सुभाष चंद्र बोस की रहस्यमयी गुमशुदगी आज भी एक अनसुलझा रहस्य है. अधिकारिक तौर पर माना जाता हैं कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान में हुए विमान दुर्घटना में उनकी मौत हो गई थी. लेकिन पिछले 22 सालों से नेताजी पर रिसर्च कर रहे चंद्रचूड़ घोष का कहना है कि उनकी मौत 1945 में नहीं हुई थी.
घोष के रिसर्च पर आधारित माइक्रो ड्रामा सीरीज द बोस नेटवर्क 15 अगस्त को स्टोरी टीवी ऐप पर रिलीज हुई. इस सीरीज में एआई की मदद से नेताजी के दौरे की लोकेशन और माहौल को फिर से तैयार किया गया है.
एक इंटरव्यू के दौरान घोष ने बताया कि उन्हें दो दशक लग गए रिसर्च करने में और उनके जिंदगी से जुड़े जानकारी जुटाने में. इस दौरान उनकी टीम ने देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर लोगों से मुलाकात की और निजी दस्तावेजों को गहराई से पढ़ा. उनके प्रयासों के बाद सरकार ने करीब 2,000 गोपनीय फाइलें को सार्वजनिक की, लेकिन कुछ दस्तावेज आज भी सामने नहीं आए हैं.
घोष के मुताबिक, उनकी रिसर्च भारत तक सीमित नहीं रही. उन्होंने अमेरिका की CIA, ब्रिटेन की MI5 और जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और ताइवान से सामने आए डिक्लासिफाइड रिकॉर्ड अच्छे से पढ़े. इसी रिसर्च के आधार पर उन्होंने नेताजी पर तीन किताबें लिखी हैं.
क्या नेताजी की मौत प्लेन क्रैश में हुई थी?
घोष की किताब यह बताती है कि कोई प्लेन क्रैश नहीं हुआ था. घोष की रिसर्च का सबसे अहम हिस्सा नेताजी की मौत से जुड़ा है. उनका दावा है कि 18 अगस्त 1945 को जिस प्लेन हादसे में नेताजी की मौत की बात सामने आई थी, वह असलियत में उनके बच निकलने की योजना का एक हिस्सा था.
उनके अनुसार, जापानी सेना ने नेताजी को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए विमान हादसे की कहानी को एक स्मोकस्क्रीन की तरह इस्तेमाल किया था. घोष ने इस बात को भी बताया कि हादसे की खबर घटना के चार दिन बाद 22 अगस्त को सार्वजनिक की गई थी. नेताजी जापान से निकलकर रूस पहुंचे थे. उस समय दूसरी वर्ल्ड वॉर खत्म हो चुका था और जापान के आत्मसमर्पण के बाद उन्हें फ्रीडम स्ट्रगल को आगे बढ़ाने के लिए नए सहयोगी की जरूरत थी. रूस उस समय उनके लिए सबसे अच्छी विकल्प था. हालांकि रूस पहुंचने के बाद नेताजी के साथ क्या हुआ यह पूरी कहानी स्पष्ट नहीं है. घोष का दावा है वह 1950 के दशक की शुरुआत में भारत लौटे और 1985 तक जीवित रहे. यह फैक्ट उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर है.
कैसे पड़ा नेताजी का नाम गुमनामी बाबा
एक लोकल हिंदी प्रेस ने उन्हें गुमनामी बाबा का नाम दिया. वह बंगाल के पूर्व क्रांतिकारियों से संपर्क में रहते थे और कई प्रभावशाली लोगों की मदद से उनकी देखभाल होती थी.
बोस ने राजनीति से दूरियां बना ली थी. उन्होंने संन्यास ले लिया था. गुमनाम रहकर देशहित में काम करते थे. दावा यह हैं कि बोस ने कोरियाई वॉर, वियतनाम वॉर और चीन से जुड़े संघर्षों में गुप्त सलाहकार का काम किया था.
गुमनामी बाबा ने अलग-अलग देशों की सरकारों में आम नागरिकों के रूप में मौजूद अपने लोगों के एक गुप्त नेटवर्क बनाए थे जो देशहित का काम करते थे और यह बात गुप्त रखी थी. यही विचार द बोस नेटवर्क के शीर्षक का आधार बना जो 60 और 70 के देश में काम करती थी. हालांकि घोष ने स्पष्ट किया कि सीरीज यह दावा नहीं करती कि आज भी ऐसा कोई नेटवर्क मौजूद है. उनके रिसर्च में सामने आए विचारों को आधार बनाकर निर्माताओं ने कहानी को काल्पनिक रूप से आगे बढ़ाया है.
इस सीरीज में नेताजी की एडॉल्फ हिटलर से मुलाकात के बारे में भी बताया गया है. हिटलर से मदद लेना नेताजी की मजबूरी और रणनीति का हिस्सा था, न कि हिटलर की विचारधारा का समर्थन करना. नेताजी का मकसद भारत की आजादी थी और वह राष्ट्रीय हित के लिए किसी भी जरूरी रणनीतिक सहयोग का इस्तेमाल करना चाहते थे. नेताजी को हिटलर के विचारों के प्रति उनके मन में कोई सम्मान नहीं था.
सीरीज में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भूमिका जॉय सेनगुप्ता ने निभाई है. सीरीज स्टोरी टीवी ऐप पर स्ट्रीम की जा रही है.