Ranabaali Movie Review: आजादी की लड़ाई, अंग्रेजों का अत्याचार, बदले की आग और अपने हक के लिए लड़ता एक जिद्दी इंसान. सुनने में कहानी दमदार लगती है और फिल्म भी इसी जोश के साथ आगे बढ़ती है. विजय देवरकोंडा और रश्मिका मंदाना की जोड़ी, जबरदस्त एक्शन और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत फिल्म को बड़े पर्दे का मसाला बनाने की पूरी कोशिश करते हैं. लेकिन सवाल है कि क्या सिर्फ दहाड़ने, मारने और बदला लेने से कोई फिल्म दिल में जगह बना पाती है? आइए जानते हैं.
क्या है रणबाली की कहानी?
फिल्म की कहानी उस दौर में ले जाती है, जब भारत पर अंग्रेजों का राज था और आम लोगों पर जुल्म ढाए जा रहे थे. ऐसे माहौल में रणबाली अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है. उसकी लड़ाई सिर्फ अंग्रेजों से नहीं, बल्कि उस सोच से भी है जो लोगों को जाति, रंग और ताकत के आधार पर बांटती है.
फिल्म में ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचार, भारतीयों की बेबसी और बदले की आग को दिखाया गया है. मल्लन्ना की भविष्यवाणी कहानी को एक अलग मोड़ देती है. फिल्म यह भी बताती है कि देश को नुकसान पहुंचाने वाले सिर्फ विदेशी शासक नहीं थे, बल्कि अपने ही लोग भी कई बार अन्याय का साथ देते थे. यानी लड़ाई बाहर के दुश्मनों के साथ-साथ समाज के भीतर मौजूद बुराइयों से भी है.
कैसी है फिल्म?
रणाबाली का आइडिया दमदार है. आजादी के दौर की कहानी में विद्रोह, सामाजिक भेदभाव और अंग्रेजों की क्रूरता को जोड़ना फिल्म को एक मजबूत आधार देता है. लेकिन कहानी जितनी असरदार हो सकती थी, उतनी बन नहीं पाती. फिल्म कई बार भावनाओं को समझाने के बजाय शोर और हिंसा के सहारे अपना असर छोड़ना चाहती है.
विजय देवरकोंडा रणबाली के किरदार में पूरी ताकत लगाते हैं. उनका गुस्सा, विद्रोही अंदाज और दुश्मनों से टकराने का जुनून पर्दे पर दिखाई देता है. लेकिन दिक्कत यह है कि उनका किरदार ज्यादातर वक्त चिल्लाता या लड़ता नजर आता है. मां, पत्नी, दोस्तों और अंग्रेजों के सामने उनका गुस्सा लगातार देखने के बाद एक समय पर यह असर खोने लगता है. किरदार में जो गहराई होनी चाहिए थी, वह कई जगह गायब लगती है.
रश्मिका मंदाना फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरती हैं. जयम्मा के किरदार में उनकी मौजूदगी कहानी को भावनात्मक सहारा देती है. उनका किरदार खूबसूरती से लिखा गया है और जब भी वह पर्दे पर आती हैं, फिल्म में जान आ जाती है. एक अहम गाने में लिप-सिंक थोड़ी कमजोर लग सकती है, लेकिन उनका अभिनय और किरदार की संवेदनशीलता इसकी भरपाई कर देते हैं.
द ममी वाले एक्टर भी नहीं बचा पाए फिल्म की लाज
फिल्म के ब्रिटिश खलनायक भी एक के बाद एक सामने आते हैं. अर्नोल्ड का हेक्टर इनमें सबसे अहम है, लेकिन उसका किरदार भी उतना दिलचस्प नहीं बन पाता. अंग्रेजों की क्रूरता दिखाने के चक्कर में कई बार सभी खलनायक एक जैसे लगने लगते हैं. वहीं, भारतीय समाज में जातिगत भेदभाव और रंग को लेकर मौजूद सोच को दिखाने की कोशिश कहानी को एक गंभीर पहलू देती है.
स्क्रीनप्ले और निर्देशन की बात करें तो फिल्म में दमदार मसालों की कमी नहीं है. वफादारी, बदला, ताकत और दबदबे जैसे मुद्दे कहानी को आगे बढ़ाते हैं. लेकिन किरदारों को इंसान की तरह समझने और उनकी भावनाओं से जुड़ने का वक्त कम मिलता है. बैकग्राउंड म्यूजिक और जोशीले दृश्यों का मकसद माहौल को प्रभावशाली बनाना है, मगर लगातार गुस्से और हिंसा के बीच भावनात्मक पल कई बार दब जाते हैं. फिल्म यह सवाल जरूर उठाती है कि अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों ने संघर्ष क्यों किया और अपने ही समाज की बुराइयों ने इस लड़ाई को कैसे मुश्किल बनाया, लेकिन इसका जवाब देते हुए कहानी अपनी संवेदनशीलता कहीं-कहीं खो देती है.
कहानी का कमजोर खेल!
रणबाली एक दमदार टॉपिक पर बनी ऐसी फिल्म है, जिसमें जुनून तो है, लेकिन भावनात्मक गहराई हर जगह नजर नहीं आती. विजय देवरकोंडा का आक्रामक अंदाज और रश्मिका मंदाना का सहज अभिनय फिल्म को संभालते हैं, मगर कमजोर पड़ता स्क्रीनप्ले और जरूरत से ज्यादा चिल्लम-चिल्ली इसका मजा कम कर देती है. फिल्म बस अंग्रेजों को धूल चटाने पर जोर देती दिखती है. तो अगर आप विजय देवरकोंडा के हीरोइक अंदाज के फैन हैं, और रश्मिका संग उनकी जोड़ी भी आपके मन में बसी है तो आप जरूर फिल्म देखने जा सकते हैं.
मेरे हिसाब से- फिल्म में रणबाली का गुस्सा समझ आता है, उसकी लड़ाई भी जायज लगती है, लेकिन काश फिल्म शोर से ज्यादा भावनाओं पर भरोसा करती. क्योंकि असली असर सिर्फ दुश्मन को हराने में नहीं, बल्कि दर्शकों के दिल को छूने में होता है.