भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद और तीखे आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन जब विरोध का तरीका व्यक्तिगत हमलों तक पहुंच जाए और ऐसे बनावटी आधुनिक साधनों का इस्तेमाल होने लगे, जिनसे किसी व्यक्ति की गरिमा और धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचे, तो यह निश्चित रूप से गंभीर चिंता का विषय है. सोमवार को समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस में AI से तैयार एक वीडियो दिखाए जाने की घटना इसी चिंता को सामने लाती है.
संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति या किसी धार्मिक पीठ के प्रमुख की गलत छवि दिखाने के लिए डीपफेक और AI तकनीक का इस्तेमाल करना केवल राजनीतिक विरोधी पर हमला नहीं है, यह सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी, बुनियादी शिष्टाचार और नैतिक सीमाओं के पतन को भी दर्शाता है,
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ न केवल चुने हुए जन-प्रतिनिधि और संवैधानिक पदाधिकारी हैं, बल्कि करोड़ों भक्तों की आस्था के केंद्र 'गोरक्षपीठ' के पीठाधीश्वर भी हैं.हमारे देश की संत परंपराओं और भक्तों के दिलों में गोरक्षपीठ का एक विशेष और सम्मानित स्थान है. राजनीति में विरोध की भी सीमाएं होती हैं, नीतियों, कानून-व्यवस्था, विकास और भ्रष्टाचार पर सवाल उठाना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन AI तकनीक से किसी धार्मिक पीठ के प्रमुख के चरित्र और आस्था से जुड़ी तस्वीरें बनाना सार्वजनिक विमर्श के गिरते स्तर का प्रतीक है.
योगी आदित्यनाथ की बेदाग छवि
SP दफ्तर में हुई घटना का सबसे विरोधाभासी पहलू यह है कि इसमें ऐसे व्यक्ति की छवि खराब करने की कोशिश की गई, जिनका निजी और सार्वजनिक जीवन एक खुली किताब की तरह रहा है, उनसे धार्मिक या राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं. लेकिन चाहे वे गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर की भूमिका में हों या राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर, योगी आदित्यनाथ पर कदाचार या आलीशान जीवनशैली का आरोप नहीं लगाया जा सकता.
वे एक कॉर्पोरेट CEO जैसी कुशलता और कार्य-संस्कृति के साथ राज्य का कामकाज संभालते हैं, लेकिन निजी जीवन में उनकी जीवनशैली बेहद सादगीपूर्ण है, राम मंदिर का प्रबंधन पूरी तरह एक स्वतंत्र ट्रस्ट के अधीन है, इसके बावजूद, जैसे ही ट्रस्ट की ओर से चंदे से जुड़े मामले की जांच का अनुरोध मिला, उन्होंने तत्काल SIT का गठन किया और यह सुनिश्चित किया कि मामले में आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई हो और उन्हें जेल भेजा जाए, ऐसे में, अगर कोई राजनीतिक लाभ के लिए योगी आदित्यनाथ को इस पूरे मामले से जोड़ने की भद्दी और भ्रामक कोशिश करता है, तो इसे महज राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि चुनावी फायदे के लिए नैतिक मर्यादाओं के पतन की पराकाष्ठा ही कहा जा सकता है.
यहां यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर के रूप में योगी आदित्यनाथ का गुरु गोरखनाथ धाम पर समग्र नियंत्रण है. माना जाता है कि देश और दुनिया भर में रहने वाले नाथ परंपरा के अनुयायियों के साथ-साथ अन्य श्रद्धालुओं से भी पीठ को नियमित रूप से चढ़ावा प्राप्त होता है. आखिर योगी आदित्यनाथ इस धन का क्या करते हैं, जबकि वे साधारण भगवा वस्त्र पहनते हैं, सादा भोजन करते हैं और एक साधारण बिस्तर पर सोते हैं? अगर सपा प्रमुख ने इस बारे में एक पल भी सोचने की जहमत उठाई होती, तो इस तरह का आरोप लगाने से पहले वे सौ बार सोचते. उन्हें यह पता होना चाहिए कि हर दिन हजारों लोगों को भोजन कराने के अलावा गुरु गोरखनाथ धाम कई वर्षों से अनेक धर्मार्थ स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय और अस्पताल चला रहा है और समाज के वंचित वर्गों के उत्थान के लिए लगातार काम कर रहा है. अनगिनत लोगों की आजीविका गुरु गोरखनाथ मंदिर से जुड़ी हुई है. योगी आदित्यनाथ से आपकी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता हो सकती है, लेकिन उनकी जीवनशैली और ईमानदारी पर सवाल उठाना मानसिक दिवालियापन की अभिव्यक्ति ही कहा जा सकता है.
योगी आदित्यनाथ ने कभी भी जनकल्याण से जुड़े मुद्दों पर समझौता करने की इच्छा नहीं दिखाई, भले ही ऐसा करने की कीमत उन्हें खुद क्यों न चुकानी पड़े. बाजार का सिद्धांत कहता है कि कोई भी उत्पादक अपने बनाए उत्पाद को बेचने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ता, लेकिन जिस राज्य में देश के 55 प्रतिशत मोबाइल फोन बनते हैं, उसी राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बच्चों, छात्रों और युवाओं के साथ-साथ अभिभावकों से अपनी बातचीत में बार-बार स्मार्टफोन से दूरी बनाए रखने की अपील करते हैं. राजस्व से जुड़े हितों की परवाह किए बिना, वे अपनी जनसभाओं के माध्यम से नई पीढ़ी को नशे और स्मार्टफोन की लत के हानिकारक प्रभावों के प्रति जागरूक करते हैं, उन्होंने शराब और ड्रग माफिया के खिलाफ भी मोर्चा खोला है, ऐसे व्यक्ति को नशे की लत से जुड़ा हुआ बताने की कोशिश सिर्फ यही दर्शाती है कि लगातार दो चुनावी हार के बाद अखिलेश यादव में राजनीतिक लड़ाई लड़ने की इच्छाशक्ति भी खत्म हो गई है.
तकनीक का दुरुपयोग और डीपफेक का बढ़ता खतरा
AI का प्राथमिक उद्देश्य समाज को सशक्त बनाना, शासन और प्रशासन में अधिक पारदर्शिता लाना और रोजमर्रा की जिंदगी को आसान बनाना है, लेकिन जब राजनीतिक दल अपने विरोधियों की छवि खराब करने या भ्रामक नैरेटिव गढ़ने के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल करने लगते हैं, तो यह सीधे तौर पर समाज और लोकतंत्र के लिए खतरा बन जाता है, यह घटना इस बात का संकेत है कि भविष्य में चुनावी प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक लड़ाइयों में डीपफेक और फर्जी मीडिया का किस व्यापक स्तर पर दुरुपयोग किया जा सकता है. अगर वरिष्ठ और जिम्मेदार नेता स्वयं अपने आधिकारिक सार्वजनिक संवादों में ऐसी सामग्री को बढ़ावा देने लगें, तो इससे जनता का तकनीक पर अविश्वास बढ़ेगा और समाज में आपसी कटुता भी गहरी होगी.
‘ईमानदारी’ और ‘शिष्टाचार’ की जरूरत
भारतीय राजनीति का एक समृद्ध और गौरवशाली इतिहास रहा है, जिसमें वैचारिक मतभेदों के बावजूद नेताओं के बीच व्यक्तिगत सम्मान और राजनीतिक शिष्टाचार कायम रहा. राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को कभी व्यक्तिगत दुश्मनी का माध्यम नहीं बनाया गया और न ही धार्मिक भावनाओं को आहत करने की कोशिश की गई. जब शीर्ष स्तर के नेता राजनीतिक लाभ के लिए इन मर्यादाओं को लांघते हैं, तो इसका नकारात्मक संदेश पार्टी कार्यकर्ताओं और आम जनता तक जाता है.
राजनीति केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं है, यह एक ऐसी व्यवस्था भी है, जिसके जरिए सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोग समाज के सामने आचरण और व्यवहार की मिसाल पेश करते हैं.
लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने की तकनीक भर नहीं है, यह स्वतंत्र विचार, निष्पक्ष जानकारी, जनता के विश्वास और नागरिकों की सूचित एवं विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता पर टिका होता है. इसलिए अगर चुनाव जीतने के लिए AI का इस्तेमाल मतदाताओं की सोच को प्रभावित करने, झूठी जानकारी फैलाने, विरोधी विचारों को बदनाम करने या जनमत को कृत्रिम तरीके से प्रभावित करने के लिए किया जाता है, तो चुनाव तकनीकी रूप से भले ही सफल हो जाए, लेकिन इससे लोकतंत्र की मूल आत्मा पर गंभीर सवाल खड़े होंगे. जैसे-जैसे तकनीक की ताकत बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे उसके नैतिक और जिम्मेदार इस्तेमाल की हमारी जिम्मेदारी भी बढ़नी चाहिए.
AI भले ही चुनावों को अधिक तेजी से जीतने में मदद कर सकता है, लेकिन लोकतंत्र को मजबूत केवल सत्य, विश्वास और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता के जरिए ही किया जा सकता है. AI मानव सभ्यता के लिए एक असाधारण अवसर है. यह शिक्षा, शोध, कृषि, स्वास्थ्य सेवा, रोजगार और शासन को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और जनोन्मुखी बना सकता है, लेकिन अगर यही तकनीक ज्ञान और विकास का साधन बनने के बजाय भ्रम, दुष्प्रचार, मनोवैज्ञानिक हेरफेर और राजनीतिक स्वार्थ का हथियार बन जाए, तो इसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं.
राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि जनता का समर्थन अच्छी नीतियों, विकास के विजन और लोगों से जुड़े मुद्दों को उठाकर ही मिलता है, न कि राजनीतिक विरोधियों की गलत छवि पेश करके AI जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल रचनात्मक कामों और विकास के मुद्दों को उजागर करने के लिए किया जाना चाहिए. नेताओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सार्वजनिक बातचीत का स्तर ऊंचा रहे, ताकि वे आने वाली पीढ़ियों के सामने स्वस्थ, संयमित और लोकतांत्रिक व्यवहार का उदाहरण पेश कर सकें, दुख की बात है कि लगता है किसी ने अखिलेश यादव को यह बात नहीं बताई है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)