कांठ, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में रामगंगा नदी के किनारे बसा एक सब-डिविजन स्तर का शहर है, जिसका अपना नगर पालिका परिषद है. यह एक तेजी से बढ़ता हुआ शहर है जो पूरे भारत में सप्लाई की जाने वाली पट्टियों (बैंडेज) के निर्माण के लिए जाना जाता है.
कांठ एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है और मुरादाबाद लोकसभा सीट के पांच हिस्सों में से एक है. यह निर्वाचन क्षेत्र 1957 के चुनावों से पहले बनाया गया था. 2008 के परिसीमन के बाद, अब इसमें पूरा कांठ सब-डिविजन और ठाकुरद्वारा व मुरादाबाद सब-डिविजन के कुछ हिस्से शामिल हैं.
कांठ में अब तक 17 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. यहां किसी एक राजनीतिक पार्टी का दबदबा नहीं रहा है. बीजेपी और कांग्रेस ने तीन-तीन बार यह सीट जीती है. भारतीय क्रांति दल, जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने दो-दो बार जीत हासिल की है, जबकि जनता दल, कांग्रेस (यू), पीस पार्टी ऑफ इंडिया, एक निर्दलीय उम्मीदवार और समाजवादी पार्टी ने एक-एक बार जीत दर्ज की है. पिछले तीन विधानसभा चुनाव तीन अलग-अलग पार्टियों ने जीते हैं, जो इस निर्वाचन क्षेत्र की अस्थिरता को दिखाता है.
2012 में पीस पार्टी ऑफ इंडिया के अनीसुर्रहमान ने बीएसपी के रिजवान अहमद खान को 37,092 वोटों से हराकर यह सीट जीती थी. बाद में वे समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए. 2017 में, मुस्लिम वोटों के बंटवारे से बीजेपी के राजेश कुमार सिंह को अनीसुर्रहमान के खिलाफ 2,348 वोटों के मामूली अंतर से सीट जीतने में मदद मिली. 2022 में, समाजवादी पार्टी ने यह सीट जीती, जिसमें कमाल अख्तर ने मौजूदा बीजेपी विधायक राजेश कुमार सिंह को 43,178 वोटों से हराया.
कांठ के मतदाताओं का मिजाज इस क्षेत्र के लोकसभा चुनाव के रुझानों में भी दिखता है. 2009 में, कांग्रेस बीजेपी से 14,297 वोटों से आगे थी. 2014 में बीजेपी ने समाजवादी पार्टी पर 9,486 वोटों की बढ़त बनाई. 2019 में समाजवादी पार्टी ने BJP पर 45,719 वोटों की बढ़त बनाई थी और 2024 में भी यह बढ़त बनाए रखी, हालांकि अंतर कम होकर 28,239 वोट रह गया. इस चुनाव में रुचि वीरा को 1,27,838 वोट मिले, जबकि कुंवर सर्वेश कुमार सिंह को 99,599 वोट मिले.
कांठ में वोटरों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है. 2012 के विधानसभा चुनाव में यहां 302,267 रजिस्टर्ड वोटर थे और वोटिंग प्रतिशत 66.41% था. यह संख्या 2017 में बढ़कर 355,629 (वोटिंग 71.17%), 2019 में 365,984 (वोटिंग 69.88%), 2022 में 390,562 (वोटिंग 70.11%) और 2024 में 391,579 (वोटिंग 66.67%) हो गई. लोकसभा चुनावों की तुलना में विधानसभा चुनावों में वोटिंग प्रतिशत आमतौर पर ज्यादा रहता है.
2011 की जनगणना के अनुमानों के अनुसार, अनुसूचित जाति के वोटर कुल वोटरों का लगभग 15.85% हैं. कांठ में मुस्लिम आबादी भी काफी है, जो एक मजबूत और प्रभावशाली वोट बैंक बनाती है. यह निर्वाचन क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है, यहां 83.14% वोटर गांवों में रहते हैं, जबकि शहरी इलाकों में रहने वाले वोटरों की संख्या 16.86% है.
कांठ की स्थापना 1625 में कुंवर साहब ने की थी, जिन्होंने नदी के किनारे एक किला बनवाया था. यह एक जमींदारी एस्टेट था जिसमें दो मुख्य रियासतें पश्चिमी और पूर्वी शामिल थीं. ब्रिटिश शासन के दौरान, यह यूनाइटेड प्रोविंस के बरेली डिवीजन का हिस्सा बन गया. स्थानीय शासकों ने कॉलेज और सरकारी अस्पताल बनवाकर तथा सार्वजनिक संस्थानों के लिए जमीन देकर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में अहम योगदान दिया. यह कस्बा एक छोटी सी बस्ती से बढ़कर अब एक हलचल भरे कमर्शियल सेंटर में बदल गया है.
यहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से खेती (खासकर गन्ना) और छोटे पैमाने के उद्योगों, विशेषकर बैंडेज और उससे जुड़े मेडिकल सामान के निर्माण पर टिकी है. हाल के वर्षों में, रेडीमेड कपड़ों के उत्पादन ने भी तेजी पकड़ी है और यह शहर की अर्थव्यवस्था में एक अहम योगदानकर्ता बनकर उभरा है. व्यापार और कृषि-प्रसंस्करण इकाइयां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं. किसानों के मुद्दे, औद्योगिक विकास, बिजली की आपूर्ति और रोजगार मतदाताओं के लिए मुख्य चिंताएं हैं.
भौगोलिक रूप से, कांठ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उपजाऊ मैदानों में रामगंगा नदी के किनारे बसा है. यहां की जमीन ज्यादातर समतल है और नहरों से सिंचाई के जरिए यहां बड़े पैमाने पर खेती होती है.
यहां के बुनियादी ढांचे में नेशनल और स्टेट हाईवे के जरिए अच्छी सड़क कनेक्टिविटी शामिल है. कांठ में एक रेलवे स्टेशन है जो बड़े रूटों से जुड़ा हुआ है.
कांठ जिला मुख्यालय मुरादाबाद से लगभग 35-40 किमी दूर है. उत्तराखंड में हरिद्वार लगभग 110-120 किमी, मेरठ लगभग 90-100 किमी, बिजनौर लगभग 70-80 किमी, सहारनपुर लगभग 130-140 किमी और दिल्ली लगभग 160-170 किमी दूर है. राज्य की राजधानी लखनऊ लगभग 400 किमी दूर है.
कांठ में मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी संख्या को देखते हुए, समाजवादी पार्टी को स्वाभाविक बढ़त हासिल है. हालांकि, मुस्लिम वोटों में कोई भी बंटवारा अक्सर बीजेपी के लिए रास्ता खोल देता है. मुख्य मुकाबला इन्हीं दो पार्टियों के बीच होने की संभावना है. बीजेपी चाहेगी कि मुस्लिम वोटों को बांटने के लिए बीएसपी और एआईएमआईएम का प्रदर्शन मजबूत हो, साथ ही वह हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने की भी कोशिश करेगी. मतदाताओं की जनसांख्यिकी यह तय करती है कि कांठ में जबरदस्त मुकाबला देखने को मिल सकता है, जिसमें सांप्रदायिक भावनाएं भी शामिल हो सकती हैं. कौन सी पार्टी अपने मुख्य मतदाताओं को बेहतर ढंग से एकजुट कर पाती है, यही अंततः 2027 के विधानसभा चुनावों के नतीजे तय करेगा.
(अजय झा)
Rajesh Kumar Singh Urf Chunnu
BJP
Afaq Ali Khan
BSP
Raisuddin
AIMIM
Kailash Kumar
LTSP
Mohd Israr
INC
Nota
NOTA
Omkar Singh
IND
Mujfafar Khan
IND
Dushyant Singh
IND
Rajesh Kumar
RSPS
Trilok Chandra
AAAP
Humaira Akhtar
IND
Mohd Aslam Urf Pasha
IND
Nar Singh Saini
JANADIP
Nadir Ali Mansoori
PECP
पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने मिर्जापुर के चुनार में घोषणा की कि उनकी नई पार्टी जननीति भारत आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में भाग लेगी. उन्होंने कहा कि पार्टी मजबूत उम्मीदवार मिलने पर सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी.
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उत्तर प्रदेश में शनिवार को मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है. इस अभियान के तहत प्रदेश के सभी जिलों में सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक विशेष कैंप लगाए गए हैं.
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि प्रदेश में शिक्षक और स्नातक मतदाता सरकार से बुरी तरह नाराज हैं. उन्होंने दावा किया कि जनता ने बड़े पैमाने पर बीजेपी के खिलाफ मतदान करना शुरू कर दिया है. अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि अपनी हार सामने देखकर बीजेपी ने आगरा, फतेहपुर, इटावा, औरैया, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद और नोएडा जैसे कई जिलों में चुनावी धांधली करने की कोशिश की. प्रशासन और अधिकारियों के जरिए वोट डालने से रोकने का प्रयास किया गया, लेकिन जनता सब समझ चुकी है और बीजेपी की हार तय है.
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