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जितनी सिक्योर‍िटी में देश का बजट बनता है, वैसे ही NEET का पेपर क्यों नहीं? NTA भी अपनाए ये प्रोसेस

NEET पेपर लीक की घटनाएं देश के सबसे बड़े परीक्षा घोटालों में से एक बन चुकी हैं. जबकि देश का केंद्रीय बजट पांच महीने की कड़ी सुरक्षा प्रक्रिया से गुजरता है, NEET परीक्षा पेपर को लेकर विशेषज्ञों का सुझाव है कि NEET परीक्षा के लिए बजट मॉडल की तरह एक कड़ा लॉक-इन सिस्टम और इन-हाउस प्रिंटिंग जोन बनाया जाए, जिससे पेपर की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके.

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नॉर्थ ब्लॉक की कड़ी स‍िक्योर‍िटी में बनता है बजट
नॉर्थ ब्लॉक की कड़ी स‍िक्योर‍िटी में बनता है बजट

नीट (NEET-UG 2026) पेपर लीक अब देश के इतिहास का सबसे शर्मनाक अध्याय बन चुका है. रोज नए खुलासे हो रहे हैं. इस पूरे तमाशे के बीच आज देश का हर छात्र और हर अभिभावक नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) से एक बुनियादी सवाल पूछ रहा है कि आप इतनी बड़ी परीक्षा की सुरक्षा क्यों नहीं कर पा रहे. ये भी कहा जा रहा है कि कभी'केंद्रीय बजट' आज तक लीक नहीं हुआ पर 22 लाख बच्चों का भव‍िष्य तय करने वाला नीट का पेपर कौड़ियों के भाव कैसे बिक गया? आइए PIB और वित्त मंत्रालय के हवाले से समझते हैं कि आखिर बजट कितने दिनों में तैयार होता है और इसे लीक होने से बचाने के लिए किस स्तर की सुरक्षा प्रणाली अपनाई जाती है.

टाइमलाइन: करीब 5 महीने चलती है बजट बनाने की प्रक्रिया
वित्त मंत्रालय के आधिकारिक गाइडलाइंस के मुताबिक, बजट बनाने की प्रक्रिया एक या दो दिन नहीं, बल्कि पूरे 5 महीने (लगभग 150 दिन) पहले शुरू हो जाती है.

अगस्त (शुरुआत): वित्त मंत्रालय का बजट डिवीजन अगस्त के आखिरी हफ्ते में सभी मंत्रालयों, राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और स्वायत्त निकायों को एक 'बजट सर्कुलर' जारी करता है.

सितंबर-अक्टूबर: सभी विभाग अपने खर्चों और कमाई का अनुमानित ब्योरा (Statement of Budget Estimates) तैयार कर वित्त मंत्रालय को सौंपते हैं.

अक्टूबर-नवंबर: वित्त मंत्रालय के अधिकारी अलग-अलग मंत्रालयों के साथ 'प्री-बजट बैठकें' करते हैं कि किसे कितना पैसा मिलना चाहिए.

दिसंबर-जनवरी: वित्त मंत्री देश के बड़े उद्योगपतियों, अर्थशास्त्रियों, किसान संगठनों और चैंबर्स ऑफ कॉमर्स के साथ बैठकें करके उनके सुझाव लेते हैं. इसके बाद बजट को फाइनल टच दिया जाता है.

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सुरक्षा चक्र: कैसे बचाया जाता है लीक होने से? 

बजट का ड्राफ्ट तैयार होने के बाद आखिरी के 7 से 10 दिन सबसे महत्वपूर्ण होते हैं. इस दौरान दिल्ली का 'नॉर्थ ब्लॉक' (वित्त मंत्रालय का मुख्यालय) एक ऐसे किले में तब्दील हो जाता है, जिसकी सुरक्षा व्यवस्था देखकर अच्छे-अच्छे जासूसों के पसीने छूट जाएं.

ऐतिहासिक 'हलवा सेरेमनी' और 'लॉक-इन' पीरियड: बजट पेश होने से करीब एक हफ्ता पहले नॉर्थ ब्लॉक के बेसमेंट में स्थित 'बजट प्रेस' में हलवा सेरेमनी का आयोजन किया जाता है, जिसमें खुद वित्त मंत्री शामिल होते हैं. यह सेरेमनी केवल एक रस्म नहीं, बल्कि 'लॉक-इन पीरियड' (पूर्ण अलगाव) की शुरुआत का आधिकारिक सिग्नल है. इसके खत्म होते ही बजट बनाने और छापने की प्रक्रिया से जुड़े करीब 100 से ज्यादा अधिकारी और स्टाफ बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट जाते हैं.

दुनिया से पूरी तरह 'डिसकनेक्ट': इस लॉक-इन पीरियड के दौरान बेसमेंट में रहने वाले किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को मोबाइल फोन, इंटरनेट या कंप्यूटर का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं होती. वहां के कंप्यूटर नेटवर्क पूरी तरह 'एयर-गैप्ड' होते हैं, यानी उनका बाहरी इंटरनेट से कोई लिंक नहीं होता ताकि कोई साइबर हैकिंग न हो सके.

आईबी और सीआईएसएफ का कड़ा पहरा: वित्त मंत्रालय की सुरक्षा के लिए सीआईएसएफ (CISF) के जवान तैनात होते हैं, लेकिन बजट के आखिरी दिनों में इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के जासूस सादे कपड़ों में पूरे कॉरिडोर में तैनात रहते हैं. हर आने-जाने वाले पर नजर रखी जाती है. बजट पेश होने के दो हफ्ते पहले से ही मंत्रालय में बाहरी लोगों या मीडिया के प्रवेश और विजिटर अपॉइंटमेंट्स पर पूरी तरह रोक लगा दी जाती है. संयुक्त सचिव स्तर से नीचे के अधिकारियों का आना-जाना भी सीमित हो जाता है.

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मेडिकल इमरजेंसी में भी बाहर जाने पर पाबंदी: इस दौरान बेसमेंट में बंद अधिकारियों या कर्मचारियों को रात-दिन वहीं रुकना, खाना और सोना पड़ता है. नियमों की कड़ाई का आलम यह है कि यदि किसी को कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या हो जाए, तो उन्हें बाहर अस्पताल नहीं भेजा जाता; बल्कि डॉक्टरों की एक विशेष टीम अंदर आकर ही उनका इलाज करती है. कर्मचारी अपने परिवार तक से बात नहीं कर सकते.

सिर्फ 24 घंटे पहले फाइनल प्रिंटिंग और डिजिटल लॉकिंग: वित्त मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री की अंतिम मंजूरी मिलने के बाद, संसद में बजट पेश होने के ठीक 24 घंटे पहले बजट डॉक्यूमेंट्स की फाइनल प्रिंटिंग या डिजिटल कंपाइलेशन किया जाता है. अब चूंकि बजट पूरी तरह 'पेपरलेस' (डिजिटल) हो चुका है, इसलिए इसकी कॉपियां बेहद सीमित होती हैं, जो सुरक्षित सॉफ्टवेयर और पासवर्ड प्रोटेक्टेड टैबलेट्स में सील रहती हैं. यह पासवर्ड भी तब खुलता है जब वित्त मंत्री संसद में अपना भाषण शुरू करती हैं.

 NEET के पेपर के साथ कहां हो रही है लापरवाही?

अब जरा इसकी तुलना एनटीए (NTA) की लचर परीक्षा प्रणाली से कीजिए. नीट का पेपर बनाने के लिए प्रोफेसर्स को गुप्त रूप से चुना तो जाता है, लेकिन वे अपने घरों या होटलों में बैठकर सवाल सेट करते हैं. इसके बाद पेपर को पेनड्राइव या ईमेल के जरिए ट्रांसफर किया जाता है (जहां साइबर हैकिंग का खतरा होता है).

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सबसे कमजोर कड़ी तब आती है जब पेपर को प्रिंटिंग प्रेस में भेजा जाता है. देश में सरकारी सिक्योरिटी प्रेस होने के बावजूद कई बार प्राइवेट प्रिंटिंग प्रेसों को ठेके दे दिए जाते हैं, जहां से चंद रुपयों के लालच में बिचौलिये और कोचिंग माफिया पूरा खेल कर देते हैं. लातूर के कोचिंग किंग शिवराज मोटेगांवकर के अरेस्ट मेमो से साफ हुआ है कि परीक्षा से 10 दिन पहले ही पेपर लीक हो गया था, जो दिखाता है कि प्रिंटिंग या लॉजिस्टिक्स के स्तर पर सुरक्षा ज़ीरो थी.

विशेषज्ञों की राय: 'NEET के लिए भी बने एक सीक्रेट प्रिंटिंग और सीलिंग ज़ोन'
देश के बड़े शिक्षाविदों और पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि अब समय आ गया है जब एनटीए या प्रस्तावित नई नेशनल एग्जामिनेशन अथॉरिटी को 'बजट मॉडल' पर काम करना होगा.

सीक्रेट 'एग्जामिनेशन बेसमेंट': पेपर सेट करने वाले प्रोफेसर्स और एक्सपर्ट्स को परीक्षा से 20 दिन पहले एक हाई-सिक्योरिटी ज़ोन में बंद कर दिया जाए, जहां जैमर्स लगे हों और बाहरी दुनिया से संपर्क का कोई साधन न हो.

इन-हाउस प्रिंटिंग: पेपर को किसी भी बाहरी या प्राइवेट प्रिंटिंग प्रेस में न भेजा जाए. उसी सीक्रेट ज़ोन के भीतर ही अत्याधुनिक प्रिंटिंग मशीनें हों, जहां पेपर छपने के तुरंत बाद डिजिटल रूप से लॉक किए गए बक्सों में सील हो जाएं.

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लास्ट-माइन जीपीएस ट्रैकिंग: इन बक्सों को देश भर के परीक्षा केंद्रों तक कड़ी सैन्य सुरक्षा या आईबी की निगरानी में भेजा जाए, जिसमें जीपीएस ट्रैकिंग और बायोमेट्रिक लॉकिंग हो, जो सिर्फ परीक्षा के दिन सुबह ठीक 9 बजे ही खुले.

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