दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव 2026-27 के नतीजों को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ रहे कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI को बड़ा झटका लगा है. दिल्ली हाईकोर्ट ने NSUI के अध्यक्ष पद उम्मीदवार विजय शंकर मीणा की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने चुनाव परिणाम को रद्द करने और दोबारा चुनाव कराने की मांग की थी. हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को यह राहत दी है कि वे अपनी शिकायतों को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन की आधिकारिक ग्रीवेंस रेड्रेसल कमेटी (शिकायत निवारण समिति) का दरवाजा खटखटा सकते हैं.
याचिका में लगाए थे गंभीर आरोप
NSUI उम्मीदवार विजय शंकर मीणा ने अपनी याचिका में डूसू चुनाव 2026-27 की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे. उन्होंने आरोप लगाया था कि कई कॉलेजों (जैसे स्वामी श्रद्धानंद, रामजस और शिवाजी कॉलेज) में बड़े पैमाने पर फर्जी और जबरन वोटिंग कराई गई. कुछ जगहों पर छात्रों के आईडी कार्ड जब्त कर उन पर दबाव बनाया गया.
यही नहीं उनका आरोप है कि यूनिवर्सिटी के चुनाव अधिकारियों का रवैया पक्षपातपूर्ण रहा और मतदान प्रतिशत (वोटर टर्नआउट) के आंकड़ों में भी भारी गड़बड़ी देखने को मिली. इन आरोपों के आधार पर उन्होंने चुनाव परिणाम को निरस्त करने की मांग की थी.
हाईकोर्ट का रुख: संस्थागत प्रक्रिया का पालन जरूरी
मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनाव संबंधी शिकायतों के लिए विश्वविद्यालय के पास पहले से ही एक तय व्यवस्था और शिकायत कमेटी मौजूद है. याचिकाकर्ता को सीधे अदालत का रुख करने के बजाय पहले उस फोरम के सामने अपने तथ्य और साक्ष्य रखने चाहिए थे. इसी टिप्पणी के साथ कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए मामले को विश्वविद्यालय की कमेटी के सुपुर्द कर दिया.
क्या रहे थे DUSU चुनाव 2026-27 के नतीजे?
हाल ही में संपन्न हुए डूसू चुनाव में मुख्य रूप से छात्र संगठन ABVP का दबदबा रहा था. अध्यक्ष पद पर ABVP के यश डबास ने 24,576 वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी. उन्होंने निकटतम प्रतिद्वंद्वी NSUI के विजय शंकर मीणा 22,523 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे. दोनों के बीच जीत का अंतर लगभग 2,053 वोटों का रहा.
हार के तुरंत बाद NSUI ने मतगणना और चुनावी निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कोर्ट जाने का ऐलान किया था, जिसके तहत यह याचिका दाखिल की गई थी.
अब आगे क्या?
हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब NSUI उम्मीदवार विजय शंकर मीणा को अपने साक्ष्यों और शिकायतों का पुलिंदा विश्वविद्यालय की शिकायत निवारण समिति को सौंपना होगा. यदि समिति के फैसले से भी प्रत्याशी संतुष्ट नहीं होते हैं, तो वे दोबारा कानूनी विकल्प तलाश सकते हैं.