मुरादाबाद, जिसे भारत की 'पीतल नगरी' (Brass City) के नाम से जाना जाता है, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रामगंगा नदी के किनारे बसा एक हलचल भरा शहर है. शहर से गगन नाम की एक छोटी नदी भी बहती है. अपने बेहतरीन पीतल के सामान और हस्तशिल्प उद्योग के लिए दुनिया भर में मशहूर मुरादाबाद अपनी समृद्ध संस्कृति और खाने-पीने की चीजों, खासकर बिरयानी और दाल के लिए भी जाना जाता है. यह शहर कई जाने-माने कलाकारों और साहित्यकारों का घर रहा है. यह उत्तर प्रदेश का 10वां सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर है और यहां अपना नगर निगम है.
1951 में बनी मुरादाबाद नगर विधानसभा सीट एक सामान्य (अनारक्षित) सीट है और यह मुरादाबाद लोकसभा क्षेत्र के पांच हिस्सों में से एक है. इसमें 79 वर्ग किलोमीटर में फैला पूरा शहरी इलाका आता है और यह पूरी तरह से शहरी विधानसभा क्षेत्र है.
आजादी के बाद से उत्तर प्रदेश में हुए सभी 18 विधानसभा चुनावों में मुरादाबाद नगर सीट पर वोटिंग हुई है. मुरादाबाद नगर सीट पर छह हिंदू उम्मीदवारों ने 11 बार और पांच मुस्लिम उम्मीदवारों ने सात बार जीत हासिल की है. बीजेपी ने यह सीट सात बार जीती है, जिसमें भारतीय जनसंघ के तौर पर मिली एक जीत भी शामिल है. वहीं कांग्रेस ने चार बार, जबकि जनता दल और निर्दलीय उम्मीदवारों ने दो-दो बार जीत हासिल की है. रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी ने एक-एक बार जीत हासिल की है. इस सीट पर मौजूदा विधायक को दोबारा चुनने का इतिहास रहा है और इसे आम तौर पर बीजेपी का गढ़ माना जाता है, हालांकि हाल के वर्षों में समाजवादी पार्टी ने यहां कड़ी टक्कर दी है.
2012 में, समाजवादी पार्टी के मोहम्मद यूसुफ अंसारी ने रितेश कुमार गुप्ता को 20,238 वोटों से हराकर बीजेपी की जीत का सिलसिला रोक दिया था. अंसारी और गुप्ता का आमना-सामना 2017 और 2022 में भी हुआ, जिसमें दोनों बार बीजेपी के गुप्ता जीते. 2017 में गुप्ता ने अंसारी को 3,193 वोटों से हराया था, लेकिन 2022 में यह अंतर घटकर सिर्फ 782 वोट रह गया.
लोकसभा चुनावों में भी समाजवादी पार्टी की बढ़ती ताकत दिखाई दी. 2009 में, इस इलाके में कांग्रेस बीजेपी से 32,537 वोटों से आगे थी. 2014 में BJP ने समाजवादी पार्टी पर 38,763 वोटों की बढ़त बनाई थी और 2019 में 11,217 वोटों की बढ़त हासिल की थी. हालांकि, 2024 में समाजवादी पार्टी ने बाजी पलट दी और BJP से 10,141 वोटों से आगे निकल गई. रुचि वीरा को 146,809 वोट मिले, जबकि कुंवर सर्वेश कुमार सिंह को 136,668 वोट मिले.
मुरादाबाद नगर में वोटरों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है. 2012 में यहां 388,966 रजिस्टर्ड वोटर थे, जो 2017 में बढ़कर 470,792, 2019 में 505,273, 2022 में 529,243 और 2024 में 538,132 हो गए. वोटिंग का प्रतिशत (टर्नआउट) काफी हद तक कम रहा है, जिसकी वजह शहरी वोटरों की चुनावों के प्रति आम उदासीनता हो सकती है. वोटिंग प्रतिशत 2012 में 53.85%, 2017 में 58.80%, 2019 में 58.67%, 2022 में 60.79% और 2024 में 55.89% रहा.
2011 की जनगणना के अनुमानों के अनुसार, मुरादाबाद नगर हिंदू-बहुसंख्यक निर्वाचन क्षेत्र है, जहां मुसलमानों की संख्या भी लगभग उतनी ही है. यहां की आबादी में हिंदू 51.68% और मुसलमान 46.79% हैं. अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी वोटरों में 11.51% है. पूरी तरह से शहरी सीट होने के कारण, यहां की वोटर लिस्ट में कोई ग्रामीण वोटर नहीं है.
मुरादाबाद का इतिहास चार सदियों से भी पुराना और समृद्ध है. शुरू में इसे चौपाला के नाम से जाना जाता था, फिर कुछ समय के लिए इसका नाम बदलकर रुस्तमनगर रखा गया और बाद में मुगल राजकुमार मुराद बख्श (सम्राट शाहजहां के बेटे) के नाम पर इसका नाम मुरादाबाद रखा गया. यह शहर मुगल शासन के दौरान एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित हुआ, बाद में रोहिल्ला प्रभाव में आया और रोहिल्ला युद्ध के बाद अंग्रेजों को सौंप दिया गया. इसने 1857 के विद्रोह के दौरान अहम भूमिका निभाई और बाद में भारत की आजादी की लड़ाई का एक सक्रिय केंद्र बन गया. 1980 में इस शहर ने सांप्रदायिक दंगे भी देखे, जिनका यहां के सामाजिक ताने-बाने पर गहरा असर पड़ा.
मुरादाबाद की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से इसके विश्व-प्रसिद्ध पीतल के सामान और हस्तशिल्प उद्योग पर टिकी है, जो निर्यात में बड़ा योगदान देता है और लाखों कारीगरों को रोजगार देता है. हाल के वर्षों में, अन्य धातुओं, मिश्र धातुओं और निर्यात-उन्मुख इकाइयों के निर्माण का भी विस्तार हुआ है. व्यापार, लघु उद्योग और वाणिज्य शहर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं.
मुरादाबाद शहर में बुनियादी ढांचा काफी विकसित है. शहर में राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों के माध्यम से बेहतरीन सड़क संपर्क है. 1873 में बना और 2012 में विद्युतीकृत मुरादाबाद रेलवे स्टेशन, भारत के सबसे पुराने और व्यस्त रेलवे स्टेशनों में से एक है.
मुरादाबाद शहर राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली से लगभग 165 किमी और राज्य की राजधानी लखनऊ से उत्तर-पश्चिम में 356 किमी दूर है. मेरठ लगभग 70-80 किमी, बरेली लगभग 80-90 किमी, रामपुर लगभग 40 किमी, हरिद्वार लगभग 110-120 किमी और उत्तराखंड में काशीपुर लगभग 60-70 किमी दूर है.
हालांकि मुरादाबाद को अभी भी भाजपा का गढ़ माना जाता है, लेकिन समाजवादी पार्टी के उभार और उसे मिल रहे मजबूत मुस्लिम समर्थन ने आगामी मुकाबले को दिलचस्प और रोमांचक बना दिया है. भाजपा की एक और जीत की संभावना इस बात पर निर्भर करेगी कि वह बहुसंख्यक हिंदू मतदाताओं को अपने पक्ष में एकजुट कर पाती है या नहीं, और साथ ही उसे BSP और AIMIM जैसी मुस्लिम-समर्थक पार्टियों द्वारा मुस्लिम वोटों के बंटवारे की उम्मीद भी होगी. मतदान का प्रतिशत भी इसमें अहम भूमिका निभा सकता है. बीजेपी कार्यकर्ताओं को हिंदू वोटरों को मनाने और उन्हें वोटिंग के दिन बड़ी संख्या में बाहर लाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी. 2022 में उनकी मामूली जीत का मुख्य कारण बीएसपी और कांग्रेस द्वारा मुस्लिम वोटों का बंटवारा था, और बीजेपी 2027 के विधानसभा चुनावों में भी इसी तरह के नतीजे की उम्मीद करेगी.
(अजय झा)
Mohd Yusuf Ansari
SP
Irshad Hussain
BSP
Rizwan Qureshi
INC
Waqi Rasheed
AIMIM
Nota
NOTA
Arun Prakash Singh
AAAP
Avinash Chandra
SUCI
Vipin
SHS
Shamshad Ahmad
IND
Mohd Danish
ASPKR
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य की कानून व्यवस्था और सुरक्षा को लेकर पिछली सरकारों पर निशाना साधा है. सीएम योगी ने कहा कि 2017 से पहले प्रदेश में आम जनता की आवाज नहीं सुनी जाती थी और अपराधियों को संरक्षण मिलता था. उन्होंने कहा कि आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है. अब अगर कोई अपराध करता है तो उस पर तुरंत कठोर कार्रवाई की जाती है. आज प्रदेश में कोई भी गुंडा टैक्स वसूलने की हिम्मत नहीं कर सकता.
पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने मिर्जापुर के चुनार में घोषणा की कि उनकी नई पार्टी जननीति भारत आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में भाग लेगी. उन्होंने कहा कि पार्टी मजबूत उम्मीदवार मिलने पर सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी.
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ी के सामने आने के बाद निर्वाचन आयोग ने सख्त रुख अपनाया है. जांच के दौरान यह बात उजागर हुई कि बिना किसी फॉर्म 8 के आवेदन के ही 10,000 से अधिक मतदाताओं के नाम और उनके पिता के नाम में बदलाव कर दिए गए. चुनाव आयोग ने इस मामले को केवल एक लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर अपराध माना है. इसके बाद संबंधित अधिकारियों और कंप्यूटर ऑपरेटरों के खिलाफ मामला दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की गई है.
उत्तर प्रदेश में शनिवार को मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है. इस अभियान के तहत प्रदेश के सभी जिलों में सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक विशेष कैंप लगाए गए हैं.
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि प्रदेश में शिक्षक और स्नातक मतदाता सरकार से बुरी तरह नाराज हैं. उन्होंने दावा किया कि जनता ने बड़े पैमाने पर बीजेपी के खिलाफ मतदान करना शुरू कर दिया है. अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि अपनी हार सामने देखकर बीजेपी ने आगरा, फतेहपुर, इटावा, औरैया, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद और नोएडा जैसे कई जिलों में चुनावी धांधली करने की कोशिश की. प्रशासन और अधिकारियों के जरिए वोट डालने से रोकने का प्रयास किया गया, लेकिन जनता सब समझ चुकी है और बीजेपी की हार तय है.
बिजनौर की सियासत में गन्ने की मिठास के साथ जातीय समीकरणों का भी अपना गणित है. आठ विधानसभा सीटों वाले इस जिले में BJP-सपा की लड़ाई, दलित-मुस्लिम वोट और 2024 लोकसभा चुनाव में नगीना सीट पर चंद्रशेखर आजाद की जीत ने सियासी तस्वीर को खास बना दिया. आइए जानते हैं इस जिले की और क्या खासियत है.
बदायूं की पूर्व सांसद संघमित्रा मौर्य को 2024 में BJP ने टिकट नहीं दिया था. इसके बाद उनकी नाराजगी और राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं होती रहीं. पिता स्वामी प्रसाद मौर्य के कांग्रेस के साथ आने के बाद बिल्सी से चुनाव लड़ने की अटकलें तेज हुईं. अब संघमित्रा ने आज तक से बातचीत में BJP छोड़ने की चर्चा खारिज की है.
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पीलीभीत में वोटर लिस्ट की जांच के दौरान 10 हजार से ज्यादा ऐसी एंट्री मिलीं, जो जरूरी आवेदन के बिना की गई थीं. अब पूरे उत्तर प्रदेश में इसी तरह की गड़बड़ियों की जांच के आदेश दिए गए हैं.
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव रामपुर पहुंचे और जेल में बंद पार्टी नेता आजम खान से मुलाकात की. इस मुलाकात के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं. रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के छात्रों और एल्युमनी ने इस पूरे घटनाक्रम और असदुद्दीन ओवैसी के हालिया बयानों पर अपनी प्रतिक्रिया दी है.