उत्तर प्रदेश के रोहिलखंड क्षेत्र में स्थित बरेली की पहचान सिर्फ झुमका नगरी के तौर पर नहीं है. यह अपनी ऐतिहासिक विरासत, धार्मिक स्थलों, पारंपरिक उद्योगों और राजनीतिक पहचान के लिए जाना जाता है. बरेली को नाथ नगरी, बरेली शरीफ और जरी नगरी के नामों से भी जाना जाता है. यहां एक ओर अहिच्छत्र के प्राचीन पुरातात्विक अवशेष इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी हैं, तो दूसरी ओर आला हजरत की दरगाह और नाथ संप्रदाय से जुड़े मंदिर शहर को धार्मिक पहचान देते हैं. जिले में नौ विधानसभा सीटें हैं. आइए, जानते हैं बरेली के इतिहास, धार्मिक स्थलों, प्रशासनिक ढांचे और सियासी गणित की पूरी कहानी.
बरेली जिले का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा है.यहां की आंवला तहसील के रामनगर गांव के पास प्राचीन अहिच्छत्र के विस्तृत अवशेष मिले हैं. अहिच्छत्र को उत्तरी पांचाल की राजधानी के रूप में वर्णित किया गया है. जिला प्रशासन की वेबसाइट के मुताबिक, यहां गुप्त काल से पहले के लगभग पांच हजार सिक्के मिले थे. पुरातात्विक सामग्री के आधार पर इस क्षेत्र के इतिहास को दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के आरंभ से 11वीं शताब्दी ईस्वी तक समझने में मदद मिलती है. जिले में तिहार-खेड़ा, पचौमी, रहटुइया, कादरगंज और सेंथल जैसे स्थानों पर भी प्राचीन टीले मिलने का उल्लेख है. महाभारत से जुड़ी मान्यताओं में बरेली क्षेत्र को पांचाल प्रदेश और द्रौपदी की जन्मभूमि के रूप में वर्णित किया जाता है. यहां स्थानीय जनश्रुति के आधार पर गौतम बुद्ध के प्राचीन अहिच्छत्र आने का भी उल्लेख मिलता है.
आधुनिक बरेली शहर की स्थापना वर्ष 1537 में मानी जाती है. जगत सिंह कठेरिया के पुत्र बंसलदेव और बरलदेव के नाम शहर की स्थापना से जुड़े हैं. इसी आधार पर बांस-बरेली नाम की उत्पत्ति की व्याख्या की गई है. जिला प्रशासन यह भी स्पष्ट करता है कि बरेली की पहचान केवल बांस के कारोबार से नहीं, बल्कि इसके ऐतिहासिक नामकरण से भी जुड़ी है. बरेली का संबंध स्वतंत्रता आंदोलन से भी रहा है. खिलाफत आंदोलन के दौरान यहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की गतिविधियां प्रमुख हुईं और महात्मा गांधी ने उस दौर में दो बार बरेली का दौरा किया. गांधीजी के आह्वान पर जिले में 26 जनवरी 1930 को सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ. वर्ष 1936 में आचार्य नरेंद्र देव की अध्यक्षता में बरेली में कांग्रेस सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसे जवाहरलाल नेहरू, एमएन रॉय, पुरुषोत्तम दास टंडन और रफी अहमद किदवई समेत कई नेताओं ने संबोधित किया. बरेली की जेल में जवाहरलाल नेहरू, रफी अहमद किदवई और महावीर त्यागी जैसे नेताओं के बंद रहने का उल्लेख भी आधिकारिक इतिहास पेज पर मिलता है.
नाथ नगरी और बरेली शरीफ की धार्मिक पहचान
बरेली को देशभर में झुमका नगरी के नाम से पहचान मिली है.लोकप्रिय गाना ‘झुमका गिरा रे’ ने इस पहचान को और लोकप्रिय बनाया. इसके अलावा बरेली जरी-जरदोजी के काम, फर्नीचर उद्योग और पारंपरिक व्यापार के लिए भी जाना जाता है. बरेली की दूसरी महत्वपूर्ण पहचान इस्लामी विद्वान इमाम अहमद रजा खान से जुड़ी है, जिन्हें आला हजरत के नाम से जाना जाता है. बरेली जिला प्रशासन के अनुसार, उनका जन्म 14 जून 1856 को हुआ था और उनका निधन 28 अक्टूबर 1921 को हुआ. वह इस्लामी विद्वान, विधिवेत्ता, सूफी और धार्मिक सुधारक के रूप में वर्णित हैं. उनकी दरगाह बरेली में स्थित है. जिला प्रशासन की पर्यटन वेबसाइट पर दरगाह आला हजरत, दरगाह हजरत शाह शराफत मियां और खानकाह-ए-नियाजिया का भी उल्लेख है.
फिल्म, साहित्य और शोध के क्षेत्र में भी बरेली की पहचान
बरेली की पहचान केवल अपने ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व तक सीमित नहीं है, बल्कि फिल्म, साहित्य और वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में भी इस शहर का विशेष स्थान है. फिल्म जगत में अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा और दिशा पाटनी का बरेली से जुड़ाव रहा है. वहीं,उर्दू साहित्य में मशहूर शायर वसीम बरेलवी ने अपनी रचनाओं से देश-दुनिया में पहचान बनाई है. वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में बरेली स्थित भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI) पशु चिकित्सा विज्ञान और पशु स्वास्थ्य संबंधी शोध के लिए एक महत्वपूर्ण संस्थान है. इसके अलावा, केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान (CARI) मुर्गीपालन और कुक्कुट विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान एवं तकनीकी विकास में योगदान देता है. इन विविध क्षेत्रों में बरेली से जुड़े व्यक्तित्वों और संस्थानों की उपस्थिति शहर की बहुआयामी पहचान को दर्शाती है.
बरेली की सियासत के प्रमुख चेहरे
जिले से जुड़े प्रमुख राजनीतिक चेहरों में संतोष गंगवार का नाम शामिल है. वह लंबे समय तक बरेली लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. वर्तमान में वह झारखंड के राज्यपाल हैं, और उनकी बेटी को भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा का सांसद बनाया है. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने छत्रपाल सिंह गंगवार को उम्मीदवार बनाया और उन्होंने जीत भी दर्ज की.
विधानसभा स्तर पर भाजपा के धर्मपाल सिंह, डॉ. अरुण कुमार, संजीव अग्रवाल और डॉ. डीसी वर्मा जैसे नेताओं ने वर्ष 2022 के चुनाव में जीत दर्ज की थी. समाजवादी पार्टी की ओर से अताउर रहमान और शहजिल इस्लाम अंसारी भी विजयी रहे थे. इन चुनाव परिणामों के आधार पर जिले में दोनों दलों की चुनावी मौजूदगी का आकलन किया जा सकता है.
बरेली की नौ विधानसभा सीटें
बरेली में बहेड़ी, मीरगंज, भोजीपुरा, नवाबगंज, फरीदपुर, बिथरी चैनपुर, बरेली, बरेली कैंट और आंवला विधानसभा सीट हैं. फरीदपुर अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा क्षेत्र है.
आंवला: यहां बीजेपी के धर्मपाल सिंह ने जीत हासिल की थी. सपा के पंडित राधा कृषण शर्मा दूसरे नंबर पर रहे. बीएसपी के टिकट पर लक्ष्मण प्रसाद और कांग्रेस से ओमवीर भी चुनावी मैदान में थे.
नवाबगंज: बीजेपी प्रत्याशी से डॉक्टर एमपी आर्य ने समाजवादी पार्टी के भगवत सरन गंगवार को हरा दिया था. बीएसपी के टिकट पर यूसुफ खान और कांग्रेस से ऊषा देवी गंगवार भी चुनावी मैदान में थे.
फरीदपुर: बीजेपी प्रत्याशी श्याम बिहारी लाल ने यहां से जीत हासिल की. यहां से बीएसपी की शालिनी सिंह, सपा से विजय पाल सिंह और कांग्रेस के विशाल सागर भी चुनावी मैदान में थे.
बरेली: बीजेपी के डॉक्टर अरुण कुमार ने जीत हासिल की थी. वहीं सपा के राजेश कुमार अग्रवाल, बीएसपी के ब्रह्मा नंद शर्मा और कांग्रेस के कृष्ण कांत शर्मा भी चुनावी मैदान में थे.
बरेली कैंट: बीजेपी के संजीव अग्रवाल ने यहां से जीत हासिल की थी. सपा की सुप्रिया एरॉन, बीएसपी के अनिल कुमार और कांग्रेस के मोहम्मद इस्लाम अंसारी भी चुनावी मैदान में थे.
बहेड़ी: यहां से बीजेपी के छत्रपाल सिंह को हार का सामना करना पड़ा. सपा के अताउर रहमान ने भाजपा प्रत्याशी को हरा दिया. बीएसपी के असे राम और कांग्रेस कैंडिडेट संतोष भी चुनावी मैदान में थे.
बिथरी चैनपुर: सपा के अगम कुमार मौर्य यहां से हार गए. बीएसपी प्रत्याशी आशीष पटेल, कांग्रेस उम्मीदवार अल्का सिंह भी चुनावी मैदान में थे. इस सीट से बीजेपी के राधवेंद्र शर्मा ने जीत हासिल की.
भोजीपुरा: भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बहोरन लाल मौर्य यहां से चुनाव हार गए. सपा के शहजिल इस्लाम अंसारी ने यहां से जीत हासिल की. 2017 के चुनाव में यहां से बीजेपी के बहोरन लाल मौर्या जीते थे
मीरगंज: बीजेपी के डॉक्टर डीसी वर्मा ने जीत हासिल की. उनसे पीछे सपा के सुल्तान बेग, बीएसपी के कुंवर भानू प्रताप सिंह और कांग्रेस के इलियास रहे.