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पहले छात्रों की गूंज, अब शुद्धीकरण पर युद्ध... क्या उत्तराखंड को प्रयोगशाला बना रही कांग्रेस?

उत्तराखंड के आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस ने युवाओं और दलितों को साधने की नई आक्रामक रणनीति अपनाई है.'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के बाद अब हल्द्वानी के शुद्धीकरण विवाद को 'दलित स्वाभिमान' का मुद्दा बनाकर पार्टी राज्य को अपनी नई सियासी प्रयोगशाला बनाती नजर आ रही है.,

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उत्तराखंड में राहुल गांधी की दलित पॉलिटिक्स (Photo-PTI)
उत्तराखंड में राहुल गांधी की दलित पॉलिटिक्स (Photo-PTI)

उत्तराखंड में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस ने अभी से एक नई और आक्रामक चुनावी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है. कांग्रेस ने पहले पेपर लीक के मुद्दे पर 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के जरिए युवाओं को साधने की कवायद की, तो अब हल्द्वानी के रामलीला मैदान से शुरू हुआ शुद्धीकरण विवाद एक बड़े राजनीतिक युद्ध में तब्दील हो गया है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस इस बार उत्तराखंड को अपनी नई 'राजनीतिक प्रयोगशाला' बनाने में जुटी है?

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद हुए कथित धार्मिक अनुष्ठान को लेकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सवाल उठाते हुए इसे सीधे तौर पर दलित सम्मान और छुआछूत के मुद्दे से जोड़ दिया है. अब इस मामले में राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज होने के बाद पूरी घटना ने नया राजनीतिक मोड़ ले लिया है.

कांग्रेस ने इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी को 'दलित विरोधी' बताकर कटघरे में खड़ा करने का प्लान बनाया है. पार्टी सड़क पर उतरकर आक्रामक तरीके से इस मुद्दे को उठाने और भाजपा के खिलाफ नया सियासी नैरेटिव गढ़ने में जुट गई है.

'छात्रों की गूंज' के जरिए युवाओं को साधने का दांव

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव अभियान का आगाज राहुल गांधी ने देहरादून में आयोजित 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के जरिए किया, जहां उन्होंने देश और उत्तराखंड के युवाओं के मुद्दों को मुखरता से उठाया. उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि यह कोई पारंपरिक राजनीतिक रैली नहीं, बल्कि युवाओं के संघर्ष, शिक्षा प्रणाली और उनके भविष्य की वास्तविक समस्याओं पर केंद्रित एक गंभीर संवाद है.

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राहुल गांधी ने देश भर में लगातार हो रहे पेपर लीक और परीक्षा प्रणालियों की गड़बड़ियों को लेकर केंद्र और राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला. उन्होंने कहा कि हर साल लाखों छात्र अपने सपनों को पूरा करने के लिए कठिन परिश्रम करते हैं, लेकिन व्यवस्था की खामियों और पेपर लीक के कारण उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता है.

युवाओं के साथ इस सीधे संवाद के जरिए राहुल गांधी ने यह संदेश दिया कि देश के विकास की धुरी युवा शक्ति ही है. कांग्रेस छात्रों और युवाओं के अधिकारों की लड़ाई को सड़क से लेकर संसद तक पूरी मजबूती से लड़ेगी, ताकि उनके भविष्य और शिक्षा तंत्र को सुरक्षित किया जा सके.

हल्द्वानी में शुद्धीकरण से FIR तक पहुंचा मामला

हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद आयोजित 'शुद्धीकरण यज्ञ' और गंगाजल छिड़काव का मामला उत्तराखंड में एक बड़ा राजनीतिक तूफान बन चुका है. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि खरगे के दलित समुदाय से होने की वजह से यह सब किया गया. हालांकि, भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि धार्मिक अनुष्ठान को खरगे की जाति से जोड़ना पूरी तरह गलत है.

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे को सीधे तौर पर 'दलित स्वाभिमान' और 'संविधान' पर हमले से जोड़ दिया है. उन्होंने कहा कि यह केवल मल्लिकार्जुन खरगे का ही नहीं, बल्कि सभी अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग का अपमान है. इसी विवाद में अब राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई है, जिसे कांग्रेस ने एक राजनीतिक लड़ाई बनाकर भाजपा को घेरने का प्लान तैयार किया है.

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एफआईआर के बाद कांग्रेस के आक्रामक तेवर

कांग्रेस ने सवाल उठाना शुरू कर दिया है कि जिस घटना को लेकर कार्रवाई की मांग की गई थी, उसमें उल्टे राहुल गांधी के खिलाफ FIR क्यों दर्ज हुई? पार्टी ने इसे सामाजिक न्याय के मुद्दे से जोड़ना शुरू कर दिया है. राहुल गांधी ने इस विवाद को खरगे व्यक्तिगत रूप से न जोड़कर पूरे दलित समाज के सम्मान से जोड़ने की कोशिश की है. सियासी तौर पर यह कांग्रेस के लिए अहम है, क्योंकि पार्टी सामाजिक न्याय के मुद्दे पर अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी है.

दरअसल, राहुल गांधी काफी समय से जाति जनगणना, सामाजिक न्याय, दलितों और पिछड़े वर्गों के मुद्दों पर लगातार मुखर रहे हैं, इसलिए हल्द्वानी विवाद को उनकी मौजूदा राजनीतिक रणनीति से अलग करके देखना मुश्किल है. कांग्रेस इस मामले को केवल कानूनी लड़ाई तक सीमित न रखकर बड़ा सियासी मुद्दा बनाने में जुट गई है.

कांग्रेस ने मंगलवार को राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन, पुलिस थानों के घेराव और 'सचिवालय कूच' की रणनीति बनाकर भाजपा सरकार को घेरने की तैयारी की है. कांग्रेस की मुख्य रणनीति भाजपा की छवि को 'दलित विरोधी' के रूप में पेश करने की है.

दलित वोटों को साधने के लिए कांग्रेस का दांव

हल्द्वानी की घटना को कांग्रेस जिस तरह से उठा रही है, उससे साफ है कि पार्टी दलित सम्मान और सामाजिक न्याय के मुद्दे के जरिए दलित वोटों को साधने की कोशिश में है. मल्लिकार्जुन खरगे खुद दलित समुदाय से आते हैं, इसलिए कांग्रेस के लिए यह मुद्दा राजनीतिक और प्रतीकात्मक दोनों रूपों में बेहद महत्वपूर्ण है. राहुल गांधी की आक्रामक एंट्री के बाद पार्टी इसे व्यापक सामाजिक न्याय की बहस से जोड़ती दिखाई दे रही है.

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मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी दोनों के आक्रामक तेवरों के चलते यह मामला राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है.  उत्तराखंड में दलित समुदाय की आबादी लगभग 19 फीसदी के करीब है, जो राज्य की लगभग 13 से 15 आरक्षित विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाती है.

खरगे देश के सबसे बड़े राजनीतिक दलों में से एक के प्रमुख और दलित समुदाय के बड़े चेहरे हैं. कांग्रेस इस घटना को 'मनुवादी सोच' और अस्पृश्यता से जोड़कर सीधे दलित अस्मिता से जोड़ रही है. उत्तराखंड में बहुजन समाज पार्टी का जनाधार पिछले कुछ चुनावों में धीरे-धीरे खिसका है, ऐसे में कांग्रेस इस मुद्दे को भुनाकर सूबे में दलित वोट बैंक को अपने पाले में वापस लाने की कोशिश कर रही है.

इसके अलावा, हल्द्वानी को कुमाऊं का प्रवेश द्वार माना जाता है, जिसका राजनीतिक असर पूरे तराई-भाबर इलाके (नैनीताल, ऊधमसिंह नगर, चंपावत आदि) पर पड़ता है. हल्द्वानी और आसपास के क्षेत्रों में दलित, मुस्लिम और सवर्ण आबादी का मिला-जुला समीकरण है. इस मुद्दे के जरिए कांग्रेस 'सामाजिक न्याय' का विमर्श खड़ा कर शहरी और ग्रामीण दोनों वर्ग के वोटरों को प्रभावित करने का प्रयास कर रही है.

उत्तराखंड में सीधे बीजेपी बनाम कांग्रेस की लड़ाई

उत्तराखंड की सियासत में हमेशा से कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी चुनावी लड़ाई होती रही है. 2022 से पहले तक राज्य में हर पांच साल पर सत्ता बदलने का ट्रेंड रहा है. 2017 से राज्य में भाजपा की सरकार है, ऐसे में कांग्रेस को 2027 में सत्ता में वापसी की बड़ी उम्मीद दिख रही है, जिसके चलते उसने शुद्धीकरण के मुद्दे पर इतना आक्रामक रुख अपनाया है.

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उत्तराखंड कांग्रेस लंबे समय से अंदरूनी गुटबाजी (जैसे पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, प्रीतम सिंह, यशपाल आर्य और गणेश गोदियाल के बीच की खींचतान) से जूझती रही है. हालांकि, खरगे विवाद ने कांग्रेस के सभी धड़ों को एक साथ सड़क पर ला खड़ा किया है. 

उत्तराखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य खुद एक बड़े दलित चेहरे हैं और इस मुद्दे पर उनके आक्रामक रुख ने कार्यकर्ताओं में नया जोश भर दिया है. कांग्रेस अब यह संदेश देने में जुट गई है कि दलित सम्मान का सवाल उठाने पर राहुल गांधी के खिलाफ कार्रवाई की गई.

वहीं, भाजपा के लिए चुनौती यह है कि दलित समाज के बीच उसके प्रति कोई नकारात्मक धारणा न बनने पाए. भाजपा को लगातार यह स्पष्ट करना होगा कि धार्मिक अनुष्ठान का खरगे की जाति से कोई संबंध नहीं था. यह घटनाक्रम मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की राजनीतिक क्षमता और प्रतिक्रिया की भी बड़ी परीक्षा है.

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