मेट्रो सिटीज़ में डिलीवरी बॉय या राइडर की जॉब बहुत सारे लोग करते हैं. दिनभर इधर से उधर बाइक दौड़ाना, समय पर ऑर्डर पहुंचाना. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस भागदौड़ के बाद उनकी जेब में क्या बचता है. क्या ये कमाई प्रति ऑर्डर के हिसाब से होती है, आखिर कमीशन कितना कटता है?
हमने जेप्टो, ब्लिंकिट, रैपिडो, उबर जैसे प्लेटफॉर्म पर डिटेल्स पढ़ीं और उनके पेआउट सिस्टम को देखना चाहा. वेबसाइट्स पर मौजूद डिटेल्स के मुताबिक, डिलीवरी का काम करके अगर कोई राइडर रोजाना ₹1,500 की ग्रॉस कमाई करता है, तो उसके हाथ में आखिर में लगभग ₹1,000 से ₹1150 ही बचते हैं. अब ये भी अलग-अलग शहर, राज्य, बाइक, दिन के हिसाब से निर्भर करता है.
क्योंकि किसी भी ग्रॉस कमाई से पेट्रोल, ऑनबोर्डिंग या किट की कटौती और वाहन मेंटेनेंस जैसे खर्च निकलते हैं.
किस हिसाब से होती है बचत?
एक उदाहरण के तौर पर ₹1500 रोजाना कमाने के लिए करीब 100 से 130 किलोमीटर गाड़ी चलानी पड़ सकती है. इसी गणित में शुद्ध बचत ₹1070 से ₹1200 बताई गई है, यानी रोजाना करीब ₹1100 के आसपास बचत. अगर किसी को ₹1,500 रोजाना इन-हैंड बचाना है, तो उसे ₹2,000 से ₹2,100 ग्रॉस कमाई का लक्ष्य रखना होगा.
₹1,500 की कमाई में सबसे बड़ा खर्च पेट्रोल या ईंधन का है. इसका अनुमान ₹250 से ₹350 रोजाना बताया गया है. बाइक के माइलेज के हिसाब से रोजाना 100+ किमी चलने पर 2.5 से 3.5 लीटर पेट्रोल लगेगा.
इसके अलावा ऑनबोर्डिंग या किट इंस्टॉलमेंट पर ₹30 से ₹50 रोजाना तक की कटौती मानी गई है. स्विगी और जेप्टो जैसे ऐप जॉइनिंग, ट्रेनिंग या बैग की फीस शुरुआती हफ्तों में पेआउट से काटते हैं. वाहन मेंटेनेंस और दूसरे खर्च भी ₹30 से ₹50 रोजाना तक माने गए हैं, जिसमें इंजन ऑयल, पंक्चर, ब्रेक शू और वियर-एंड-टियर शामिल हैं.
इसी आधार पर ₹1,500 कमाने पर शुद्ध बचत ₹1,070 से ₹1,190 रहती है. नोट में यह भी कहा गया है कि अगर कोई ईवी इस्तेमाल करता है, तो पेट्रोल का खर्च घटकर ₹80-₹120 रह जाएगा और हाथ में ₹1,300 तक बच सकते हैं.
कहीं हर हफ्ते तो कहीं 15 दिन में पेमेंट
कंपनियों के पेआउट और कटौती के नियम भी अलग-अलग बताए गए हैं. स्विगी में पेआउट साप्ताहिक होता है और हर हफ्ते सीधे बैंक खाते में जाता है. स्विगी में जॉइनिंग या ऑनबोर्डिंग फीस लगभग ₹1,500 बताई गई है, जो शहर के अनुसार अलग हो सकती है. यह फीस कंपनी साप्ताहिक पेआउट से किस्तों में काटती है. जेप्टो में पेआउट साप्ताहिक या तय अवधि के आधार पर होता है.
जेप्टो में ऑनबोर्डिंग, ट्रेनिंग और ब्रांडेड मर्चेंडाइज जैसे टी-शर्ट या बैग की फीस पेआउट से एक या अधिक किस्तों में काटी जा सकती है. अगर ऑर्डर रास्ते में गुम या चोरी हो जाता है, या राइडर की लापरवाही से डैमेज हो जाता है, तो उसकी भरपाई पेआउट से की जाएगी या उस ऑर्डर का सर्विस फी नहीं मिलेगा. गलत ऑर्डर डिलीवर होने पर डिलीवरी फीस भी रोकी जा सकती है.
रैपिडो में कर्नाटक और पैन-इंडिया पार्सल सेवा के लिए राइडर, यानी कैप्टन, सीधे ग्राहक से किराया लेते हैं. दूसरे राज्यों में कैश कलेक्शन के दौरान कंपनी अपनी कन्वीनियंस फी राइडर के फाइनल सेटलमेंट से एडजस्ट या कटौती करती है. प्लेटफॉर्म एक्सेस के लिए सब्सक्रिप्शन फीस भी काटी जा सकती है. स्नैबिट में एक्सपर्ट्स या वर्कर्स को ऐप के जरिए सीधे पेमेंट ट्रांसफर होती है, जिसमें कंपनी टेक्नोलॉजी फीस, सर्ज फीस या कन्वीनियंस फीस एडजस्ट करती है.
कुल मिलाकर दिए गए आंकड़े यही बताते हैं कि ₹1,500 की रोजाना ग्रॉस कमाई का पूरा पैसा हाथ में नहीं बचता. ईंधन, किट, ऑनबोर्डिंग, मेंटेनेंस और कंपनी के नियमों के बाद बचत करीब ₹1,100 के आसपास रहती है. अगर लक्ष्य ₹1,500 रोजाना इन-हैंड बचाने का है, तो रोजाना ₹2,000 से ₹2,100 ग्रॉस कमाई करनी होगी.