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Akka Review: मातृसत्ता का छलावा या पितृसत्ता का नया रूप, कैसी है सीरीज 'अक्का'?

अक्का में कीर्ति सुरेश और राधिका आप्टे लीड रोल में हैं. यह एक शानदार पीरियड ड्रामा सीरीज है, जो दमदार होने का वादा तो करती है, लेकिन उस उम्मीद पर खरा नहीं उतर पाती.

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कैसी है अक्का? (Photo: X/Netflix India)
कैसी है अक्का? (Photo: X/Netflix India)
फिल्म:अक्का
2.5/5
  • कलाकार : कीर्ति सुरेश, राधिका आप्टे, तन्वी आजमी, अंशुमान पुष्कर, मोनिका तंवर, विशाक नायर, पूर्णिमा इंद्रजीत, अंजलि पाटिल, महेश मांजरेकर
  • निर्देशक :धर्मराज शेट्टी

क्या कोई ऐसी दुनिया हो सकती है जहां कमान और बंदूकें दोनों महिलाओं के हाथ में हों, बैकग्राउंड में किसी पुराने दौर का कोई शानदार सेट हो, और चारों तरफ खौफनाक महिला गैंगस्टर का दबदबा हो? सुनने में यह आइडिया जितना रोमांचक लगता है, यशराज बैनर तले नेटफ्लिक्स पर आई नई सीरीज 'अक्का' से उम्मीदें भी उतनी ही बड़ी थीं. लेकिन, जैसा कि अक्सर होता है- चमक-धमक और शानदार सेटअप के बीच अगर कहानी ही कमजोर पड़ जाए, तो मामला बिखर जाता है. सीरीज में नयापन बहुत है, बस एक मजबूत कहानी की कमी ने सारा मजा फीका कर दिया है.

क्या है 'अक्का' की कहानी?
इसकी कहानी 800 साल पुराने इतिहास और 1980 के दशक के बीच झूलती रहती है. हम पहुंचते हैं दक्षिण भारत के एक काल्पनिक शहर 'पेरनुरु' में, जहां पूरी तरह महिलाओं का राज है. यहां की गद्दी पर बैठने वाली सर्वोच्च मुखिया को 'अक्का' कहा जाता है.

इस शहर के अपने कुछ अजीब और कड़े उसूल हैं- यहां औरतों को प्रेमी रखने की पूरी छूट है, लेकिन पति रखने की नहीं. बच्चियों को यहां कुल-देवियों की तरह पूजा जाता है, जो जंगलों और झीलों की रक्षा करती हैं. उत्तराधिकार भी सिर्फ बेटियों को ही मिलता है. यहां 'जैसे को तैसा' वाला इंसाफ चलता है, और किसी भी महिला का अपमान सीधे तौर पर एक बड़े प्रलय को बुलावा देता है. इसके अलावा, यहाँ की व्यवस्था में साक्षरता पर भी जोर दिया गया है.

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असली खेल तब शुरू होता है जब मुंबई से रुद्रा (राधिका आप्टे) पेरनुरु पहुंचती है और यहां की व्यवस्था को खुली चुनौती देती है. वह मर्दों की मदद से यहां की सत्ता हथियाना चाहती है. यह सीधी चुनौती कबीले की मुखिया भवानी (कीर्ति सुरेश), तन्वी आजमी और युवा योद्धा अंजलि पाटिल जैसी धारदार महिलाओं के सामने एक बड़ा खतरा बनकर सामने आती है. यहीं से सीरीज की मुख्य कहानी आगे बढ़ती है.

कहां आकर भटक गई गाड़ी?
शुरुआत के दो एपिसोड तक सब कुछ बहुत सॉलिड लगता है. महिलाएं बेखौफ होकर फैसले ले रही हैं और तलवारें चल रही हैं. लेकिन जैसे ही राधिका आप्टे की एंट्री होती है, कहानी 'महिला बनाम महिला' की किसी घिसी-पिसी रेस जैसी लगने लगती है.

राधिका के तंग गाउन और बड़े-बड़े चश्मे वाले लुक्स कुछ अजीब लगते हैं, जो पुराने दौर की बॉलीवुड फिल्मों की किसी लाउड 'विलेन' की याद दिलाते हैं. इसके उलट, पेरनुरु की बाकी महिलाएं हमेशा ऐसे सजी-धजी रहती हैं मानो किसी भव्य शादी या देवी के अनुष्ठान में जा रही हों. यहां तक कि जेल के अंदर भी उनका यही हाल है. अंशुमान पुष्कर (अमर के किरदार में) और नंदा (विशाक नायर) जैसे कलाकार भी हैं, हालांकि सिर्फ साइड रोल में.

यहां देखिए ट्रेलर

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सीरीज में दिखाई गई हिंसा से मुझे कोई गुरेज नहीं है. जब मर्दों की दुनिया में खून-खराबा आम बात है, तो फिर औरतें पीछे क्यों रहें? लेकिन एक बात ने मुझे अंदर से झकझोर दिया- आखिर एक बच्ची की जली हुई लाश (यह थोड़ा स्पॉइलर है) को समुद्र किनारे दिखाने की क्या जरूरत थी? हालांकि, इसी एक घटना के बाद अलग-अलग गुटों में खूनी संघर्ष शुरू होता है, लेकिन इस भयानक दृश्य के बिना भी तो बात आगे बढ़ाई जा सकती थी.

क्या सिर्फ जेंडर बदलने से बदल जाती है व्यवस्था?
जब आप इस सीरीज को गहराई से देखते हैं, तो इसकी कहानी एक बड़ी निराशाजनक सोच पर टिकी नजर आती है. इसका तर्क यह है कि जब महिलाओं के हाथ में पूरी ताकत आ जाती है, तो वे भी आखिरकार पुरुषों की तरह ही क्रूर और सत्ता के भूखे अंदाज में पेश आने लगती हैं.

यह उन लोगों के लिए जरूर एक झटका हो सकता है जो यह मानते हैं कि सिर्फ महिलाओं के हाथ में कमान आने से ही दुनिया अपने-आप न्यायपूर्ण और बेहतर बन जाएगी. यह सीरीज अपनी महिला शासकों को भी वही पुरानी और पारंपरिक पितृसत्ता वाली भाषा दे देती है. इससे यह साफ झलकता है कि सिर्फ शासक का लिंग (Gender) बदल देने से सामाजिक व्यवस्था के काम करने के तरीके में कोई बदलाव नहीं आता. हमेशा की तरह, कड़वी सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं छिपी है, लेकिन इस गंभीर तर्क पर विचार करना बहुत जरूरी है.

स्क्रीन पर राधिका आप्टे को काफी स्पेस मिला है, लेकिन उनका किरदार काफी जाना-पहचाना और वन-नोटेड सा लगता है, जहां उनकी डायलॉग डिलीवरी में कोई नयापन महसूस नहीं होता. इसके विपरीत, पारंपरिक साड़ियों और भारी गहनों में सजी कीर्ति सुरेश बेहद दमदार, असरदार और स्क्रीन पर छा जाने वाली नजर आती हैं. 'अक्का' के रूप में उन्होंने अकेले अपने दम पर पूरे शो को संभाला है. वह इतनी अट्रैक्टिव लगी हैं कि उनसे अपनी नजरें हटाना मुश्किल हो जाता है.

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काश! बाकी चीजें भी इतनी ही कसी हुई होती. पिता-पुत्र वाले पुराने गैंगस्टर ड्रामे की जगह बस 'पितृसत्ता' की जगह 'मातृसत्ता' बिठा दी गई है. मुझे इसकी राइटिंग से सबसे ज्यादा शिकायत है- आखिर इतनी गहरी महिलाओं की कहानी को एक पुरुष ने जो लिखा है. मेरी उन्हें बस इतनी सी सलाह होगी कि औरतों के हाथों में बंदूक थमा देने से कहीं ज्यादा असरदार उनके अपने विचार और उनका विजन होता है. बाकी आप खुद समझदार हैं.

तारीफ करनी होगी इस सीरीज के कलाकारों और कॉस्ट्यूम डिजाइनरों की, जिन्होंने अपनी मेहनत से किरदारों को एक अलग पहचान दी और पेरनुरु की इस काल्पनिक दुनिया को हमारे सामने पेश किया. लेकिन फिर भी, इतने शानदार कॉस्ट्यूम, भव्य सेटअप और बेहतरीन कॉन्सेप्ट के बावजूद 'अक्का' आखिर में एक साधारण सा रिवेंज ड्रामा बनकर ही रह जाती है.

फिर भी, मेरी उम्मीदें इसके दूसरे सीजन को लेकर अभी भी जिंदा हैं- शायद अगली बार मेकर्स कुछ बेहतर सुधार करें और इन कमियों को खूबसूरती से भर सकें.

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