दिल्ली के सत्य निकेतन में हुए PG हादसे में 7 लोगों की जान चली गई. कई लोग घायल है. हादसे के बाद अब PG और हॉस्टल की सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हैं. जर्जर इमारतों में रहने वाले छात्रों की मुश्किलें सामने आ रही हैं.
आजतक ने पहले भी 'ऑपरेशन हॉस्टल डेथ' के जरिए इलाके की हकीकत दिखाई थी. अब 'ऑपरेशन हॉस्टल डेथ 2.0' में PG के कारोबार से जुड़े कई चौंकाने वाले दावे सामने आए हैं.
आजतक ने सत्य निकेतन इलाके में छात्रों को PG दिलाने वाले एक ब्रोकर का स्टिंग किया. खुफिया कैमरे पर ब्रोकर ने दावा किया कि इलाके की किसी भी बिल्डिंग के पास सेफ्टी सर्टिफिकेट नहीं है. उसने यह भी दावा किया कि किसी बिल्डिंग का सेफ्टी ऑडिट नहीं हुआ है.
ब्रोकर के मुताबिक, सत्य निकेतन की ज्यादातर इमारतों में कई-कई मंजिलें हैं. हर मंजिल का मालिक अलग है. एक छात्र को PG दिलाने पर उसे करीब 4,500 से 5,000 रुपये तक का मार्जिन मिलता है.
बिजली के कनेक्शन से भी कमाई का दावा
ब्रोकर ने PG के कारोबार में बिजली के कनेक्शन को कमाई का बड़ा जरिया बताया. उसने बताया कि छात्रों से बिजली के लिए करीब 17 से 18 रुपये प्रति यूनिट तक लिए जाते हैं.
ब्रोकर का दावा है कि दूसरे शहरों से आने वाले कई छात्रों को दिल्ली के बिजली बिल की जानकारी नहीं होती. उन्हें यह पता नहीं होता कि PG में बिजली का अलग हिसाब लिया जा रहा है. उसने यह भी दावा किया कि यहां छात्रों को दिल्ली सरकार की 200 यूनिट मुफ्त बिजली की सुविधा नहीं मिलती.
ब्रोकर ने PG मालिकों की कमाई को लेकर भी बड़ा दावा किया. उसने बताया कि एक मालिक हर महीने करीब ढाई से तीन लाख रुपये तक कमा सकता है. PG मालिक ब्रोकर को बिल्डिंग संभालने की जिम्मेदारी देते हैं. उसे हर महीने मालिक को करीब दो लाख रुपये देने होते हैं. कमरे खाली रहें या भरे हों, यह रकम देनी होती है. उसका दावा है कि उसकी खुद की कमाई करीब 40 हजार रुपये महीना रहती है.
सत्य निकेतन दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के पास बड़ा छात्र इलाका है. यहां बड़ी संख्या में छात्र PG और हॉस्टल में रहते हैं. इलाके में करीब 200 PG होने का दावा किया जाता है.
आसपास कई बड़े कॉलेज हैं. इनमें वेंकटेश्वर कॉलेज, आर्यभट्ट कॉलेज, मोतीलाल नेहरू कॉलेज और मैत्रेयी कॉलेज शामिल हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी के कैंपस में सभी छात्रों के लिए पर्याप्त हॉस्टल नहीं हैं. ऐसे में दूसरे शहरों से पढ़ाई के लिए आने वाले छात्रों को निजी PG का सहारा लेना पड़ता है.
सत्य निकेतन हादसे ने इन PG की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं. छात्रों का आरोप है कि कई जगह सुरक्षा नियमों का पालन नहीं होता. जर्जर इमारतों में छोटे और भीड़भाड़ वाले कमरों में छात्र रहने को मजबूर हैं.
अब सवाल यह है कि आखिर इन इमारतों को सुरक्षा मंजूरी कैसे मिलती है. अगर सुरक्षा ऑडिट नहीं हो रहा है तो जिम्मेदारी किसकी है. हादसे के बाद कार्रवाई होती है. कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई की जाती है. लेकिन कुछ समय बाद मामला फिर ठंडा पड़ जाता है.
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सत्य निकेतन का यह मामला केवल एक हादसे तक सीमित नहीं है. यह दिल्ली में छात्रों की सुरक्षा और PG व्यवस्था पर बड़ा सवाल है. दूसरे शहरों से बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर दिल्ली आने वाले छात्र आखिर सुरक्षित तरीके से कहां रहें. यह सवाल अब भी बना हुआ है.