चुनाव के हिसाब से देखें तो बिहार और बंगाल के बाद अब उत्तर प्रदेश की बारी है. बिहार के बाद गंगा बंगाल की तरफ ही बढ़ती है, लेकिन यूपी से होकर ही जाती है. गंगा की बात है तो यूपी के साथ ही उत्तराखंड में भी विधानसभा के चुनाव साथ ही होते हैं.
देश के हर राजनीतिक दल के लिए उत्तर प्रदेश का मैदान सीधे-सीधे मिशन 2029 से जुड़ा हुआ है. उत्तर प्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने वाली समाजवादी पार्टी और कांग्रेस कामयाबी दोहराने की कोशिश में हैं, तो केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी नुकसान की भरपाई के लिए जुटी हुई है. मायावती भी बीएसपी के लिए जमीन मजबूत करने के प्रयास में लगी हैं.
और इसी बीच AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी भी इस बार पूरी तैयारी के साथ खुद को आजमाने उतर रहे हैं. असल में यूपी चुनाव में विपक्ष का फोकस पिछड़े, दलित और मुस्लिम वोटों पर है, जिसकी तैयारी अखिलेश यादव और राहुल गांधी तो कर ही रहे हैं, AIMIM नेता ओवैसी भी फिर से अपने लिए जमीन तलाश रहे हैं.
ओवैसी की दलित-मुस्लिम गठजोड़ की कोशिश
बिहार चुनाव के बाद जब असदुद्दीन ओवैसी से पश्चिम बंगाल चुनाव लड़ने के बारे में पूछा गया था, तो उनका जवाब कुछ ऐसा था कि बंगाल का जो भी हो लेकिन यूपी में चुनाव जरूर लड़ेंगे, यह पक्का है. बिहार चुनाव 2025 में भी ओवैसी की पार्टी AIMIM को पिछली बार की ही तरह 5 सीटें मिली हैं.
AIMIM की यूपी यूनिट 14 जून को असदुद्दीन ओवैसी की रैली कराने जा रही है. यह रैली बहराइच जिले की मटेरा विधानसभा क्षेत्र के शंकरपुर चौराहे पर होगी. AIMIM के यूपी अध्यक्ष शौकत अली रैली को सफल बनाने के लिए घर-घर संपर्क अभियान पर निकले हुए हैं.
शौकत अली के मटेरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की भी काफी चर्चा है. समझा जाता है कि रैली के मंच से ही असदुद्दीन ओवैसी मटेरा विधानसभा सीट से शौकत अली की उम्मीदवारी का ऐलान कर सकते हैं. AIMIM के नेता कह रहे हैं कि अगर किसी पार्टी के साथ गठबंधन होता है, तो सीटें उस हिसाब से तय की जाएंगी. अब तक की तैयारियों की बात करें तो AIMIM पश्चिमी यूपी के साथ साथ अवध के कुछ क्षेत्रों, खासकर बहराइच, बलरामपुर और बस्ती पर फोकस कर रही है. वैसे ही जैसे बिहार में सीमांचल पर जोर रहता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, AIMIM की यूपी में इस बार यूपी की 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी है. 2022 के विधानसभा चुनाव में AIMIM 95 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जिनमें 19 सीटों पर गैर-मुस्लिम उम्मीदवार उतारे गए थे. 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में AIMIM ने 38 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 37 सीटों पर उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी.
यूपी के AIMIM नेताओं की रणनीति इस बार मुस्लिम वोटर के बीच खुद को समाजवादी पार्टी के मुकाबले बेहतर विकल्प के तौर पर पेश करने की है. और, उसके साथ ही एक और कोशिश यूपी में दलित-मुस्लिम गठजोड़ के जरिए जमीन मजबूत करने का मकसद भी है. AIMIM नेताओं को लगता है कि अगर मायावती की बीएसपी के साथ गठबंधन हो जाता है, तो समाजवादी पार्टी और बीजेपी को कड़ी टक्कर दी जा सकती है.
मायावती को चुनावी गठबंधन नामंजूर
AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी की जो भी कोशिश हो, लेकिन बीएसपी की तरफ से पहले ही साफ कर दिया गया है कि किसी भी राजनीतिक दल के साथ चुनावी गठबंधन नहीं होगा. पिछली बार भी असदुद्दीन ओवैसी की तरफ से ऐसी कोशिशें हुई थीं, लेकिन मायावती ने मंजूरी नहीं दी. हाल ही में कांग्रेस के कुछ नेताओं की तरफ से मायावती से मुलाकात की कोशिश की गई थी, लेकिन दरवाजे से बैरंग लौटना पड़ा था. ऐसे में इसे दूसरे दलों के लिए भी संदेश मान लिया जाना चाहिए.
बीएसपी नेताओं का कहना है, इस बार हम दलों का नहीं, बल्कि 2007 की तर्ज पर जनता का गठबंधन तैयार करके चुनाव जीतेंगे. 2007 में सफल मायावती की सोशल इंजीनियरिंग की आज भी मिसाल दी जाती है. तब मायावती ने दलित के साथ ब्राह्मण वोटर को जोड़कर चुनाव लड़ा था, और बीएसपी की अकेले दम पर सरकार बनवाई थी. बाद में एक बार मायावती ने दलित-मुस्लिम गठजोड़ की भी कोशिश की थी, लेकिन बात नहीं बनी. 2019 के लोकसभा चुनाव में बना सपा-बसपा गठबंधन मायावती के लिए काफी अच्छा रहा, जब बीएसपी को 10 सांसद लोकसभा पहुंचे थे.
22 जून से बीएसपी कार्यकर्ता सम्मेलन करने जा रही है. साथ ही, विधानसभा क्षेत्रों को टार्गेट कर रैलियां भी होंगी. कार्यकर्ता सम्मेलन में विधानसभा चुनाव प्रभारियों की घोषणा की जाएगी. बीएसपी में वैसे तो अंतिम दौर में भी प्रत्याशी बदल दिए जाते हैं, लेकिन अक्सर विधानसभा प्रभारी ही टिकट का हकदार माना जाता है. रिपोर्ट के अनुसार, बीएसपी पहले चरण में 100 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार भी तय करने जा रही है.
यूपी बीएसपी अध्यक्ष विश्वनाथ पाल के अनुसार, 'बहन जी के निर्देश पर बसपा कार्यकर्ता पूरी मजबूती से जुटे हैं. चाहे चुनाव 2026 के लास्ट में हो या 2027 में, हमारी तैयारी बेहद पुख्ता है. 15 जून को झांसी और फिर 22 जून को अयोध्या जनपद के बीकापुर में एक विशाल कार्यकर्ता सम्मेलन होने जा रहा है, जहां कई वरिष्ठ नेता बसपा ज्वाइन करेंगे. अगले दिन 23 जून को आंबेडकर नगर में बड़ा कार्यक्रम होगा, जहां हम प्रभारियों की घोषणा करेंगे.'
AIMIM की सपा के गढ़ पर धावा बोलने की तैयारी
बीएसपी के साथ गठबंधन हो न हो, असदुद्दीन ओवैसी के यूपी चुनाव का एजेंडा साफ है. बहराइच की मटेरा विधानसभा सीट पर AIMIM के यूपी चीफ को उतारने के प्लान से यह साफ हो जाता है. मटेरा असल में मुस्लिम, यादव, ओबीसी और अनुसूचित जाति की बड़ी आबादी वाला इलाका है. सबसे बड़ी बात यह है कि मटेरा 2012 से समाजवादी पार्टी के ही कब्जे में है. 2012 में यासर शाह और फिर उनकी पत्नी मारिया शाह मटेरा से विधायक हैं.
मटेरा की कौन कहे, AIMIM तो समाजवादी पार्टी के सबसे मजबूत गढ़ इटावा पर भी धावा बोलने की तैयारी में है. इटावा में AIMIM ने ई-रिक्शा अभियान के जरिए चुनावी तैयारी शुरू कर दी है. AIMIM की तैयारी इटावा सदर, भरथना और जसवंतनगर जैसी विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारने की भी है.
देखा जाए तो असदुद्दीन ओवैसी की तैयारी बिहार चुनाव जैसी ही है. मुस्लिम इलाकों पर फोकस के साथ, निशाने पर अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी है, जैसे बिहार में लालू और तेजस्वी यादव की पार्टी आरजेडी थी. समाजवादी पार्टी का बड़ा आधार मुस्लिम वोटर रहा है. कांग्रेस के साथ गठबंधन में भी अखिलेश यादव का जोर मुस्लिम वोटर पर ही है. अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले में A अल्पसंख्यक होता है. वैसे समय-समय पर अखिलेश यादव अलग-अलग तरीके से भी समझाते हैं.
समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच कॉमन वोटर तो मुस्लिम समुदाय है, लेकिन राहुल गांधी का फोकस ओबीसी पर ज्यादा है. ओबीसी के साथ साथ कांग्रेस की तैयारी अति पिछड़ा और दलित वोट साधने की भी है. और, बताते हैं कि जल्दी ही ऐसे तबके के लोगों को लेकर कांग्रेस एक राष्ट्रीय अधिवेशन की तैयारी कर रही है.
लेकिन सारी तैयारी एक तरफ और असदुद्दीन ओवैसी की तैयारी एक तरफ. यूपी में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM की भूमिका अब तक तो वोटकटवा वाली भूमिका ही रही है. अगर असदुद्दीन ओवैसी के प्रभाव के कारण समाजवादी गठबंधन को नुकसान होता है तो यूपी में सत्ताधारी बीजेपी को फायदा मिलना पक्का है. पिछले चुनावों में मायावती पर भी बीजेपी को फायदा पहुंचाने के आरोप लग चुके हैं - अब AIMIM और बीएसपी के बीच गठबंधन न हो तब भी, लगता तो यही है कि दोनों की रणनीति एक ही दिशा में बढ़ रही है.