बच्चों का स्कूल में जो सबसे अच्छा टाइम होता है वह लंच का समय होता है. अपने दोस्तों के साथ बैठकर खाना खाने का मजा ही अलग होता है. स्कूलों की ओर से कई ऐसे प्रोग्राम चलाए जाते हैं जिसमें न केवल साथ बैठाकर खाना खिलाने को बढ़ावा मिलता है बल्कि फ्री भोजन भी दिया जाता है. भारत में सरकारी स्कूलों के लाखों बच्चों के लिए मिड-डे मील परोसा जाता है लेकिन अगर आपको लग रहा है कि केवल भारत के स्कूलों में ही यह सुविधा मिलती है तो, आप गलत हैं. दुनिया के सबसे विकसित देशों में शामिल अमेरिका में भी करोड़ों बच्चों के लिए स्कूल में भोजन की व्यवस्था की जाती है.
फर्क सिर्फ इतना है कि वहां इसका तरीका और नियम भारत से काफी अलग हैं. दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका में यह व्यवस्था करीब 80 साल पहले शुरू हो गई थी, जबकि भारत में राष्ट्रीय स्तर पर मिड-डे मील योजना 1995 में लागू हुई. अमेरिका में न केवल सरकारी स्कूलों में बल्कि कुछ प्राइवेट स्कूलों में भी यह व्यवस्था लागू की जाती है. कुछ स्कूलों में जहां यह फ्री होते हैं तो कुछ स्कूलों में कम कीमत पर खाना उपलब्ध कराया जाता है. लेकिन भारत और अमेरिका का मॉडल कैसे काम करता है और इनमें सबसे बड़ा अंतर क्या है? आइए समझते हैं.
प्राइवेट स्कूलों में भी मिलती है ये सुविधा
अमेरिका में कुछ प्राइवेट स्कूल अपने लेवल पर भी कैफेटेरिया चलाते हैं, जहां बच्चे खाना खरीद सकते हैं. लेकिन जो प्राइवेट स्कूल सरकारी भोजन कार्यक्रम में शामिल होते हैं, उन्हें नेशनल स्कूल लंच प्रोग्राम (NSLP) जैसी योजनाओं के तहत सहायता मिल सकती है. इसमें बच्चों की आर्थिक स्थिति के आधार पर मुफ्त या कम कीमत वाला भोजन दिया जाता है. यह व्यवस्था भारत से बिल्कुल अलग है. ऐसा इसलिए क्योंकि अमेरिका में स्कूलों में आमतौर पर कैफेटेरिया सिस्टम होता है. बच्चे अपनी पसंद के अनुसार खाना लेते हैं, जैसे फल, दूध, सलाद, सैंडविच या अन्य भोजन. वहीं, भारत में मिड-डे मील योजना के तहत स्कूल में सभी पात्र बच्चों को तय मेन्यू के अनुसार पका हुआ भोजन परोसा जाता है.
अमेरिका में पुराना है ये ट्रेंड?
अमेरिका में स्कूलों में मिलने वाले भोजन को आमतौर पर स्कूल लंच प्रोग्राम के नाम से जाना जाता है. इसकी शुरुआत साल 1946 में नेशनल स्कूल लंच प्रोग्राम (NSLP) के रूप में हुई थी. इसका उद्देश्य था कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को स्कूल में पौष्टिक भोजन मिल सके, ताकि भूख की वजह से उनकी पढ़ाई प्रभावित न हो. वहीं, भारत में राष्ट्रीय स्तर पर मिड-डे मील योजना की शुरुआत 1995 में हुई और बाद में इसे विस्तार दिया गया.
भारत के मिड डे मील से कैसे होता है अलग?
भारत में स्कूलों में बच्चों को खाना देने की योजना का मकसद केवल भूख मिटाना ही नहीं बल्कि कुपोषण को कम करने और स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ाना भी है. केंद्र सरकार की यह योजना अब PM POSHAN के नाम से चल रही है. भारत में सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में बच्चों को स्कूल में ही तैयार किया गया भोजन दिया जाता है. वहीं, अमेरिका में भोजन व्यवस्था ज्यादा कैफेटेरिया आधारित है, जहां बच्चे भोजन विकल्पों में से चुनाव कर सकते हैं.
दोनों के बीच में है ये अंतर
| भारत | अमेरिका |
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सभी पात्र छात्रों के लिए एक जैसा भोजन – सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में तय मेन्यू के अनुसार पका हुआ खाना दिया जाता है. Advertisement |
स्कूलों में कैफेटेरिया होता है, जहां छात्र उपलब्ध विकल्पों में से भोजन चुन सकते हैं. |
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सरकारी स्कूलों पर फोकस – योजना मुख्य रूप से सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के लिए है. |
लेकिन अमेरिका में सरकारी के साथ कुछ प्राइवेट स्कूल भी कई गैर-लाभकारी प्राइवेट स्कूल भी इस कार्यक्रम में भाग लेते हैं. |
| कुपोषण कम करना, स्कूल में नामांकन और उपस्थिति बढ़ाना. |
बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना ताकि वे स्वस्थ रहें और पढ़ाई पर ध्यान दे सकें. |
| सरकारी योजना के तहत पात्र स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को भोजन मिलता है. |
कई जगह परिवार की आय के आधार पर मुफ्त या रियायती भोजन मिलता है, हालांकि कुछ राज्यों और जिलों में सभी छात्रों को मुफ्त भोजन भी दिया जाता है. |
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राष्ट्रीय स्तर पर 1995 में मिड-डे मील योजना शुरू हुई, जिसे अब PM POSHAN कहा जाता है. |
शुरुआत 1946 में लगभग 80 साल से चल रहा है. |