क्रिस्टल डिसूजा चाहतीं तो द ट्रेटर्स 2 की आखिरी बाजी अकेले जीत सकती थीं. उनके सामने रिदा थराना थीं और फैसला खुद क्रिस्टल के हाथ में था. वह रिदा को बाहर कर पूरी प्राइज मनी अपने नाम कर सकती थीं. खेल के नियम इसकी इजाजत देते थे और पूरे सीजन में जिस तरह क्रिस्टल ने रणनीति के साथ खेला था, उस लिहाज से ऐसा करना कोई हैरान करने वाला फैसला भी नहीं होता. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने रिदा को बाहर करने के बजाय उनके साथ 66 लाख रुपये की प्राइज मनी शेयर की. उन्होंने फिनाले में कहा It’s good to be a girls’ girl. क्रिस्टल की यही एक लाइन मेरे जेहन में अटक गई. इसलिए नहीं कि यह सुनने में अच्छी लगती है, बल्कि इसलिए कि पूरे खेल को देखने के बाद यह लाइन अचानक बहुत ज्यादा मायने रखने लगती है.
क्रिस्टल ने पूरे सीजन में किसी को खुश करने के लिए गेम नहीं खेला. उन्होंने लोगों को गुमराह किया, अपने ऊपर आए शक से निकलीं, जरूरत पड़ने पर अपने ही साथी ट्रेटर कुल्लू के खिलाफ वोट किया और आखिर तक अपनी पहचान बचाए रखी. लेकिन जब आखिरी फैसला उनके हाथ में आया और उनके पास एक दूसरी महिला को हटाकर अकेले जीतने का मौका था, तब उन्होंने उसे अपने साथ जीतने दिया. यहीं से उनकी जीत को सिर्फ एक रियलिटी शो के नतीजे की तरह देखना थोड़ा कम दिलचस्प हो जाता है.
क्रिस्टल पहले दिन से ट्रेटर थीं. यानी शुरुआत से ही उन्हें उस खेल का सबसे मुश्किल हिस्सा पता था जो बाकी खिलाड़ियों से छिपा हुआ था. उन्हें पता था कि कौन किसे शक की नजर से देख रहा है, किसकी नजर किस पर है और सबसे जरूरी बात उन्हें हर वक्त अपनी असली पहचान छिपाकर रखनी है. इस भूमिका में जरा सी घबराहट, जरूरत से ज्यादा सफाई या गलत वक्त पर बोला गया एक भी शब्द पूरा खेल पलट सकता था. क्रिस्टल पर शक भी हुआ, लेकिन उन्होंने हर बार खुद को साबित करने की हड़बड़ी नहीं दिखाई. वह शांत रहीं, कम बोलीं और जहां जरूरी था वहीं अपनी बात रखी.
लेकिन क्रिस्टल का खेल सिर्फ शांत रहने या लोगों को अपनी तरफ करने तक सीमित नहीं था. उन्हें यह भी पता था कि इस गेम में भावनाओं की अपनी जगह है और रणनीति की अपनी. कुल्लू वाला मामला इसका अच्छा उदाहरण है. कुल्लू ने एक वक्त अपना वोट बदलकर क्रिस्टल को बचाने में मदद की थी. लेकिन जैसे-जैसे उन पर शक बढ़ा और क्रिस्टल को लगा कि कुल्लू का बचना उनके लिए नुकसानदेह हो सकता है, उन्होंने अपने उसी साथी को गेम से बाहर जाने दिया. उन्होंने यह नहीं सोचा कि जिसने पहले उन्हें बचाया था, उसके साथ अब वफादारी निभानी चाहिए. उस वक्त उनका फैसला साफ था कि अगर कुल्लू बचता है तो उसका गेम खतरे में पड़ सकता है.
यानी क्रिस्टल ने पूरे शो में खुद को किसी अच्छी लड़की की भूमिका में बांधकर नहीं रखा. वह ट्रेटर थीं और उन्होंने ट्रेटर की तरह खेला. उन्होंने झूठ बोला, लोगों को गुमराह किया, भरोसा हासिल किया और जरूरत पड़ने पर अपने रास्ते की रुकावट को हटाया. यह बात इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि महिलाओं से आज भी एक अजीब तरह के अच्छे होने की उम्मीद की जाती है. उनसे महत्वाकांक्षी होने को कहा जाता है, लेकिन इतनी भी नहीं कि वह स्वार्थी लगने लगें. उनसे मजबूत होने को कहा जाता है, लेकिन उनकी मजबूती इतनी आक्रामक भी न दिखे कि लोग उन्हें खुदर्गज महिला कहने लगें.
क्रिस्टल ने इस दबाव को अपने खेल पर हावी नहीं होने दिया. उन्हें जीतना था और उन्होंने जीतने के लिए जो करना जरूरी था, किया. किसी पुरुष खिलाड़ी के इस तरह खेलने को अक्सर उसकी रणनीति, चतुराई या गेम सेंस कहा जाता है. महिला वही काम करे तो उसके व्यक्तित्व पर सवाल उठने लगते हैं. क्रिस्टल की यात्रा का एक दिलचस्प पहलू यही है कि उन्होंने अपने खेल को अच्छी लड़की साबित करने की कोशिश से अलग रखा. वह महत्वाकांक्षी थीं, चालाक थीं और जरूरत पड़ने पर निर्मम भी. और इन सबके बावजूद उनकी कहानी यहीं खत्म नहीं होती.
यही वजह है कि क्रिस्टल की जीत को सिर्फ इस आधार पर देखना कि उन्होंने आखिर में रिदा के साथ पैसा बांट दिया, अधूरा होगा. क्योंकि क्रिस्टल पूरे सीजन में बेहद महत्वाकांक्षी खिलाड़ी थीं. वह जीतना चाहती थीं और यह बात उन्होंने कभी छिपाई भी नहीं. उन्होंने अपने खेल को रिश्तों, भावनाओं या इस डर से कमजोर नहीं होने दिया कि कहीं लोग उन्हें बहुत चालाक, बहुत स्वार्थी या बहुत निर्मम न समझ लें.
और यहीं मुझे क्रिस्टल का खेल एक महिला के तौर पर दिलचस्प लगता है. फिनाले में भी रिदा भी मजबूत दावेदार थी, जीत के बिल्कुल करीब लेकिन फर्क सिर्फ इतना था कि क्रिस्टल के पास फैसला करने की ताकत थी. वह चाहतीं तो इस पूरे सफर का आखिरी कदम भी उसी अंदाज में उठातीं, जैसे उन्होंने कई और कदम उठाए थे.
लेकिन उन्होंने इस बार किसी को रास्ते से हटाने के बजाय साथ चलने का फैसला किया और मुझे लगता है कि यही इस पूरे मामले की सबसे अहम बात है. क्रिस्टल ने अपनी जीत रिदा को नहीं दे दी. उन्होंने खुद को पीछे नहीं किया. उन्होंने अपनी जीत बरकरार रखी और उसी जीत में रिदा को भी हिस्सेदार बनाया. यानी उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा कम नहीं की, बस यह मानने से इनकार कर दिया कि उनकी महत्वाकांक्षा की आखिरी कीमत किसी दूसरी महिला की हार ही होनी चाहिए.
यह छोटी बात नहीं है, खासकर तब जब वह दूसरी महिला उनके साथ एक ही मुकाम पर खड़ी हो. क्रिस्टल चाहतीं तो रिदा को अपनी सबसे आखिरी बाधा मान सकती थीं. लेकिन उन्होंने उसे अपन आखिरी साथी चुना. ऐसे में यहीं girls’ girl वाली लाइन सिर्फ एक प्यारा सा फिनाले मोमेंट नहीं रह जाता क्योंकि महिलाओं की एकजुटता की बात करना आसान है, जब उसके लिए आपको कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती. असली सवाल तब आता है जब सामने वाली महिला वही चीज चाहती हो जो आप चाहती हैं और उसे हटाकर आपको ज्यादा मिल सकता हो. क्रिस्टल के मामले में यह कोई काल्पनिक स्थिति नहीं थी. उनके पास सचमुच विकल्प था. वह रिदा को बाहर कर सकती थीं और पूरा पैसा ले सकती थीं लेकिन उन्होंने पैसा बांटना चुना.
मुझे लगता है कि इस फैसले की सबसे खूबसूरत बात यही है कि क्रिस्टल ने अपनी जीत को छोटा नहीं किया. उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा से समझौता नहीं किया. उन्होंने यह नहीं कहा कि रिदा जीतेंगी तो वह पीछे हट जाएंगी. उन्होंने खुद भी जीत हासिल की और रिदा को भी अपनी जीत में जगह दी यानी यहां फेमिनिज्म का मतलब खुद को पीछे करना नहीं है. यह भी नहीं कि महिलाएं एक-दूसरे से मुकाबला न करें. क्रिस्टल का पूरा गेम तो इसके ठीक उलट है. उन्होंने मुकाबला किया, लोगों को मात दी, रणनीति बनाई और जीतने के लिए खेला. लेकिन उन्होंने यह मानने से इनकार कर दिया कि उनकी जीत का सबसे अच्छा रास्ता दूसरी महिला को गिराकर ही निकलता है.
शायद महिलाओं के बीच रिश्तों को लेकर हमारी सबसे बड़ी दिक्कत भी यही है. हम अक्सर दो महिलाओं को एक ही फ्रेम में रखते ही तुलना शुरू कर देते हैं, जैसे एक की जगह तभी बन सकती है जब दूसरी की जगह कम हो.
लेकिन क्रिस्टल को इस फैसले की वजह से परफेक्ट महिला बना देना भी गलत होगा. वह पूरे शो में किसी आदर्श नैतिक किरदार की तरह नहीं खेलीं. शायद इसी वजह से उनका आखिरी फैसला ज्यादा असर करता है. वह कोई ऐसी महिला नहीं थीं जो पूरे खेल में सबको साथ लेकर चली हों. उन्होंने जरूरत पड़ने पर किसी को भी पीछे छोड़ा. लेकिन रिदा के मामले में आखिरी फैसला उनके हाथ में था और उन्होंने तय किया कि इस बार किसी दूसरी महिला को पीछे छोड़ना जरूरी नहीं है.
आप जीतना चाह सकती हैं और फिर भी दूसरी महिला की जीत से असुरक्षित महसूस करना जरूरी नहीं है. आप सबसे आगे हो सकती हैं और फिर भी किसी दूसरी महिला को अपने बराबर खड़ा देख सकती हैं. क्रिस्टल ने रिदा को अपनी जीत नहीं दी. उन्होंने अपनी जीत किसी से छीनी भी नहीं. उन्होंने बस आखिरी मौके पर यह तय किया कि उनकी जीत का मतलब रिदा की हार होना जरूरी नहीं है.