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कमाल ही हो गया! जानवरों की खाल नहीं, DU के छात्रों ने केले के छिलके से बना दिया लेदर

जिस केले के छिलके को आप कचरा समझकर फेंक देते हैं, उससे तैयार हो रहा है असली जैसा मजबूत और टिकाऊ लेदर! DU के छात्रों ने 1 साल की कड़ी मेहनत के बाद बनाया इको-फ्रेंडली विकल्प. जानिए कैसे कचरा बन रहा है पर्यावरण का रक्षक?

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अब केले के छिलके से बनेगा असली जैसा लेदर, जानिए कैसे हुआ यह चमत्कार (Photo:AI)
अब केले के छिलके से बनेगा असली जैसा लेदर, जानिए कैसे हुआ यह चमत्कार (Photo:AI)

हमारे पहनावे में, रोजमर्रा की चीजें जैसे वॉलेट बैग में लेदर हमेशा से शामिल था और शामिल है. वक्त के साथ लेदर के उपयोग बदलते गए… लेकिन हम सब जानते हैं कि लेदर जानवरों की स्किन यानी खाल से तैयार किया जाता है. लेकिन अब दिल्ली यूनिवर्स‍िटी के रामजस कॉलेज के छात्रों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे फलों के बेकार हिस्सों से प्लांट-बेस्ड लेदर तैयार किया जा रहा है. 

यह न सिर्फ जानवरों की खाल का विकल्प बन सकता है, बल्कि खाद्य अपशिष्ट और प्रदूषण की समस्या का भी समाधान पेश कर रहा है. केले के छिलके जिन्हें अब तक कूड़ा समझकर फेंक दिया जाता था, वही अब पर्यावरण के लिए उम्मीद की नई मिसाल बन रहा है. दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज के छात्रों ने केले के कचरे से प्लांट-बेस्ड लेदर तैयार किया है . इसका उद्देश्य ऐसा टिकाऊ और इको-फ्रेंडली विकल्प तैयार करना है, जो पशुओं की खाल से बनने वाले पारंपरिक लेदर पर निर्भरता कम कर सके.

कैसे पड़ा अलग नाम

इसे बनाने में में छात्रों को एक साल का लंबा वक्त लगा है. छात्रों ने इसे ‘सहर’ नाम दिया है. छात्र बताते हैं कि ये खोजना कि कौन से फल के छिलके लेदर की तरह टिकाऊ हो सकते हैं, ये सबसे मुश्किल काम था. हमने कई फल ट्राई किए उनका प्रोटोटाइप बनाया. हमने संतरा, आम, पाइनएप्पल, नारियल जैसे कई फल के छिलके ट्राई किए. कुछ से तैयार हुआ लेदर बहुत मुलायम था कुछ से तैयार हुआ बहुत सख़्त.. कई बार फेल होने के बाद हम यहां तक पहुंचे. 

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इस प्रोजेक्ट में शाम‍िल छात्रों ने बताया कि कई बार फेल होने के बावजूद हमने हार नहीं मानी. हमे ऐसा फल चाहिए था जिसके छिलके से लेदर जैसी मोटी लेयर तैयार हो सके और लंबे वक्त तक टिकाऊ भी रहे. हमने अलग अलग प्रोफेसर से बात की उन्होंने हमें गाइड किया और फाईनली हम केले के छिलके से मनचाहा लेदर बना पाए. 

काफी हद तक असली लेदर जैसा है ये 

इस लेदर को बनाने के लिए फलों के बचे हुए हिस्सों को प्रोसेस कर प्राकृतिक बाइंडिंग तकनीक से एक मजबूत और लचीली शीट में बदला जाता है. तैयार सामग्री दिखने और महसूस होने में काफी हद तक असली लेदर जैसी होती है. इससे बैग, वॉलेट, डायरी कवर, फैशन एक्सेसरीज़ और अन्य कई उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं. फ़िलहाल ये छात्र जैकेट और जूते जैसे बड़े प्रोडक्ट पर फ़ोकस न करके छोटे प्रोडक्ट पर फ़ोकस कर रहे हैं.

फलों के कचरे से प्लांट-बेस्ड लेदर तैयार करने की यह पहल युवाओं की इनोवेशन क्षमता और पर्यावरण के प्रति उनकी सोच को नई पहचान दे रही है. कचरे को संसाधन में बदलने की यह सोच बताती है कि भविष्य की तकनीक सिर्फ आधुनिक नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार भी होगी.

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