अगर मैं आपसे कहूं कि एक पल के लिए अपनी आंखें बंद करके सीता की कल्पना कीजिए, तो यकीनन आपके मन में एक बेहद परिचित तस्वीर उभरेगी. बेदाग गोरी रंगत, लंबे काले बाल, सलीके से किया गया मेकअप, रेशमी साड़ी और भारी-भरकम गहनों से सजी एक दिव्य स्त्री. लेकिन जरा ठहरकर सोचिए क्या यह छवि सचमुच वाल्मीकि रामायण या रामचरितमानस की सीता है, या दशकों से टीवी धारावाहिकों, फिल्मों और कैलेंडर आर्ट के जरिए हमारे मन में उनकी ऐसी छवि गढ़ दी गई है?
नितेश तिवारी की फिल्म रामायण के ट्रेलर में साई पल्लवी की कुछ सेकेंड की झलक ने इसी धारणा को चुनौती दी है. सोशल मीडिया पर उनके अभिनय से ज्यादा उनकी त्वचा के रंग और घुंघराले बाल चर्चा का विषय बन गए हैं. रामानंद सागर की रामायण में सीता का किरदार निभाने वाली दीपिका चिखलिया ने भी साई पल्लवी के घुंघराले बालों पर टिप्पणी की. लेकिन इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि किसी पौराणिक स्त्री के चरित्र से पहले उसके रंग-रूप पर बहस क्यों होने लगती है? क्या हमारे लिए सीता की पहचान उनके साहस, धैर्य और त्याग से कम और उनकी त्वचा के रंग से ज्यादा जुड़ गई है?
यहीं से एक और सवाल जन्म लेता है. आखिर किस रामायण को हम अंतिम और निर्विवाद सत्य मानें? साहित्यकार एके. रामानुजन ने अपने चर्चित निबंध Three Hundred Ramayanas में बताया है कि भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में रामकथा के सैकड़ों रूप प्रचलित हैं. हर संस्करण में पात्रों, घटनाओं और उनके स्वरूप में कुछ न कुछ अंतर मिलता है. ऐसे में अगर कोई निर्देशक मूल कथा और उसके मूल्यों से समझौता किए बिना अपने पात्रों की नई कल्पना करता है, तो क्या उसे इतनी रचनात्मक स्वतंत्रता नहीं मिलनी चाहिए?
दिलचस्प बात यह है कि इस बार बहस न राम के रूप पर हुई, न रावण के लुक पर और न ही फिल्म के विशाल बजट या विजुअल इफेक्ट्स पर. पूरा विवाद आकर सिर्फ सीता के चेहरे पर ठहर गया. सवाल यह नहीं पूछा गया कि साई पल्लवी सीता के व्यक्तित्व को कितना जीवंत बना पाएंगी, बल्कि यह पूछा गया कि क्या वे सीता जैसी सुंदर दिखती हैं? यही प्रश्न शायद हमारी सामाजिक मानसिकता का सबसे बड़ा आईना है.
विडंबना देखिए कि त्रेतायुग की कथा में रावण वध के बाद सीता को अग्निपरीक्षा देनी पड़ी थी, जबकि आज पर्दे पर रामायण शुरू होने से पहले ही सीता की भूमिका निभाने वाली अभिनेत्री की रूप-परीक्षा ली जा रही है.
सच तो यही है कि किसी को नहीं पता कि सीता वास्तव में कैसी दिखती थीं. उनके रंग, चेहरे या बालों का कोई प्रमाणित रिकॉर्ड हमारे पास नहीं है. उनकी जो छवि आज हमारे मन में है, वह चित्रकारों, फिल्मों और टीवी धारावाहिकों की देन है. खासकर रामानंद सागर की रामायण ने एक पूरी पीढ़ी के लिए सीता का चेहरा लगभग तय कर दिया. दीपिका चिखलिया की शांत मुस्कान, गोरा रंग और पारंपरिक श्रृंगार इतने गहरे उतर गए कि वही छवि मानक बन गई. इसलिए जब साई पल्लवी जैसी सांवली रंगत और घुंघराले बालों वाली अभिनेत्री सामने आती है, तो बहस अभिनय पर कम रंग-रूप पर ज्यादा होती है.
लेकिन क्या सीता का सबसे बड़ा परिचय उनका रूप था? भारतीय परंपरा उन्हें उनके त्याग, धैर्य, करुणा, आत्मसम्मान और अटूट साहस के लिए याद करती है. वे राजा जनक की पुत्री थीं, जिन्होंने राजमहल का वैभव छोड़कर वनवास स्वीकार किया, लंका की कैद में भी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ी और हर कठिन परीक्षा में अडिग रहीं. उनकी पूजा इसलिए नहीं होती कि वे कैसी दिखती थीं बल्कि इसलिए कि वे कैसी थीं.
यही वजह है कि साई पल्लवी की कास्टिंग को केवल एक चेहरे के रूप में नहीं, बल्कि एक विचार के रूप में भी देखा जा सकता है. उन्होंने अपने पूरे करियर में ग्लैमर से दूरी बनाई है. प्रेमम से लेकर आज तक उन्होंने बिना भारी मेकअप के अपनी स्वाभाविक त्वचा और चेहरे के दाग-धब्बों के साथ कैमरे का सामना किया है. ऐसे दौर में, जहां सुंदरता अक्सर कृत्रिमता से परिभाषित की जाती है, साई पल्लवी का सहज और प्राकृतिक व्यक्तित्व भी सीता की मानवीय छवि के करीब महसूस होता है.
जाहिर है कि दर्शक सीता के रूप में साई पल्लवी को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं. लेकिन इस विवाद ने एक जरूरी सवाल हमारे सामने रख दिया है कि क्या हम आज भी किसी स्त्री की पहली पहचान उसके रंग-रूप से तय करते हैं? और क्या हमने अनजाने में सीता जैसी महान नायिका को भी केवल एक परफेक्ट ग्लैमरस चेहरे तक सीमित कर दिया है?