कन्नड़ सिनेमा के सुपरस्टार 'रॉकी भाई' यश का रुतबा अलग ही है. पिछले कुछ सालों में उन्होंने अपना ऐसा 'ऑरा' सेट किया है कि लोग उनकी फिल्में देखने के लिए दीवाने रहते हैं. इस साल मैं भी उन्हीं दीवानों में से था. केजीएफ 1 और 2 की सक्सेस के बाद, उनकी अगली फिल्म टॉक्सिक का बेसब्री से इंतजार था. ये वही फिल्म है जिसे काफी समय तक टालने के बाद थिएटर में रिलीज किया गया है. तब उसे टालने के अलग-अलग कारण सामने आए, जिससे फिल्म की हाईप भी बढ़ी. आलम ये हुआ कि टॉक्सिक ने एडवांस बुकिंग में बंपर कमाई की. यश की फिल्म एक बड़ी ओपनिंग को तैयार है. आज फाइनली इस फिल्म को मैंने देख भी लिया, और थिएटर से बाहर निकलकर मुझे इस फिल्म ने कैसा महसूस कराया, ये मैं विस्तार से (बिना स्पॉइलर दिए) बताने की कोशिश करूंगा.
उम्मीदों के भरोसे टिकाई नांव
टॉक्सिक एक 3 घंटे 15 मिनट लंबी फिल्म है, जिससे आप ये उम्मीद लगाते हैं कि इसकी कहानी सेटअप होने में वक्त तो लगेगा. मैं भी उसी उम्मीद से पूरा ध्यान लगाकर थिएटर में अपनी सीट पर बैठा. पिक्चर की शुरुआत हुई और इसने कहानी को सेट होने में अपना पूरा वक्त भी लिया. मगर आधी पिक्चर निकल गई और मैं बस यही इंतजार में रहा कि आखिर कब कोई ऐसा मोमेंट आएगा, जब यश या बाकी स्टारकास्ट मुझे सरप्राइज करेगी. इंटरवल ब्लॉक के नाम पर एक सीन जरूर डाला गया, मगर वो भी वैसा नहीं था जिसे देखकर मैं सेकेंड हाल्फ के लिए एक्साइटेड रहूं. पूरी फिल्म मेरे इसी भरोसे पर टिकी रही कि अब कहानी में कुछ अच्छा और दिलचस्प मोड़ आएगा. लेकिन अफसोस ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ. फिल्म से जुड़ पाना बेहद मुश्किल सा हो गया.
पूरी फिल्म में यश को देखकर ऐसा ही लग रहा था कि वो अभी भी उसी 'रॉकी भाई' वाली इमेज में हैं. टॉक्सिक के डायलॉग्स जरूरत से ज्यादा ड्रामा पेश करने की कोशिश में लगे रहे. मैंने ये फिल्म हिंदी में देखी है, तो मुझे इसके कन्नड़ भाषा वाले वर्जन का फिलहाल तो कोई आइडिया नहीं है. लेकिन अगर उसमें भी कुछ ऐसी ही बात है, तो ये सचमुच अफसोस की बात है. माना कि फिल्म पोस्ट-इंडिपेंडेंस में सेटअप है, मगर असल जिंदगी में तो हर कोई डायलॉगबाजी वाली भाषा में तो नहीं बात करता होगा ना. फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी राइटिंग है, जो आपको एक वक्त पर सुलाने का काम करती है. यश का किरदार जरूरत से ज्यादा टॉक्सिक दिखाने के चक्कर में डायरेक्टर का पूरा ध्यान स्क्रीनप्ले और कहानी पर से हटता नजर आया है.
विजुअल्स और तकनीकी तौर पर देखें, तो फिल्म स्क्रीन पर अच्छी लगती है. अच्छे थिएटर में देखी जाए, तो विजुअल्स आपको शानदार लगेंगे. लेकिन उस सबका भी क्या फायदा जब फिल्म का बेस ही डगमगाया हुआ हो. टॉक्सिक में एक से बढ़कर एक एक्टर ने काम किया है, यश ने सचमुच हैरान कर देने वाली परफॉरमेंस दी है. मगर वो परफॉर्मेंस उनके हद से ज्यादा 'टॉक्सिक' स्क्रीनप्ले के आड़े आई है, जो सचमुच निराशाजनक है. अफसोस के साथ ये कहना पड़ रहा है कि यश के भरोसे जो उम्मीद की नांव मैंने टिकाई थी, वो पूरी तरह डूब गई. एक समय तक मुझे ऐसा लगने लगा कि आखिर मैं क्यों ये फिल्म देख रहा हूं, क्योंकि ये वो सिनेमा नहीं जिससे मैं उम्मीद लगाकर थिएटर्स तक पहुंचा था.
आलोचना नहीं, निराशा है
मेरी इन बातों से ये ना समझा जाए कि मैं फिल्म की आलोचना या उसकी छवि बिगाड़ने वाला कोई काम नहीं कर रहा हूं. मैं निराश हूं कि केजीएफ चैप्टर 2 से 4 साल का लंबा इंतजार करने के बाद, मुझे उनकी एक कमजोर फिल्म देखनी पड़ी. जिस सच्ची उम्मीद के साथ मैं इस फिल्म को देखने गया था, जिस एक्टर पर मैंने दांव लगाया था, अगर वो ही निराश कर जाए तो फिर उससे शिकायत करना भी मेरा हक है. यश ने जो स्टारडम 'केजीएफ' से पाया, वो उसके पक्के हकदार हैं. लेकिन अगर वो अपनी ऑडियंस को इस तरह की फिल्म डिलीवर करते हैं, तो उन्हें उनकी नाराजगी का भी सामना करना पड़ेगा.
हालांकि एक चीज में उनसे बिल्कुल शिकायत नहीं है, और वो है उनकी परफॉरमेंस. टॉक्सिक में उनका डबल रोल है, और उन्होंने दोनों ही रोल्स को इस तरह निभाया है कि जैसे दो अलग-अलग एक्टर हों. यहां तक कि जो उनका मेन किरदार राया है, उसमें भी उन्होंने अपनी एक्टिंग की रेंज से कमाल किया है. उनके साथ-साथ फिल्म में नयनतारा का भी काम लाजवाब है. वो यश की बहन बनी हैं, और उन्होंने उनका साथ बखूबी निभाया भी है. लेकिन एक समय पर जिस तरह उन दोनों के किरदार को दिखाया गया, उससे इमोशनली कनेक्शन जोड़ पाना मेरे लिए एक टास्क रहा.
'राया' के किरदार में यश क्या करना चाह रहे हैं, उसका क्या मकसद है, वो सब अगर आपको देखना है तो आप थिएटर में जाकर टॉक्सिक देख सकते हैं. फिलहाल मेरे लिए तो ये फिल्म एक बहुत बड़ी निराशा रही. अब देखना ये है कि क्या रामायण में भी यश निराश करेंगे, या वो हमारी शिकायतों को दूर करने में कामयाब होंगे.