प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) के शताब्दी समारोह में शामिल हुए. इस मौके पर पीएम मोदी ने कॉलेज की 100 साल की उपलब्धियों की सराहना करते हुए कहा कि SRCC ने बिजनेस, सार्वजनिक जीवन और समाज के लिए कई पीढ़ियों के नेतृत्व को तैयार किया है. प्रधानमंत्री ने शताब्दी समारोह के अवसर पर 100 रुपये का स्मारक सिक्का भी जारी किया.
पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा, 'आज का अवसर श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के लिए बहुत ऐतिहासिक है. यह देश के शिक्षा क्षेत्र के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है. SRCC का हिस्सा रही कई पीढ़ियां आज यहां एक साथ आई हैं. प्रधानमंत्री ने आगे कहा, 'मैं SRCC के शताब्दी समारोह के अवसर पर आप सभी को बहुत-बहुत बधाई देता हूं.'
पीएम मोदी ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा- 'इस कैंपस से बाहर निकलने के बाद आपका सामना एक नई दुनिया से होगा. वहां आपको दो तरह के लोग मिलेंगे. एक वे लोग होंगे, जो समाज की शक्ति को सकारात्मक रूप से राष्ट्र की शक्ति में बदलते हैं. दूसरी तरह के वे लोग होंगे, जो कोई भी काम शुरू होते ही ‘नाराज फूफा’ बन जाते हैं. उनका पसंदीदा काम हर चीज का विरोध करना है. उनका एक ही डायलॉग होता है ‘इसकी क्या जरूरत है?'
उन्होंने कहा, 'जब हम दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा बना रहे थे, तब ‘फूफा’ ने कहा—इसकी क्या जरूरत है? जब हमने हाई-स्पीड ट्रेन पर काम शुरू किया, तब फिर ‘फूफा’ ने कहा, इसकी क्या जरूरत है? जब हमने UPI शुरू किया, तो इन्हीं ‘फूफाओं’ ने पूछा, UPI की क्या जरूरत है? जब हमने संसद की नई इमारत बनाई, तब भी उन्होंने कहा—इसकी क्या जरूरत है?'
पीएम मोदी ने कहा, 'हमने देश के लिए अपना जीवन समर्पित करने और सर्वोच्च बलिदान देने वाले हमारे वीर सैनिकों के लिए स्मारक बनाया, तो ‘फूफा’ फिर मैदान में आ गए और पूछने लगे—इसकी क्या जरूरत थी? लेकिन भारत ने इन सभी ‘फूफाओं’ को जवाब दिया है. देश के लिए जो जरूरी है, उसे करने से भारत को कोई नहीं रोक सकता.'
'मैं जानता हूं, सच की हुंकार के आगे झूठ की गूंज टिक नहीं सकेगी.'
उन्होंने कहा, 'ये मोदी है. जो ‘माई-बाप’ कल्चर के हिमायती हैं, उनके सामने चट्टान बनकर खड़ा है. मेरे अंदर हिम्मत है, इसलिए उस दिन जो कहा था, आज उसकी याद भी दिला रहा हूं. मैं अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर आपके सामने आया हूं.'
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, '2013 में इसी कार्यक्रम में जब मैंने कहा था कि हमें ‘मेड इन इंडिया’ की दिशा में काम करना चाहिए, तब उस समय के इकोसिस्टम के लोग इसे समझ ही नहीं पाए थे. निराशा के उस दौर में उन्हें लगता था कि ‘मेड इन इंडिया’ संभव ही नहीं है. उसी सोच में पले-बढ़े लोग आज भी ‘मेड इन इंडिया’ का मजाक उड़ाते हैं. लेकिन आज आप ‘मेक इन इंडिया’ की ब्रांड वैल्यू देख सकते हैं.'