उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग (रोहिलखंड क्षेत्र) में रामगंगा नदी के तट पर स्थित मुरादाबाद जिले को दुनिया भर में 'पीतल नगरी' (Brass City) के नाम से जाना जाता है. पीतल हो या लकड़ी, यहां बनाए गए हस्तशिल्प के प्रोडक्ट्स दुनिया भर में फेमस हैं. वहीं, मुरादाबादी बिरयानी के तो कहने ही क्या... यह अपने आप में एक अलग रेसिपी है, जिसे नॉनवेज के शौकीन बड़े चाव से खाते हैं. बात सियासत की करें तो कांग्रेस नेत्री प्रियंका गांधी की ससुराल भी मुरादाबाद ही है.
यह जिला उत्तराखंड की सीमा से सटा है. यहां से नैनीताल काफी करीब है. उत्तर रेलवे का मंडल कार्यालय होने के साथ-साथ अब यहां एयरपोर्ट की सुविधा भी उपलब्ध है. प्राचीन काल में 'चौपाला' नाम से प्रसिद्ध इस शहर पर 1624 ईस्वी में संभल के गवर्नर रुस्तम खान ने कब्जा किया था. बाद में मुगल बादशाह शाहजहां के पुत्र मुराद बख्श ने इसकी स्थापना की, जिनके नाम पर इसका नाम मुरादाबाद पड़ा. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में मुरादाबाद के आम लोगों और स्थानीय नवाबों ने अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंका था.
इस 'पीतल नगरी' में गेहूं, धान, गन्ना और आम की पैदावार भी बड़े पैमाने पर होती है. यहां कई मेंथा (Mentha) तेल रिफाइनरी और चीनी मिलें भी स्थित हैं. प्रदेश सरकार की 'ODOP' योजना के तहत मुरादाबाद के मेटल हैंडीक्राफ्ट्स (धातु हस्तशिल्प) को शामिल किया गया है.
जिले में हिंदू-मुस्लिम आबादी लगभग बराबर
गौरतलब है कि यूपी के 75 जिलों में मुरादाबाद एकमात्र जिला है जहां हिंदू और मुसलमानों की आबादी लगभग बराबर है. बाकी सिख और ईसाई आबादी नाममात्र की है. इसलिए, सामाजिक और राजनीतिक तौर पर हिंदुओ और मुसलमानों के बीच ही समीकरण साधे जाते हैं. एक आंकड़े के मुताबिक, जिले की कुल आबादी में लगभग 47% से 50% मुस्लिम आबादी और 50% से 52% हिंदू आबादी है.
जातीय समीकरण
मुस्लिम मतदाता: जिले में तुर्क, अंसारी (बुनकर), सैफी, कुरैशी और सैयद-पठान समुदायों का वर्चस्व है, जो चुनाव नतीजों को तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं.
ओबीसी (OBC): हिंदू मतदाताओं में सैनी (माली), यादव, गुर्जर और पाल (गडरिया) वर्ग की बड़ी संख्या है.
दलित (SC): जिले में दलित मतदाता लगभग 15% हैं, जिनमें मुख्य रूप से जाटव समुदाय शामिल है.
जनरल: वैश्य (गुप्ता/अग्रवाल), ठाकुर (राजपूत) और ब्राह्मण समुदाय शहरी क्षेत्रों (विशेषकर मुरादाबाद नगर) में राजनीतिक रूप से प्रभावशाली हैं.
2017 से 2022 तक... मुरादाबाद की 6 विधानसभा सीटों का गणित
मुरादाबाद जिले में कुल 6 विधानसभा सीटें (कांत, ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद देहात, मुरादाबाद नगर, कुंदरकी, और बिलारी) आती हैं. 2017 और 2022 के चुनावों में समाजवादी पार्टी का वर्चस्व देखने को मिला. वर्ष 2017 के चुनाव में मुरादाबाद जिले की 6 सीटों में से 4 सीटों पर सपा और 2 सीटों पर भाजपा (कांठ और मुरादाबाद नगर) ने जीत दर्ज की थी. वहीं, वर्ष 2022 के चुनाव में सपा ने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए 6 में से 5 सीटें जीत लीं, जबकि भाजपा के खाते में केवल 1 सीट (मुरादाबाद नगर) आई. आपको बता दें कि मुरादाबाद में सिर्फ एक लोकसभा सीट है जिसमें बिजनौर जिले की बढ़ापुर विधानसभा को भी शामिल किया गया है.
अन्य दलों की स्थिति: बहुजन समाज पार्टी (BSP) और कांग्रेस जैसी पार्टियां 2012 से 2022 के बीच मुरादाबाद जिले की किसी भी विधानसभा सीट पर जीत हासिल करने में असफल रहीं.
आजम खान का असर
रामपुर से सटे होने के कारण मुरादाबाद की राजनीति पर सपा के कद्दावर नेता आजम खान का गहरा प्रभाव रहा है. क्षेत्र में यह माना जाता रहा है कि टिकट वितरण में उनकी पसंद बेहद अहम भूमिका निभाती है. 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने पहले इकराम कुरैशी को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन बाद में आजम के करीबी और मुरादाबाद के पूर्व मेयर डॉ. एसटी हसन को मैदान में उतारा गया था. हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में आजम खान के दबाव के चलते एसटी हसन का टिकट काटकर उनकी दूसरी करीबी रुचि वीरा को दे दिया गया, जिन्होंने चुनाव में जीत दर्ज की.