भारत में चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध अचानक तेज हो गया है. 23 सितंबर से 2 अक्टूबर के बीच सिर्फ 10 दिनों में देशभर में 278 प्रदर्शन हुए. देश के के 26 राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए हैं. अब सबकी नजर 10 अक्टूबर पर टिकी हैं, जब दिल्ली में कई छात्र संगठन और कॉकरोच जनता पार्टी संयुक्त प्रदर्शन करेंगे.
ये वही संगठन हैं, जिसके नेतृत्व में जुलाई में प्रदर्शन हुए थे और इसके बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पद से इस्तीफा देना पड़ा था. इस बार निशाने पर हैं मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार. प्रदर्शनकारी SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को लेकर उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं.
विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं. वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया डुप्लीकेट और अपात्र लोगों के नाम हटाने के लिए है. विरोध का स्तर इतना व्यापक हो चुका है कि इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सिर्फ राजस्थान और सिक्किम को छोड़कर लगभग पूरे देश में प्रदर्शन हो रहे हैं. जम्मू-कश्मीर से लेकर पुडुचेरी तक चुनाव आयोग के खिलाफ आवाजें उठी हैं.
हालांकि हर प्रदर्शन का तरीका एक जैसा नहीं था. कई जगह रैलियां और मार्च निकाले गए, तो कई जगह मेमोरेंडम और विरोध-प्रदर्शन किए गए. राजस्थान का मामला दिलचस्प है. जयपुर में 28 सितंबर को कांग्रेस ने 'वोट चोरी' के मुद्दे पर मार्च निकाला, लेकिन इसे सीधे चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन नहीं माना गया.
इन प्रदर्शनों के पीछे सिर्फ राजनीतिक नाराजगी नहीं है. एक मीडिया रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में लिए गए फैसलों पर आपत्ति दर्ज की थी. ये आपत्तियां वोटर जोड़ने और हटाने जैसे फैसलों से जुड़ी थीं. चुनाव आयोग ने इसे अलग राय मानते हुए कहा कि फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं.
इस बीच 5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने या उनके खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगाने से इनकार किया. कोर्ट ने चुनाव आयोग और केंद्र सरकार से उन याचिकाओं पर जवाब मांगा है, जिनमें उनके खिलाफ सवाल उठाए गए हैं.
28 सितंबर को अचानक फूटा विरोध
278 में से 187 प्रदर्शन 28 सितंबर को दर्ज किए गए. इनमें कांग्रेस या उसके सहयोगी संगठनों की भागीदारी लगभग हर जगह रही. इसके तीन दिन पहले, 25 सितंबर को विपक्षी दलों ने देशभर में विरोध प्रदर्शन किया था. ACLED यानी आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट लोकेशन एंड इवेंट डेटा प्रोजेक्ट की इंडिया एनालिस्ट पूजा जॉर्ज के मुताबिक, यह विरोध जम्मू-कश्मीर से लेकर पुडुचेरी तक देखने को मिला.
दिल्ली को छोड़ दें तो 90 फीसदी से ज्यादा प्रदर्शन शांतिपूर्ण ढंग से हुए. हालांकि राजधानी में स्थिति अलग रही. ACLED के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में हुए प्रदर्शनों में पुलिस ने हस्तक्षेप किया. कहीं मामला बिगड़ने पर प्रदर्शनकारियों को हटाया गया, कहीं हिरासत में लिया गया, तो कहीं प्रदर्शन ही रोकना पड़ा.
ACLED की साउथ एशिया एनालिस्ट पर्ल पांड्या के मुताबिक, दिल्ली में पुलिस ने कई शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को भी बलपूर्वक रोका. उन्होंने विपक्ष नेता राहुल गांधी को लगातार दो दिनों तक हिरासत में लिए जाने का भी जिक्र किया. राजनीतिक तौर पर देखें तो यह आंदोलन फिलहाल मुख्य रूप से विपक्ष के इर्द-गिर्द है. 80 फीसदी से ज्यादा प्रदर्शनों में कांग्रेस या उसके सहयोगी संगठनों की भागीदारी देखने को मिली. वहीं जुलाई में सड़कों पर उतरी कॉकरोच जनता पार्टी की मौजूदगी अब तक सिर्फ दो प्रदर्शनों में दिखी है.
विरोध प्रदर्शनों के बीच सियासी बयानबाजी भी तेज रही. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने चुनाव आयोग पर सरकार के हाथों की कठपुतली बनने का आरोप लगाया. इस पर पलटवार करते हुए बीजेपी ने कांग्रेस पर संस्थाओं को निशाना बनाने और देश में अराजकता फैलाने का आरोप लगाया.
ACLED के मुताबिक, 10 दिनों का यह आंकड़ा पिछले डेढ़ साल में हुए कुल प्रदर्शनों के करीब आधे के बराबर है. फिर भी यह विरोध जुलाई में हुए आंदोलन जितना बड़ा नहीं है. जुलाई में पेपर लीक और परीक्षा से जुड़े प्रदर्शनों की रफ्तार इन प्रदर्शनों की तुलना में करीब दोगुना थी. हालांकि यह समझना जरूरी है कि ये आंकड़े अंतिम नहीं हैं, बाद में इनमें फेर-बदल भी हो सकता है. उदाहरण की बात करें तो जुलाई के एक हफ्ते में प्रदर्शनों की संख्या बाद में 412 से बढ़कर 475 हो गई थी.
अब क्या कर रहा चुनाव आयोग?
चुनाव आयोग ने अभी तक ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर कोई कदम नहीं उठाया है. हालांकि 1 अक्टूबर के पत्र में आयोग ने राज्य चुनाव अधिकारियों को मौजूदा वोटर लिस्ट की पुरानी सूची से तुलना करने को कहा है. जिन लोगों के नाम इस प्रक्रिया में हटे हैं, उनके घर जाकर जानकारी जुटाने के निर्देश भी दिए गए हैं. यह अभियान करीब एक महीने चलने वाला है.
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इसके अलावा आयोग ने 6 अक्तूबर को संसद भवन परिसर में 240 सांसदों के साथ प्रस्तावित बैठक से भी इंकार कर दिया. आयोग ने इसे 'असामान्य' बताते हुए कहा कि ऐसी बैठकें उसके अपने कार्यालय में होती हैं. इसके अलावा सांसदों से ज्ञापन लेने के लिए आयोग ने वरिष्ठ अधिकारियों को भेजने की पेशकश की . लेकिन सासंदों ने इसे स्वीकार नहीं किया.
10 अक्टूबर का दिल्ली प्रदर्शन आगे की तस्वीर साफ करेगा. अब देखना यह होगा कि क्या ये प्रदर्शन इतना राजनीतिक दबाव बना पाएंगे कि चुनाव आयोग के प्रमुख को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़े?