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POCSO केस में तुरंत गिरफ्तारी नहीं... तलाक-कस्टडी की लड़ाई में कानून पर SC सख्त

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि तलाक और कस्टडी विवाद से जुड़े खास पॉक्सो मामलों में पुलिस तुरंत गिरफ्तारी से पहले बच्चे का मनोवैज्ञानिक आकलन कराए. कोर्ट के मुताबिक यह कदम बच्चे पर दबाव कम करने, झूठे आरोपों से होने वाले अपूरणीय नुकसान को रोकने और जांच अधिकारी को संतुलित फैसला लेने में मदद के लिए है.

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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पुलिस बिना वेरिफिकेशन के किसी को अरेस्ट नहीं कर सकती. (सांकेतिक तस्वीर)
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पुलिस बिना वेरिफिकेशन के किसी को अरेस्ट नहीं कर सकती. (सांकेतिक तस्वीर)

तलाक और बच्चे की कस्टडी को लेकर माता-पिता के बीच चल रही लड़ाई में POCSO कानून के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने ऐसे मामलों में आरोपी की तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए कई सुरक्षा उपाय तय किए हैं. कोर्ट ने कहा कि POCSO कानून का इस्तेमाल किसी से हिसाब बराबर करने के लिए नहीं किया जा सकता.

यह फैसला एक लंबे और कड़वे तलाक और कस्टडी विवाद से जुड़े मामले में आया. कोर्ट ने कहा कि जब पति-पत्नी के बीच पहले से विवाद चल रहा हो और बच्चे के साथ रहने वाले माता-पिता या उनके परिवार के किसी सदस्य पर POCSO का आरोप लगाया जाए, तो पुलिस को गिरफ्तारी से पहले कुछ जरूरी कदम उठाने होंगे.

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इन दो हालात में लागू होंगे नए नियम

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि ये सुरक्षा उपाय हर POCSO केस में लागू नहीं होंगे. इसके लिए दो शर्तें पूरी होना जरूरी है. पहली, आरोप बच्चे के माता-पिता या उनके ऐसे परिवार के सदस्य पर हो जो उसी घर में रहता है. दूसरी, बच्चे के माता-पिता के बीच पहले से वैवाहिक विवाद चल रहा हो. पुलिस को पहले यह देखना होगा कि दोनों शर्तें पूरी होती हैं या नहीं. अगर दोनों हालात मौजूद हैं तो पुलिस को जल्दबाजी में आरोपी को गिरफ्तार नहीं करना चाहिए.

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बच्चे का होगा विशेषज्ञ से मूल्यांकन

कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामले में जांच अधिकारी को जिला बाल संरक्षण इकाई के जरिए बाल मनोवैज्ञानिक या काउंसलर और बाल कल्याण समिति यानी CWC के जरिए सपोर्ट पर्सन की मदद लेनी होगी. विशेषज्ञ बच्चे का मूल्यांकन करेंगे और यह देखा जाएगा कि आरोपी माता-पिता या परिवार के सदस्य द्वारा बच्चे के साथ यौन शोषण किए जाने को लेकर 'विश्वास करने का आधार' है या नहीं. इस दौरान यह भी ध्यान रखना होगा कि बच्चे पर किसी तरह का दबाव न पड़े और उसे बार-बार पूछताछ या परेशानी का सामना न करना पड़े.

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जांच बंद नहीं होगी, गिरफ्तारी पर फैसला बाद में

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि बच्चे का मूल्यांकन कराने का मतलब यह नहीं है कि POCSO आरोपों की जांच रोक दी जाएगी. विशेषज्ञ की रिपोर्ट जांच का हिस्सा होगी और गिरफ्तारी या चार्जशीट पर फैसला लेते समय इसे दूसरे सबूतों के साथ देखा जाएगा. गिरफ्तारी करनी है या नहीं, इसका अंतिम फैसला जांच अधिकारी को सभी हालात पर विचार करने के बाद लेना होगा.

कोर्ट ने कहा कि POCSO कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए है और इसकी गंभीरता कम नहीं की जा सकती. लेकिन तलाक और कस्टडी की लड़ाई में इसके गलत इस्तेमाल से बच्चे और आरोपी, दोनों को नुकसान हो सकता है. इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए ये सुरक्षा उपाय तय किए गए हैं.

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