिलता है. विष्णुधर्मोत्तर पुराण के 'चित्रसूत्र' में एक बड़ी प्यारी कथा आती है. कहा जाता है कि भगवान नारायण बदरिकाश्रम में ध्यान लगाए बैठे थे. देवराज इंद्र को लगा कि उनका राज-पाट छिन जाएगा, तो उन्होंने ध्यान भटकाने के लिए स्वर्ग की सबसे रूपवती अप्सराओं की टोली भेज दी. अप्सराएं वहां पहुंचकर अपने हुस्न और अदाओं का जलवा दिखाने लगीं. भगवान नारायण ने न गुस्सा दिखाया और न कोई श्राप दिया. वे मुस्कुराए, पास खड़े आम के पेड़ से टपकता हुआ गाढ़ा रस अपनी उंगली पर लिया और अपनी ही जांघ पर एक स्त्री का रेखाचित्र बना दिया. वह चित्र इतना सजीव और रूपवान बना कि उसके सामने स्वर्ग की तमाम अप्सराओं की चमक फीकी पड़ गई. कथा कहती है कि वही रेखाचित्र आगे चलकर अप्सरा 'उर्वशी' के नाम से जाना गया और नारायण ने रूप को सतह पर उतारने की यही विधा देवशिल्पी विश्वकर्मा को सिखाई. हमारे पुरखों ने जब पहली बार किसी रूप को दर्ज करने की बात सोची, तो वह हाथ और कल्पना से बना ऐसा ही जीवंत अक्स था.
महाभारत के दौर में आइए, तो वहां यह हुनर सिर्फ ध्यान और पूजा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि याददाश्त के सहारे किसी का हूबहू चेहरा उतारने का जरिया बन गया. बाणासुर की बेटी उषा ने एक रात सपने में एक बेहद सुंदर नौजवान को देखा. आंख खुली तो दिल उसी अनजाने चेहरे पर अटका रह गया. न नाम मालूम था, न पता, न यह खबर कि वह कौन है. उस वक्त काम आई उषा की सहेली चित्रलेखा. चित्रलेखा के पास कोई आज का स्केच सॉफ्टवेयर या कैमरा नहीं था, लेकिन उसके हाथों में कमाल का हुनर था. उसने उषा से पूछा कि वह कैसा दिखता था? उषा ने जैसा-जैसा हुलिया बताया, चित्रलेखा ने कपड़े के टुकड़े पर उस दौर के राजाओं, राजकुमारों, देवताओं और गंधर्वों के चेहरे एक-एक करके हूबहू उतारने शुरू कर दिए. जब उसने द्वारका के कृष्ण के प्रपौत्र अनिरुद्ध का चेहरा खींचा, तो उषा ने एक झटके में पहचान लिया कि यही वह शख्स है. आज की पुलिस जिसे हुलिया देखकर बनाया गया 'मेमोरी स्केच' कहती है, हजारों साल पहले चित्रलेखा ने अपनी कूची (चित्र बनाने वाला ब्रश) से वही कमाल कर दिखाया था.
गुफाओं की दीवारों से शुरू हुआ तस्वीरों का सफर
लेकिन अगर हम कथाओं से निकलकर जमीन की हकीकत और इतिहास पर आएं, तो यह कहानी और भी ज्यादा दिलचस्प हो जाती है. मध्य प्रदेश के रायसेन में भीमबेटका की गुफाएं हैं. आज से करीब तीस हजार साल पहले, जब इंसान के पास ठीक से पहनने को कपड़े नहीं थे, जब कोई भाषा या लिपि नहीं बनी थी, तब भी उसके भीतर अपने आज को रोक लेने की बेचैनी थी. गुफाओं की पथरीली दीवारों पर आदिमानव ने जंगलों से लाल गेरू, चूना, लकड़ी का कोयला और जानवरों की चर्बी मिलाकर रंग बनाए. फिर पत्थरों पर डिजाइन किया, शिकार के पीछे दौड़ते लोग, हाथ में हाथ डालकर नाचता कुनबा, घोड़े और बारहसिंगा. वह उस दौर का 'फोटो एल्बम' था. उस आदिमानव ने अपने शिकार और उत्सव को इसलिए पत्थर पर टांग दिया, ताकि आने वाले लोग जान सकें कि हम यहां रहते थे, ऐसे जीते थे और ऐसे लड़ते थे.
सदियां गुजरती गईं. चित्रकार राजाओं की तस्वीरें बनाते रहे, युद्ध के मैदान रंगते रहे, लेकिन हाथ से बनाई गई तस्वीर में हमेशा कलाकार की अपनी पसंद-नापसंद और उसकी कल्पना घुल जाती थी. दुनिया को इंतजार था एक ऐसे तरीके का, जिसमें दुनिया जैसी दिखती है, बिल्कुल वैसी की वैसी, बिना किसी लाग-लपेट के दर्ज हो जाए.
जब रोशनी ने कैमरे का रास्ता दिखाया
इसके बाद शुरू हुआ रोशनी का वो खेल, जिसने कैमरे की नींव रखी. पांचवीं सदी ईसा पूर्व में चीन के दार्शनिक मोजी और ग्यारहवीं सदी में अरब के विद्वान अल-हसन इब्न अल-हैथम ने कुदरत का एक गजब नियम खोज निकाला. उन्होंने देखा कि अगर एक बिल्कुल अंधेरे कमरे की बाहरी दीवार में एक बारीक सा छेद कर दिया जाए, तो बाहर धूप में खड़े पेड़, मकान या इंसान का उल्टा अक्स अंदर की दीवार पर रोशनी बनकर नाचने लगता है. इसे लैटिन में कहा गया 'कैमरा ऑब्स्कूरा' यानी अंधेरा कमरा.
यह इतना अनोखा तरीका था कि आगे चलकर यूरोप के बड़े-बड़े चित्रकार लकड़ी के छोटे बक्से बनाने लगे, जिसमें आगे शीशा लगा होता था. सामने जो भी नजारा होता, बक्से के भीतर ट्रेसिंग पेपर पर उसका अक्स उभर आता और चित्रकार पेंसिल फेरकर झटपट स्केच बना लेते. पर इसमें एक बड़ी उलझन थी. जब तक रोशनी थी, अक्स दिखता था; जैसे ही ढक्कन बंद करो या धूप ढले, तस्वीर गायब. अक्स को हमेशा के लिए किसी कागज या प्लेट पर चिपका लेने की कोई तरकीब किसी के पास नहीं थी.
इस पहेली को सुलझाने की कोशिश उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में फ्रांस के वैज्ञानिक जोसेफ नाइसफोर निप्स ने की. उन्होंने रोशनी की मदद से तस्वीर को हमेशा के लिए दर्ज करने के लिए कई प्रयोग किए. आखिरकार उन्होंने बिटुमेन ऑफ जूडिया नाम के प्राकृतिक डामर जैसे पदार्थ को पीव्टर (टिन आधारित मिश्रधातु) की चमकदार प्लेट पर लगाया. रोशनी पड़ने पर बिटुमेन सख्त हो जाता था. यही सख्त परत बाद में तस्वीर का आधार बनी.
1826-27 के आसपास निप्स ने इस प्लेट को कैमरा ऑब्स्कूरा में लगाया और अपने घर Le Gras की खिड़की से बाहर का दृश्य रिकॉर्ड किया. प्लेट को कई घंटों तक रोशनी में रखा गया. लंबे समय तक इसे करीब आठ घंटे का एक्सपोजर माना जाता रहा है, हालांकि बाद के शोध में इसे कई दिनों तक चलने की संभावना भी बताई गई है. प्लेट को निकालने के बाद निप्स ने इसे लैवेंडर ऑयल और सफेद पेट्रोलियम के मिश्रण से धोया. इससे वह बिटुमेन हट गया जिस पर पर्याप्त रोशनी नहीं पड़ी थी. प्लेट पर घर की इमारतें, पेड़, कबूतरखाना और आसपास का हिस्सा दिखाई देने लगा. इस तस्वीर को 'View from the Window at Le Gras' कहा गया. इसे आज दुनिया की सबसे पुरानी बची हुई कैमरा-तस्वीर माना जाता है.
निप्स ने रास्ता तो दिखा दिया, लेकिन उनकी तस्वीर बनाने की प्रक्रिया बहुत धीमी थी. इसी काम को आगे बढ़ाया उनके साथी लुई-जैक्स-मैंडे डैग्यूरे ने. डागेरे ने चांदी की परत चढ़ी तांबे की प्लेट को आयोडीन से प्रकाश के प्रति संवेदनशील बनाया. तस्वीर लेने के बाद उसे गर्म पारे की भाप से विकसित किया जाता था. इस तकनीक को डागेरोटाइप कहा गया. 1839 में इसे सार्वजनिक किया गया. शुरुआत में इसमें भी कई मिनट का एक्सपोजर लगता था, लेकिन बाद के सुधारों से यह समय काफी कम होता गया.
जब तस्वीर में पहली बार इंसान कैद हुआ
इसी दौर में 1838 में पेरिस की एक सड़क पर फोटोग्राफी का इतिहास बदलने वाला पल दर्ज हुआ. फ्रांस फोटोग्राफर के लुई-जैक्स-मैंडे डैग्यूरे अपनी बनाई डागेरोटाइप तकनीक से पेरिस के मशहूर बुलेवार्ड डू टेम्पल (Boulevard du Temple) की तस्वीर खींची. उस समय एक तस्वीर लेने में करीब 10 मिनट का एक्सपोजर लगता था. इस दौरान सड़क पर गाड़ियां चलती रहीं, लोग आते-जाते रहे, लेकिन लगातार चलते रहने की वजह से वे तस्वीर में दर्ज नहीं हो सके. नतीजा यह हुआ कि तस्वीर में पूरी सड़क लगभग खाली दिखाई दी.
लेकिन सड़क के एक किनारे एक शख्स जूते पॉलिश करवाते हुए काफी देर तक एक जगह खड़ा रहा. उसके पैरों के पास बैठा जूता पॉलिश करने वाला भी कुछ समय तक स्थिर रहा. इसलिए दोनों कैमरे में दर्ज हो गए. इसे इंसान की पहली तस्वीर माना जाता है.
19 अगस्त 1839 को पेरिस में डागेरोटाइप तकनीक को आधिकारिक तौर पर दुनिया के सामने पेश किया गया. फ्रांस की एकेडमी ऑफ साइंसेज की बैठक में लुई डैग्यूरे की इस नई फोटोग्राफी प्रक्रिया का ऐलान हुआ. इसके बाद यह तकनीक तेजी से दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुंचने लगी. यही वजह है कि 19 अगस्त की तारीख फोटोग्राफी के इतिहास में बेहद अहम मानी जाती है.
रील से डिजिटल कैमरे तक कैसे बदली तस्वीरों की दुनिया
इसके बाद तो जैसे तस्वीरों की दुनिया में पंख लग गए. 1841 में हेनरी फॉक्स टैलबोट ने कागज के निगेटिव वाली प्रक्रिया को बेहतर बनाया, जिसे 'कैलोटाइप' कहा गया. इससे एक ही निगेटिव से तस्वीर की कई प्रतियां बनाना संभव हो गया. 1861 में तीन रंगों के फिल्टर की मदद से पहली रंगीन तस्वीर का प्रयोग हुआ. फिर भी उस दौर में फोटोग्राफी आम लोगों की पहुंच से दूर थी. कैमरे भारी होते थे, कांच की प्लेटों को संभालना मुश्किल था. तस्वीर खींचने के लिए खास तैयारी की जरूरत पड़ती थी, इसलिए यह काम प्रशिक्षित फोटोग्राफर ही कर पाते थे.
तस्वीर को आम इंसान के झोले तक पहुंचाने का काम किया जॉर्ज ईस्टमैन ने. 1888 में उन्होंने कांच की प्लेट्स हटाकर प्लास्टिक की लचीली रील बनाई और बाजार में उतारा 'कोडक बॉक्स कैमरा'. उनका एक नारा पूरी दुनिया में मशहूर हो गया "आप बस बटन दबाइए, बाकी काम हम कर देंगे." इस एक लाइन ने महलों और स्टूडियो से तस्वीरें निकालकर सीधे आम घरों के आंगन में पहुंचा दीं. अब बच्चों के जन्मदिन, शादियां और छुट्टियां पारिवारिक एल्बमों में सजने लगीं.

सालों तक रील, डार्क रूम और लाल बत्ती वाले कमरों में तस्वीरें धुलती रहीं. फिर 1975 में कोडक के ही एक नौजवान इंजीनियर स्टीव सैसन ने चुपचाप दुनिया का पहला डिजिटल कैमरा बना दिया. करीब साढ़े तीन किलो वजन और 0.01 मेगापिक्सल वाला यह डिब्बा कैसेट टेप पर बाइनरी कोड में ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर दर्ज करता था और एक फोटो सेव करने में 23 सेकंड का वक्त लेता था. उस वक्त कोडक के अफसरों ने इसे महज एक खिलौना समझकर नजरअंदाज कर दिया था. उन्हें क्या पता था कि कैसेट पर रिकॉर्ड होने वाला यह छोटा सा प्रयोग एक दिन रील और केमिकल का पूरा साम्राज्य खत्म कर देगा.
साल 2009 में ऑस्ट्रेलिया के फोटोग्राफर कोर्स्के आरा ने दुनिया भर के फोटोग्राफरों को एक धागे में पिरोने के लिए 19 अगस्त की उसी ऐतिहासिक तारीख को चुना और इस खास दिन की पहल शुरू की. इसके बाद 19 अगस्त 2010 को पहली बार औपचारिक तौर पर विश्व फोटोग्राफी दिवस का जलसा सजा, जिसमें एक वैश्विक ऑनलाइन फोटो गैलरी आयोजित हुई. इस पहली गैलरी में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से 270 तस्वीरें साझा की गईं और यहीं से 19 अगस्त को फोटोग्राफी के अंतरराष्ट्रीय जश्न के तौर पर मनाने का सिलसिला शुरू हुआ, जो आज हर साल पूरी दुनिया में धूमधाम से मनाया जाता है.
19 अगस्त की तारीख को चुनने के पीछे की वजह सिर्फ एक पुरानी तकनीक की सालगिरह मनाना भर नहीं है. असल में यह दिन उस ऐतिहासिक लम्हे को सलाम करने का जरिया है, जब 1839 में फ्रांस की सरकार ने लुई डागेरे की इस खोज को अपने पास दबाकर रखने के बजाय पूरी इंसानियत के नाम कर दिया था. यह दिन याद दिलाता है कि कैसे एक छोटे से आविष्कार ने इतिहास, संस्कृति और आम इंसान के जीने के ढंग को हमेशा के लिए बदल दिया.
फोटोग्राफी सिर्फ कैमरे की तकनीकी समझ नहीं है, बल्कि दुनिया को देखने का एक नजरिया है. चाहे कोई नौसिखिया फोन से अपने शहर की गली का अक्स उतार रहा हो या कोई पेशेवर फोटोग्राफर युद्ध और आपदा के बीच खड़ी दुनिया का दर्द दर्ज कर रहा हो, यह दिन हर उस इंसान का उत्सव है जो एक फ्रेम में पूरी कहानी कह देता है. यह तारीख हमें सिखाती है कि तस्वीरें सिर्फ दीवार पर टंगने के लिए नहीं होतीं, बल्कि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास का सबसे पक्का और सच्चा दस्तावेज होती हैं.
आज हम जिस दौर में जी रहे हैं, वहां फोटोग्राफी किसी अंधेरे बक्से या केमिकल के घोल की मोहताज नहीं रह गई है. आज हमारी जेब में पड़ा मोबाइल फोन सेकंड के सौवें हिस्से में दर्जनों फ्रेम प्रोसेस करके घने अंधेरे में भी दिन का उजाला दिखा देता है.
लेकिन तकनीक चाहे जितनी बदल गई हो, इंसान का जज्बा आज भी वही है. आम के रस से जांघ पर खींची गई पहली लकीर से लेकर, भीमबेटका के पत्थरों पर गेरू के निशानों, निप्स की आठ घंटे धूप में तपती प्लेट और आज के स्मार्टफोन की स्क्रीन तक, यह पूरी यात्रा असल में इंसान की इसी एक चाहत की गवाही देती है कि जिंदगी भले अपनी रफ्तार से आगे निकल जाए, पर उसके कुछ खूबसूरत पड़ाव हमारी मुट्ठी में हमेशा के लिए मुस्कुराते रहें.