नीट पेपर लीक विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया. साल 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के केंद्र की सत्ता में आने के बाद यह ऐसा पहला मामला नहीं है, जब जन आंदोलन, राजनीतिक दबाव या व्यापक विरोध के बीच उसे अपना फैसला बदलना पड़ा हो. पिछले एक दशक में कई ऐसे मौके आए हैं, जब केंद्र की मोदी सरकार को अपने फैसलों पर यू-टर्न लेना पड़ा या पीछे हटना पड़ा.
1. भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन (2015)
मोदी सरकार को 2015 में उस समय पीछे हटना पड़ा, जब उसने भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन का प्रस्ताव रखा था. सरकार का तर्क था कि इससे इंफ्रास्ट्रक्चर और इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट के लिए जमीन अधिग्रहण आसान होगा. लेकिन किसान संगठनों, विपक्षी दलों और एनडीए के कई सहयोगियों ने इसका जोरदार विरोध किया. उनका आरोप था कि इससे किसानों के अधिकार कमजोर होंगे. लगातार विरोध के बाद सरकार ने संशोधन विधेयक को आगे नहीं बढ़ाया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐलान किया कि मौजूदा कानून में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा.
2. मी टू आंदोलन और एम.जे. अकबर का इस्तीफा (2018)
अक्टूबर 2018 में 'मी टू' आंदोलन के दौरान तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री एम.जे. अकबर पर कई महिला पत्रकारों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए. अकबर ने सभी आरोपों से इनकार किया, लेकिन बढ़ते सामाजिक और राजनीतिक दबाव के बीच उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा. यह मोदी सरकार में सामाजिक दबाव के कारण किसी केंद्रीय मंत्री का पहला बड़ा इस्तीफा माना गया.
3. तीन कृषि कानूनों की वापसी (2021)
मोदी सरकार तीसरी बार नवंबर 2021 में बैकफुट पर देखने को मिली. केंद्र द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ देशभर के किसानों ने करीब एक साल तक आंदोलन किया. हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहे और कानून वापस लेने की मांग करते रहे. सरकार लंबे समय तक इन कानूनों का बचाव करती रही, लेकिन आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में तीनों कानून वापस लेने की घोषणा की. बाद में संसद ने इन्हें निरस्त करने वाला विधेयक भी पारित कर दिया.
4. यूपीएससी लेटरल एंट्री विज्ञापन वापसी (2024)
अगस्त 2024 में केंद्र सरकार ने यूपीएससी के जरिए सिविल सेवाओं में लेटरल एंट्री भर्ती का विज्ञापन वापस ले लिया. विपक्षी दलों के साथ-साथ एनडीए सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने भी इसमें आरक्षण का प्रावधान नहीं होने पर आपत्ति जताई थी. बढ़ते विरोध के बाद सरकार ने भर्ती प्रक्रिया रोकने का फैसला किया.
5. 131वां संविधान संशोधन विधेयक नहीं लाया (2025)
नवंबर 2025 में केंद्र सरकार ने संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पेश नहीं करने का फैसला किया. इस प्रस्ताव का दक्षिण भारत के राज्यों समेत कई राजनीतिक दलों ने कड़ा विरोध किया था. उनका कहना था कि इससे राज्य के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ेगा. लगातार विरोध के बाद सरकार ने विधेयक को आगे नहीं बढ़ाने का निर्णय लिया. यह विधेयक लोकसभा में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को शीघ्र लागू करने और लोकसभा की सीटें बढ़ाने से जुड़ा था.
ताजा मामला नीट पेपर लीक विवाद और उससे जुड़े छात्र आंदोलन के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है. जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन की सबसे बड़ी मांग धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा थी. सरकार के साथ कई दौर की बातचीत, प्रमुख मांगों पर सहमति, सरकार की ओर से शिक्षा सुधार के लिए उठाए गए कदमों और अंततः धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद आंदोलनकारियों ने अपना प्रदर्शन वापस लेने का ऐलान कर दिया.