
हॉलीवुड हो या बॉलीवुड, हर फिल्म इंडस्ट्री में फिल्मों के सीक्वल बनते रहे हैं. इन सीक्वल के बनने के पीछे की वजहें क्या रही हैं और इनकी कामयाबी की गारंटी का पैटर्न क्या है?
बात हॉलीवुड की, जहां पहली सीक्वल फिल्म 1916 की 'द फॉल ऑफ ए नेशन' (The Fall of a Nation) थी. यह 1915 की मशहूर मूक फिल्म 'द बर्थ ऑफ ए नेशन' (The Birth of a Nation) का सीक्वल थी. इसे सिनेमा इतिहास की पहली फीचर लेंथ सीक्वल भी माना जाता है.
बॉलीवुड (हिंदी सिनेमा) में पहली सीक्वल फिल्म 1943 में बनी- हंटरवाली की बेटी. यह 1935 की सुपरहिट एक्शन फिल्म हंटरवाली (Hunterwali) का सीक्वल थी. इसके बाद लंबे समय तक सीक्वल कम ही बने. सीक्वल फिल्मों का बड़ा ट्रेंड आधुनिक दौर में 1980 के दशक में देखने को मिला.

बॉलीवुड (हिंदी सिनेमा) में बने सीक्वल्स की कामयाबी पर गौर करें तो यह तकरीबन 35 से 40 फीसदी के बीच ही है. इसका सीधा मतलब यह है कि बॉलीवुड में हर 10 सीक्वल फिल्मों में से केवल 3 या 4 ही कामयाब (हिट या ब्लॉकबस्टर) हो पाती हैं, जबकि बाकी 6 से 7 फिल्में या तो बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो जाती हैं या औसतन कारोबार ही कर पाती हैं. हालांकि, कुछ मामलों में भारतीय दर्शकों के बीच सीक्वल की कामयाबी दर प्रीक्वल की तुलना में कहीं ज्यादा है. हिंदी सिनेमा में फ्रेंचाइजी मॉडल काफी बाद में लोकप्रिय हुआ, लेकिन अब यह बॉक्स ऑफिस की रीढ़ बन चुका है.
सीक्वल बनाने को लेकर क्यों उत्साही रहते हैं निर्माता
'नॉस्टैल्जिया' और री-कॉल वैल्यू: इसमें सबसे पहले तो फिल्म निर्माता को दर्शकों के बीच पहुंचना आसान हो जाता है क्योंकि दर्शक पहले से ही फिल्म के नाम से रूबरू होते हैं. तो इसकी ब्रांडिंग या पब्लिसिटी के लिए ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं होती. फिल्म के नाम और किरदारों से दर्शकों का पहले से जुड़ाव होता है, जिसका उन्हें फायदा भी मिलता है. जैसे- फिर हेराफेरी के बाबूराव या गदर के तारा सिंह, के साथ दर्शकों का पहले से जुड़ाव रहा है. गदर-2 या स्त्री-2 की ऐतिहासिक कामयाबी इसका सबसे बड़ा सबूत हैं.
जोखिम कम, रिटर्न्स ज्यादा: असल फिल्म की कामयाबी सीक्वल के लिए पहले दिन से ही भारी ओपनिंग तय कर देती है. दर्शक पहले से ही पसंदीदा किरदारों को आगे बढ़ते देखना चाहते हैं.
फ्रेंचाइजी यूनिवर्स क्रिएट करना: सीक्वल के जरिए मेकर्स एक विशाल यूनिवर्स क्रिएट करते हैं. उदाहरण के लिए- स्त्री, भेड़िया, मुंज्या जैसी फिल्मों से मैडॉक फिल्म्स ने हॉरर-कॉमेडी यूनिवर्स की रचना की तो वहीं रोहित शेट्टी की बनाई फिल्में कॉप यूनिवर्स को रेप्रेजेंट करती हैं.
सीक्वल फिल्मों को लेकर सबसे ज्यादा काम करते हैं सस्पेंस और कंटिन्यूटी. भारतीय सिनेमा की ऑडियंस के मन में 'आगे क्या होगा?' जानने के लिए ज्यादा उत्सुकता रहता है. यही वजह है कि बॉलीवुड में सीक्वल सुरक्षित और फायदे का सौदा साबित हुए हैं.
यहां ये समझने की बात है कि सीक्वल्स किसी भी फिल्म के फ्राइडे ओपनिंग में तो मददगार साबित हो सकते हैं, लेकिन बॉक्स ऑफिस के मंडे टेस्ट या ऑवरऑल परफॉर्मेंस के लिए नहीं. इसके लिए फिल्म की कहानी, स्क्रीनप्ले, गानों समेत किरदारों और उनकी एक्टिंग का ऑडियंस के दिल तक पहुंचना जरूरी है.