NEET-UG 2026 की परीक्षा लीक से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच के समक्ष इस परीक्षा को आयोजित कराने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) पर सवाल खड़ा किया है. याचिकाकर्ता का कहना है कि कोर्ट भारत सरकार को निर्देश दे कि NTA को बदला जाए या पूरी तरह नया और ज्यादा सुरक्षित सिस्टम बनाया जाए.
स्वतंत्र तरीके से करें काम
नई संस्था ऐसी हो जो तकनीकी रूप से मजबूत, ज्यादा सुरक्षित और स्वतंत्र तरीके से काम करने वाली हो. SG तुषार मेहता ने कोर्ट को परीक्षा सिस्टम को समझाते हुए बताया कि सिस्टम फुलप्रूफ है लेकिन कुछ जगहों पर इंसानी दखल भी है. फिजिक्स का एक पेपर 100 मार्क्स का चाहिए तो कई मॉडरेटर से 500 सवालों का क्वेश्चन बैंक बनाने को कहा जाता है. मॉडरेटर का दूसरा सेट 100-100 सवाल चुनता है और 4 क्वेश्चन पेपर बनाता है.
इसके बाद 4 क्वेश्चन पेपर में से DG NTA सिर्फ 2 क्वेश्चन पेपर चुनता है. तब तक किसी को नहीं पता होता कि कौन सा आखिरी क्वेश्चन पेपर होगा फिर यह एक सीलबंद बॉक्स में दो अलग-अलग प्रिंटर के पास जाता है. प्रिंटर में CCTV और CISF सर्विलांस होता है. वह व्यक्ति एक बॉक्स में डिजिटल चाबी लेकर जाता है. जब वह वहां पहुंचता है तो प्रिंटिंग प्रेस का मालिक DG NTA को कॉल करेगा पेपर पहुंच गया है. फिर कोड शेयर किया जाता है और उसे खोला जाता है.
प्रिंटिंस प्रेस में नहीं होती है जाने की इजाजत
एक बार सीलबंद बॉक्स खुलने के बाद किसी बाहरी व्यक्ति को प्रिंटिंग प्रेस में घुसने की भी इजाजत नहीं है. यह सब वीडियो रिकॉर्ड किया जाता है. नियम यह है कि हर क्लासरूम में 24 स्टूडेंट होंगे. OMR के साथ क्वेश्चन पेपर एक सीलबंद लिफाफे में बंद है, लिफाफा खोलने के लिए सील तोड़नी होगी. प्रिंटर को भी नहीं पता कि वह किस एग्जाम के लिए पेपर प्रिंट कर रहा है. उसे नहीं पता कि पेपर किस एग्जाम के हैं.
हर सेंटर पर भेजे जाते हैं पैक्ड क्वेश्चन
SG तुषार मेहता ने कोर्ट को आगे बताया कि हर एग्जाम सेंटर को पैक्ड क्वेश्चन पेपर भेजे जाते हैं. उन्हें एक लोहे के बॉक्स में पैक किया जाता है जिसमें एक नॉन-ओपनेबल लॉक होता है. इसे सिर्फ तोड़ा जा सकता है. इसमें कोई चाबी या कोई डिजिटल नंबर नहीं होता है, जिस गाड़ी में क्वेश्चन पेपर होते हैं, वह GPS ट्रैक्ड होती है. दो अलग-अलग बॉक्स में क्वेश्चन पेपर के दो सेट होते हैं. बॉक्स बैंकों के स्ट्रांग रूम में रखे जाते हैं. आमतौर पर यह SBI या केनरा बैंक होता है.
कितने दिन पहले पहुंचता है पेपर
मान लीजिए कि अगर एग्जाम 1 फरवरी को हैं, तो सुबह सिटी कोऑर्डिनेटर को DG बताते हैं कि कौन सा पेपर सेट इस्तेमाल करना है. वह DM और दूसरे अधिकारियों के साथ एक संपर्क में रहते हैं. हर चीज की वीडियोग्राफी होती है. इसके बाद पैकेट हर क्लास कोऑर्डिनेटर को दिए जाते हैं. सभी स्टूडेंट्स को सील खोलनी होती है.कोर्ट ने SG से पूछा कि आपने जो हमें बताया है, वह पहले से ही राधाकृष्णन कमेटी के दायरे में है. उसने सही कहा है कि यह एक सिस्टमिक प्रॉब्लम है जिसे इंस्टीट्यूशनलाइजेशन करने की जरूरत है. इसीलिए ये ऐसे मामले हैं जिन्हें इंस्टीट्यूशनलाइजेशन की जरूरत है.
कैसे होगा इंस्टीट्यूशनलाइज?
SG तुषार मेहता ने कहा कि राधाकृष्णन कमेटी की सिफारिशें सरकार ने मान ली हैं. इसपर कोर्ट ने कहा कि हमारी चिंता यह है कि आप परीक्षा को कैसे इंस्टीट्यूशनलाइज करेंगे. सुरक्षित ऑफिस, कॉन्फिडेंशियल ऑपरेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर, साइबर सिक्योरिटी, टेस्टिंग सेंटर, सेंट्रल नेटवर्क ऑपरेटर का काम किस तरह से किया जाएगा?
इनमें से हर एक के लिए राधाकृष्णन कमिटी ने कहा कि आपको यह इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की जरूरत है. जिस तरीके से आप पेपर्स की सीलिंग करते हैं, उसे एक परमानेंट कमिटी को करना होगा, कितने DGs, ADGs नियुक्त किए गए हैं? यह हम रेगुलर एफिडेविट के जरिए हम जानना चाहते हैं.
असल में जो करने की जरूरत है वह है इंस्टीट्यूशनल मेमोरी, इंस्टीट्यूशनल एक्सपर्टीज. हमें बस यह देखना है कि क्या यह सेटअप हो गया है... आपके पास R&D इंफ्रास्ट्रक्चर होना चाहिए. हर परीक्षा सिस्टम बदलता है, टेक्नोलॉजी बदलती है. आप कौन सा सॉफ्टवेयर बना रहे हैं? एक स्वतंत्र डेटाबेस होना चाहिए. स्टोरेज का क्या? इंफ्रास्ट्रक्चर होना चाहिए. जहां तक सिक्योरिटी की बात है, आपको डायरेक्टर रैंक का ऑफिसर चाहिए. तब आपको पता चलेगा कि क्या दिक्कतें हैं. एक वाइब्रेंट सिस्टम और इंस्टीट्यूशनलाइजेशन करने की जरूरत है.