जिंदगी की आखिरी सांसें गिनते 95 साल के एक आदमी को अपना पहला प्यार याद आ रहा है, जो अधूरा रह गया था. दुनिया के घाट पर खड़ा यह आदमी अपनी उस लव स्टोरी और प्रेमिका की याद में इस कदर उलझा है कि उसे यह भी नहीं समझ आ रहा कि अपनी आखिरी सांस छोड़ने का वक्त आ गया है. उसे अपनी प्रेमिका से निभाया एक वादा पूरा करना है, जिसके बिना उसकी उलझन नहीं सुलझेगी, आखिरी सांस नहीं छूटेगी. लेकिन यह काम असंभव है क्योंकि सरगोधा, जहां कभी इस लव स्टोरी के रंग बिखरे थे, अब पाकिस्तान में है.
क्या इस कहानी में ऐसा कुछ हो सकता है कि कोई इसे नफरत की नजर से देखे? क्या सिर्फ पाकिस्तान का नाम किसी के इतिहास में होना, किसी से नफरत करने की वजह बन सकती है? लेकिन सिंपल सी दुनिया में उलझनें ईजाद कर लेने वाले हम लोगों ने इस इमोशनल कहानी में भी एक समस्या खोज ली है. यह इमोशनल कहानी है डायरेक्टर इम्तियाज अली की लेटेस्ट फिल्म मैं वापस आऊंगा की और थिएटर में न जाकर, सोशल मीडिया के लेंस से फिल्म देखने वाले लोग इस बात से खफा हैं कि इम्तियाज की फिल्म 'एंटी-धुरंधर' है. लेकिन क्या सच में ऐसा है?
कॉमेडियन विक्रमजीत सिंह ने मैं वापस आऊंगा की तारीफ करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा- 'हे भगवान, मैं वापस आऊंगा ही एंटी-धुरंधर फिल्म है. इम्तियाज अली ने ईश्वर का काम आगे बढ़ाया है.'
विक्रमजीत के इस पोस्ट को 'धुरंधर' फैन्स ने तुरंत घेरना शुरू कर दिया. पहले उन्हें 'धुरंधर' को गलत बताने पर घेरा गया. फिर बात पलटकर यह रंग लेने लगी कि जब दर्शकों की बड़ी मेजॉरिटी को पसंद आई फिल्म को गलत बताते हुए, किसी दूसरी फिल्म को अच्छा कहा जा रहा है, तो इसका मतलब उसमें कुछ गड़बड़ है और इस गड़बड़ का नाम है— पाकिस्तान.
'धुरंधर' में कितना फैक्ट था और कितना फिक्शन, यह कोई भी स्पष्ट तौर पर दावा नहीं कर सकता. लेकिन एक बात तो तय है, फिल्म का नैरेटिव ऐसा है कि इसे देखने के बाद पाकिस्तान का नाम सुनते ही फट पड़ने जैसा असर किसी में बड़ी सहजता से नजर आ सकता है. पिछले एक दशक में पाकिस्तान की हरकतें भी ऐसी ही रही हैं कि उसके नाम से भारतीयों का खून अपने आप उबाल मारने लगता है और आदित्य धर की 'धुरंधर' को इस नफरत का सबसे शानदार प्रतीक माना जा सकता है.
फिल्म का असर यह है कि पहले भारत में जहां देश विरोधी बात करने वाले को 'पाकिस्तान चले जाओ' कहा जाता था, वहीं अब 'धुरंधर' में कमी देखने को ही लोग 'पाकिस्तान से सहानुभूति' दिखाना बोल देते हैं. हर आदमी का फिल्मों को लेकर एक निजी ओपिनियन होता है, जो रखने का अधिकार विक्रमजीत को भी है. लेकिन उनका 'धुरंधर' और मैं वापस आऊंगा को आमने-सामने रखना इस तरह डिकोड किया जा रहा है कि कहीं इम्तियाज ने अपनी फिल्म में पाकिस्तान के लिए कोई सहानुभूति तो नहीं दिखा दी? बस अब इसी बात को लेकर बहुत लोगों ने सोशल मीडिया पर मैं वापस आऊंगा के लिए नेगेटिव माहौल बनाना शुरू कर दिया है.
इम्तियाज अली की फिल्म को 'एंटी-धुरंधर' बताते हुए सोशल मीडिया पोस्ट यही कहना चाहते हैं कि यह पाकिस्तान को लेकर सॉफ्ट है. लेकिन जिसने भी मैं वापस आऊंगा देखी है, वह आपको बता देगा कि ऐसा कहने वालों ने असल में फिल्म देखी ही नहीं है क्योंकि अगर वह थिएटर गए होते तो जान पाते कि फिल्म में पाकिस्तान तो है ही नहीं.
इम्तियाज की लव स्टोरी उस भारत में पनपती है जिसके टुकड़े नहीं हुए हैं. अंग्रेजी हुकूमत का ही असर है कि फिल्म में, एक बड़े कॉलेज में पढ़ने वाले यंग लवर्स अंग्रेजी खूब बोल लेते हैं. इस लव स्टोरी में वह पाकिस्तान आता ही नहीं है, जिसे आज आप और हम जानते हैं. सिख परिवार का लड़का कीनू (वेदांग) और मुस्लिम परिवार की लड़की जिया (शरवरी) जिस जगह हैं, वह बंटवारे के बाद पाकिस्तान के हिस्से में जाती है. यह बंटवारा इस लव स्टोरी की ट्रेजेडी है और इम्तियाज की कहानी वही दिखाती है.
मैं वापस आऊंगा बंटवारे को पॉलिटिक्स नहीं, अचानक जमीनें और घर छिन जाने वाले परिवारों की नजर से देखती है. इस कहानी में राजनीति का अगर कोई जिक्र है भी तो हिंसा को उकसाते एक दंगाई किरदार के मुंह से. वह कीनू को धमकाते हुए कह रहा है कि 'जब दंगे होंगे तो बचाने न कोई जिन्ना आएगा, न नेहरू'.
इसके अलावा इम्तियाज की कहानी में हिंसा, उन उजड़े हुए लोगों पर कहर बनकर बरपी है जो एक तरफ से दूसरी तरफ जा रहे हैं. यह हिंसा करने वाले वो लोग हैं जो जमीनों पर अपना कब्जा रखना चाहते हैं. इस कहानी में वह पाकिस्तान नहीं है जिसे हम जानते हैं. वह कहानी के हीरो का एक बुरा ख्वाब है, जिसमें उसकी प्रेमिका, उसका घर और उसके परिवार की औरतें खो गई हैं.
इस हीरो को जवानी में एक नई जिंदगी बनाने, बाकी बचे परिवार को नया भविष्य देने का जुनून और जोश था. उसे रोज की ऐसी थकान थी कि उसे कोई ख्वाब नहीं आता था. लेकिन अब वह हीरो 95 साल का एक बूढ़ा है, जो अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा है. उसकी झूल चुकी चमड़ी में सुइयां धंसी हुई हैं. वह बेजान और निढाल है और ऐसे में उसे वह बुरा ख्वाब फिर से सता रहा है. मैं वापस आऊंगा न एंटी-धुरंधर है, न प्रो-पाकिस्तान.
यह तो सिनेमा के लिए एक शानदार मोमेंट है... एक तरफ हम आज के पाकिस्तान को करारा जवाब देने को सेलिब्रेट कर रही 'धुरंधर' देख रहे हैं और दूसरी तरफ मैं वापस आऊंगा भी देख रहे हैं, जो उस बूढ़े के दुखते दिल को सहलाती है जिसकी जमीन उस नफरती मुल्क के बनने में खर्च हो गई. यह तो बस एक बूढ़े की कहानी है, जो जवानी में एक रात भारत में अपने जिस घर में सोया था, वह आंख खुलने पर पाकिस्तान हो गया.
इस बूढ़े आदमी के किरदार में नसीरुद्दीन शाह हैं— एक्टिंग का वह लेजेंड जिसे शायद नींद से उठाकर भी कैमरे के सामने खड़ा कर दिया जाए, तब भी उसकी परफॉर्मेंस का एक सुर गलत नहीं बैठेगा! उसकी जवानी की लव स्टोरी में वेदांग रैना और शरवरी जैसे प्रॉमिसिंग यंग एक्टर्स हैं. जब वी मेट (2007), रॉकस्टार (2011) और तमाशा (2015) जैसी आइकॉनिक लव स्टोरीज बना चुके इम्तियाज अली इस कहानी के डायरेक्टर हैं और म्यूजिक ए. आर. रहमान का है, जो सिर्फ फिल्म के गाने नहीं बनाते, सुरों का एक अलग संसार रच देते हैं जिसमें कहानी घटती है.
इतनी पॉजिटिव चीजों के बीच मैं वापस आऊंगा को इसलिए नेगेटिव माहौल मिल रहा है कि एक आदमी ने तारीफ में इसे 'एंटी-धुरंधर' बता दिया और बाकी उसकी ट्रोलिंग के लिए इस 'एंटी-धुरंधर' फिल्म को उधेड़ने में लगे हैं. ऊपर से थिएटर न जाकर सोशल मीडिया के लेंस से फिल्में देखने की आदत ऐसी फैल चुकी है कि हम फिल्म पर एक ओपिनियन को काटते हुए, दूसरे ओपिनियन के भरोसे टिकट खरीदने या न खरीदने का फैसला करते हैं. क्यों न फिल्म देखकर खुद ओपिनियन बनाया जाए, फिल्मों के दूसरे हफ्ते में तो टिकट भी बहुत महंगे नहीं रहते!