
महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में आदिवासी विद्यार्थियों की शिक्षा और सुरक्षा को लेकर सरकारी दावों की पोल खोलती तस्वीर सामने आई है. जिले की सरकारी और अनुदानित आश्रमशालाओं में हजारों आदिवासी विद्यार्थी आज भी जमीन पर गद्दे और चटाई बिछाकर सोने को मजबूर हैं.
कहीं टीन शेड में पढ़ाई और रात में उसी जगह पर नींद, तो कहीं एक छोटे से कमरे में 45 छात्राओं का रहना. हालात इतने चिंताजनक हैं कि सांप और बिच्छू के डर से छात्राएं दरवाजों की दरारों में कपड़े ठूंसकर अपनी सुरक्षा करने को मजबूर हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब इन आश्रमशालाओं पर हर साल करीब 99 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, तो आदिवासी विद्यार्थियों को सुरक्षित छत, पर्याप्त आवास और सोने के लिए एक साधारण पलंग तक क्यों नहीं मिल पा रहा है?

चंद्रपुर जिले में सरकारी और निजी अनुदानित कुल 32 आश्रमशालाएं हैं. इनमें करीब 8,786 विद्यार्थी पढ़ते हैं. चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 8,442 विद्यार्थियों के लिए पलंग तक उपलब्ध नहीं हैं. सिर्फ 344 विद्यार्थियों को ही पलंग की सुविधा मिल रही है. बाकी विद्यार्थियों को जमीन पर गद्दे या चटाई बिछाकर रात गुजारनी पड़ रही है. अनुदानित 24 आश्रमशालाओं में कुल 6,672 विद्यार्थी हैं, जिनमें से 6,552 विद्यार्थी जमीन पर सोने को मजबूर हैं. वहीं आठ सरकारी आश्रमशालाओं में कुल 2,114 विद्यार्थी हैं और इनमें से करीब 1,890 विद्यार्थियों के पास पलंग नहीं हैं.

aajtak.in की टीम जब बोर्डा गांव के सरकारी आश्रमशाला में गई तो वह चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई, टीम ने चंद्रपुर की सरकारी आदिवासी आश्रमशाला, बोर्डा पहुंचकर वहां की जमीनी हकीकत का जायजा लिया. यहां पहली से चौथी कक्षा के बच्चे जिस कक्षा में दिन के समय पढ़ाई करते हैं, उसी जगह पर रात में जमीन पर गद्दे बिछाकर सोते हैं. ये कक्षाएं टीन शेड में संचालित हो रही हैं.

दूसरी तरफ पांचवीं से बारहवीं कक्षा की छात्राओं के लिए भी टीन शेड में बने कमरों में रहने की व्यवस्था है. सबसे चिंताजनक स्थिति एक छोटे से कमरे की है, जहां करीब 45 छात्राएं जमीन पर गद्दे बिछाकर सोती हैं. छात्राओं को डर रहता है कि दरवाजे की दरार से सांप या बिच्छू अंदर आ सकता है.
इसी डर के कारण वे रात में दरवाजे की दरारों को कपड़े से बंद करती हैं, फिर कही उन्हें नींद आती है, छात्रों ने बताया की छोटे कमरे में 45 बच्चे सोते है इससे परेशानी होती है , करवट भी ठीक से नहीं बदल सकते. यानी जिन बच्चों को सुरक्षित वातावरण में शिक्षा और आवास मिलना चाहिए, वे रात गुजारते समय खुद अपनी सुरक्षा का इंतजाम करने को मजबूर हैं.
45 साल से चल रही आश्रमशाला
1982 से आश्रम स्कूल शुरू है और हालात अब भी जस के तस है , बोर्डा की यह आश्रमशाला वर्ष 1982 से संचालित है. दशकों बीत गए, लेकिन विद्यार्थियों के आवास की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई. हालांकि यहां नई इमारत का निर्माण कार्य शुरू है. लेकिन प्रस्तावित इमारत में केवल 217 छात्राओं के रहने की व्यवस्था बताई गई है, जबकि स्कूल में कुल विद्यार्थी संख्या करीब 470 है. ऐसे में बाकी विद्यार्थियों के आवास का सवाल फिर खड़ा हो जाता है. स्कूल परिसर में कुछ स्थानों पर गंदगी और कचरे का अंबार भी दिखाई देता है. हालांकि विद्यार्थियों ने भोजन, पानी और शिक्षकों की व्यवस्था को लेकर संतोष जताया.
सरकारी आश्रमशालाओं की यह स्थिति है तो अनुदानित आश्रमशालाओं में हालात और गंभीर नजर आते हैं. जिले की कई आश्रमशालाएं जंगल से सटे इलाकों में हैं. कई जगह पक्की इमारत और पर्याप्त छात्रावास नहीं हैं. टीन शेड में बने छात्रावासों में पर्याप्त खिड़कियां तक नहीं हैं. ऐसे में विद्यार्थियों को गर्मी, बारिश, ठंड और जहरीले जीव-जंतुओं के खतरे के बीच रहना पड़ता है.
गडचिरोली जिले की एक आदिवासी आश्रमशाला में सर्पदंश से तीन विद्यार्थियों की मौत की घटना भी सामने आ चुकी है. इसके बावजूद आश्रमशालाओं की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल बने हुए हैं.

पाटण की आश्रमशाला में करीब 343 विद्यार्थी हैं, लेकिन यहां केवल 100 गद्दियां उपलब्ध होने की जानकारी सामने आई है. यानी कई विद्यार्थियों को एक ही गद्दे पर दो से तीन लोगों के साथ सोने की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है. अनुदानित शिवाजी आश्रमशाला, सुब्बई में 466 निवासी विद्यार्थियों के लिए केवल 76 पलंग, जबकि शिवाजी आश्रमशाला, भारी में 375 विद्यार्थियों के लिए महज 50 पलंग उपलब्ध बताए गए हैं. सरकारी आश्रमशाला मरेगांव में 313 विद्यार्थियों के लिए 150 पलंग और मंगी में 188 विद्यार्थियों के लिए केवल 63 पलंग हैं. बोर्डा और देवाडा जैसी जगहों पर उपलब्ध आवासीय क्षमता ही इतनी कम है कि सभी विद्यार्थियों के लिए पलंग लगाना संभव नहीं बताया जा रहा है.
सरकारी नियमों के अनुसार आश्रमशाला को अनुमति देते समय पक्की इमारत और लड़के-लड़कियों के लिए अलग तथा सुसज्जित छात्रावास जैसी बुनियादी सुविधाओं की अपेक्षा की जाती है. छात्रावास में विद्यार्थियों के लिए पलंग जैसी मूलभूत सुविधा भी होनी चाहिए. लेकिन चंद्रपुर जिले की तस्वीर इन दावों और नियमों के बिल्कुल उलट दिखाई देती है. सवाल यह है कि यदि ये सुविधाएं अनिवार्य हैं, तो वर्षों से इन आश्रमशालाओं का संचालन किस आधार पर होता रहा?
कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
बताया जाता है कि आश्रमशालाओं का नियमित निरीक्षण एकात्मिक आदिवासी विकास प्रकल्प कार्यालय के अधिकारियों द्वारा किया जाता है. निरीक्षण रिपोर्ट तैयार होती है और वर्ष में एक बार जिलाबाहरी अधिकारियों द्वारा भी जांच की जाती है. इसके बावजूद दशकों से चल रही बुनियादी सुविधाओं की समस्या का समाधान क्यों नहीं हुआ? यदि निरीक्षण रिपोर्ट में कमियां दर्ज होती थीं, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि रिपोर्ट में सब कुछ ठीक बताया गया, तो जमीनी हकीकत इतनी खराब कैसे है? यही वे सवाल हैं जिनका जवाब प्रशासन को देना होगा.
इन आश्रमशालाओं में विद्यार्थियों की शिक्षा, निवास और अन्य व्यवस्थाओं पर शासन हर साल करोड़ों रुपये खर्च करता है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार विद्यार्थियों पर करीब 26 करोड़ 35 लाख रुपये सालाना खर्च होता है, जबकि शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों के वेतन पर करीब 73 करोड़ 35 लाख 80 हजार रुपये खर्च किए जाते हैं.यानी कुल वार्षिक खर्च करीब 99 करोड़ रुपये के आसपास पहुंचता है.

इसके बावजूद हजारों आदिवासी विद्यार्थियों के पास सोने के लिए पलंग तक नहीं है. यहां सवाल सिर्फ पलंग का नहीं है. सवाल है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद विद्यार्थियों को सुरक्षित और सम्मानजनक आवास क्यों नहीं मिल रहा?
जानकारी के मुताबिक वर्ष 1995 के बाद नई आश्रमशालाओं को मान्यता देना बंद कर दिया गया. वर्तमान में संचालित अधिकांश आश्रमशालाएं तीन से चार दशक पुरानी हैं. यदि अनुमति के समय बुनियादी सुविधाओं की जांच की जाती थी, तो इतने वर्षों के बाद भी इन स्कूलों की स्थिति क्यों नहीं सुधरी? हर साल निरीक्षण और करोड़ों रुपये के खर्च के बावजूद हालात जस के तस रहना पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है.
डायरेक्ट एक्शन का अधिकार मेरे पास नहीं: प्रकल्प अधिकारी
एकात्मिक आदिवासी विकास प्रकल्प के प्रकल्प अधिकारी विकास राचेलवार ने कहा कि अनुदानित आश्रमशालाओं पर सीधे कार्रवाई करने के अधिकार उनके पास नहीं हैं. उनके अनुसार कार्रवाई के लिए रिपोर्ट आयुक्त स्तर पर भेजी जाती है लेकिन वहा से कोई जवाब नहीं आता ,
आदिवासी विद्यार्थियों के भविष्य के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं. लेकिन जमीनी तस्वीर यह है कि हजारों बच्चे जमीन पर सो रहे हैं, छात्राएं टीन शेड के कमरों में रह रही हैं और सांप-बिच्छू के डर से अपनी सुरक्षा खुद करने को मजबूर हैं. अगर 8,442 विद्यार्थियों को आज भी पलंग उपलब्ध नहीं है, तो 99 करोड़ रुपये के वार्षिक खर्च का वास्तविक लाभ आखिर पहुंच किस तक रहा है? यह सिर्फ आश्रमशालाओं की बदहाली की कहानी नहीं है. यह उन आदिवासी बच्चों की सुरक्षा, सम्मान और भविष्य का सवाल है, जिनके नाम पर सरकारी योजनाएं और करोड़ों रुपये का बजट बनाया जाता है.