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प्रियंका गांधी के 'गोमूत्र एक्सपर्ट' वाले बयान का विरोध, 200 से ज्यादा शिक्षाविदों ने लिखी चिट्ठी

कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा द्वारा IIT मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामाकोटि को 'गोमूत्र एक्सपर्ट' कहे जाने पर देश के 215 से अधिक वर्तमान और पूर्व कुलपतियों तथा वरिष्ठ शिक्षाविदों ने एक ओपेन लेटर के माध्यम से कड़ी नाराजगी जताई है. उन्होंने कहा कि किसी विद्वान को तंज या उपहास का पात्र बनाना वैज्ञानिक दृष्टिकोण के खिलाफ है.

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प्रो कामाकोटी को लेकर प्र‍ियंका गांधी के 'गोमूत्र एक्सपर्ट' बयान पर नाराज हैं श‍िक्षाव‍िद. (Photo: PTI/IIT Madras)
प्रो कामाकोटी को लेकर प्र‍ियंका गांधी के 'गोमूत्र एक्सपर्ट' बयान पर नाराज हैं श‍िक्षाव‍िद. (Photo: PTI/IIT Madras)

कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा द्वारा आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामाकोटी को कथित तौर पर 'गोमूत्र एक्सपर्ट' कहे जाने पर देश का शिक्षा और वैज्ञानिक जगत भड़क गया है. देश भर के 215 से अधिक वर्तमान व पूर्व कुलपतियों और वरिष्ठ शिक्षाविदों ने प्रियंका गांधी को एक ओपेन लेटर लिखकर उनके इस बयान पर गहरी नाराजगी और निराशा जताई है.

30 जुलाई 2026 की तारीख से जारी इस खुले पत्र में शिक्षाविदों ने कहा कि किसी विद्वान को उनके विचारों पर बहस करने के बजाय एक 'ओछा टैग' या लेबल देकर खारिज कर देना, हमारे संविधान द्वारा दिए गए वैज्ञानिक दृष्टिकोण की मूल भावना पर हमला है.  

IIT मद्रास के निदेशक के योगदान को याद दिलाया
चिट्ठी में शिक्षाविदों ने प्रोफेसर कामाकोटी के अकादमिक और वैज्ञानिक योगदान का ब्योरा देते हुए लिखा कि वे देश के शीर्ष तकनीकी दिमागों में से एक हैं.

प्रोफेसर कामाकोटी के पास आईआईटी मद्रास से कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग में एमएस और पीएचडी की डिग्रियां हैं.  
वे 150 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित कर चुके हैं और 50 से अधिक आरएंडडी (R&D) परियोजनाओं से जुड़े रहे हैं.  
भारत के पहले इंडस्ट्री-ग्रेड माइक्रोप्रोसेसर को तैयार करने में उनकी अहम भूमिका रही है.  
उन्हें डीआरडीओ (DRDO) एकेडमिक एक्सीलेंस अवॉर्ड समेत कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है.  

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पढ़ें पूरा लेटर 

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मजाक उड़ाना तर्कसंगत बहस का विकल्प नहीं

चिट्ठी में कड़े शब्दों में लिखा गया है कि चाहे यह बयान तंज के रूप में दिया गया हो या राजनीतिक बयानबाजी में, लेकिन ये बेहद चिंताजनक है.  शिक्षाविदों ने पत्र में लिखा कि संसद से यह उम्मीद की जाती है कि वहां विचारों पर गंभीरता से बहस हो और मतभेदों को गरिमा के साथ व्यक्त किया जाए. लोकतंत्र में असहमति होना अनिवार्य है, लेकिन किसी का मजाक उड़ाना तर्कसंगत जुड़ाव या स्वस्थ बहस का विकल्प नहीं हो सकता.

खुले पत्र में यह भी कहा गया है कि राजनीतिक प्रतिनिधियों के ऐसे बयानों से देश के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के बीच एक गलत संदेश जाता है. हमारे वैज्ञानिकों को यह भरोसा होना चाहिए कि वे बिना किसी राजनीतिक उपहास या टैग किए जाने के डर के, सार्वजनिक बहसों में भाग ले सकते हैं.

पत्र में तंज कसते हुए कहा गया कि उनके तर्कों की आलोचना कीजिए, उनके सबूतों को चुनौती दीजिए और उनसे और बेहतर सबूत मांगिए, लेकिन इस तरह किसी विद्वान की विद्वता को छोटा मत कीजिए. जब जटिल वैज्ञानिक विषय राजनीति के उपहास का कारण बनते हैं, तो समाज एक जागरूक और गंभीर बहस का मौका खो देता है.  

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इन दिग्गजों के नेतृत्व में भेजी गई चिट्ठीइस विरोध पत्र के समन्वयकों में आईसीटी मुंबई के पूर्व कुलपति प्रो. जी.डी. यादव और एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज की महासचिव प्रो. पंकज मित्तल शामिल हैं. इनके साथ ही देश भर के 215 से ज्यादा विश्वविद्यालयों के मौजूदा व पूर्व कुलपतियों ने इस पत्र पर अपने हस्ताक्षर किए हैं.  

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