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लेट नाइट और संडे को भी कर रहे हैं काम, लेकिन पैसा नहीं है वजह  

सोशल मीडिया पर आए दिन ऑफिस कल्चर को लेकर तरह-तरह के वीडियो और खबरें सामने आती हैं. बेंगलुरु के रहने वाले एक स्टार्टअप के फाउंडर ने काम से जुड़ी एक अलग कहानी लोगों के सामने रखी है. उन्होंने बताया कि उनके प्रतिद्वंद्वी बन चुके ग्राहक ने अपनी टीम को संडे काम करने के लिए भी प्रोत्साहित किया है. 

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बेंगलुरु के इस कंपनी में लेट नाइट और संडे को भी कर्मचारी कर रहे हैं काम.
बेंगलुरु के इस कंपनी में लेट नाइट और संडे को भी कर्मचारी कर रहे हैं काम.

बोनस और इंसेंटिव से कर्मचारियों को ज्यादा काम करने के लिए प्रेरित करना आम बात है, लेकिन ReferRush के CEO विक्रम पाई ने एक अलग ही अनुभव शेयर किया है. उन्होंने बताया कि एक पूर्व ग्राहक के साथ हुई कथित अनबन के बाद उनकी टीम ने देर रात और रविवार को भी काम करना शुरू कर दिया. विक्रम पाई के मुताबिक, यह पूर्व ग्राहक बाद में उनका प्रतिस्पर्धी बन गया और उसने अपना एक प्रोडक्ट लॉन्च किया.  उनका कहना है कि टीम को तेजी से काम करने के लिए प्रेरित करने की उनकी पिछली कोशिशों में ऐसी प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली थी. 

उनके अनुसार, इस घटना के बाद टीम के लोगों में काम को लेकर अलग तरह की ऊर्जा दिखी और उन्होंने देर रात तक और रविवार को भी काम किया. इस अनुभव ने कर्मचारियों को प्रेरित करने के तरीकों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है. 

सोशल मीडिया पर शेयर किया किस्सा 

उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शेयर कर बताया कि एक ग्राहक ने उनके टीम के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया था. बाद में उसी ग्राहक ने एक प्रतिस्पर्धी प्रोडक्ट बनाने का फैसला किया. पाई ने बताया कि अपनी टीम को तेजी से काम करवाने के लिए उन्होंने कई तरीके अपनाए थे जिनमें बोनस, इंसेंटिव, समय सीमा और इक्विटी शामिल थे लेकिन इनमें से किसी का भी असर नहीं हुआ.

लेकिन उनकी टीम उस ग्राहक से इतनी नाराज थी कि कर्मचारी अब अपनी इच्छा से रात और रविवार को भी काम कर रहे हैं. पाई ने एक कर्मचारी की बातचीत का स्क्रीनशॉट भी शेयर किया. इसमें कर्मचारी ने कहा कि किसी आपात स्थिति को छोड़कर वह अगले तीन हफ्तों तक रविवार को भी काम करेगा.

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वायरल हो गया पोस्ट 

जैसे ही फाउंडर ने पोस्ट सोशल मीडिया पर शेयर किया, इसे लेकर चर्चा शुरू हो गई. लोगों के बीच बहस होने लगी कि क्या गुस्सा और किसी से आगे निकलने की भावना कर्मचारियों को बोनस और दूसरे पारंपरिक इंसेंटिव से ज्यादा काम करने के लिए प्रेरित कर सकती है? कुछ यूजर्स ने पाई की बात को अपने अनुभवों से जोड़कर देखा, जबकि कुछ लोगों ने यह सवाल उठाया कि आखिर वह ग्राहक बाद में कंपनी का प्रतिद्वंद्वी क्यों बन गया.

एक यूजर ने मजाक में कहा कि प्रतिद्वंद्विता से मिली प्रेरणा कर्मचारियों को जरूरत से ज्यादा काम करने के लिए भी प्रेरित कर सकती है. वहीं, एक अन्य यूजर ने पाई से पूछा कि उन्होंने प्रतिद्वंद्वी कंपनी का नाम क्यों नहीं बताया. इस पर पाई ने साफ किया कि वह प्रतिद्वंद्वी कंपनी का नाम सार्वजनिक नहीं करना चाहते हैं. 

हर कोई नहीं था सहमत 

लेकिन इस कहानी से सभी लोग सहमत नहीं थे. इसे लेकर लोगों की अलग-अलग राय है.  कुछ यूजर्स ने पूछा कि अगर वह व्यक्ति पहले कंपनी का ग्राहक था और उसने टीम के साथ बुरा व्यवहार किया था, तो वह बाद में एक प्रतिस्पर्धी उत्पाद कैसे लॉन्च कर सकता है.

वहीं, कुछ लोगों ने यह भी सवाल किया कि क्या प्रतिद्वंद्वी ने वास्तव में इतनी नई सुविधाएं जोड़ी हैं कि रेफररश के कर्मचारियों को रात और रविवार को भी काम करना पड़ा. इन प्रतिक्रियाओं के बाद एक बड़ा सवाल भी सामने आया कि क्या ऐसी प्रतिस्पर्धा लंबे समय तक कर्मचारियों को काम करने के लिए प्रेरित कर सकती है, या फिर टीम का यह उत्साह सिर्फ प्रतिस्पर्धा की वजह से कुछ समय के लिए बढ़ा है?

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कार्यस्थल का सबसे बड़ा सवाल

पाई की पोस्ट को एक मजेदार संस्थापक-किस्से के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि कर्मचारियों को मैनेज करने के तरीके के रूप में. रात और रविवार को काम करने से कुछ समय के लिए काम की गति बढ़ सकती है लेकिन इस तरह की रफ्तार को लंबे समय तक बनाए रखना मुश्किल होता है. फिर भी, यह घटना एक महत्वपूर्ण बात दिखाती है. कर्मचारियों को सिर्फ बोनस, समयसीमा या इक्विटी से ही प्रेरित नहीं किया जाता. गर्व, अपने काम पर अधिकार की भावना, प्रतिस्पर्धा और किसी को गलत साबित करने की इच्छा भी उन्हें प्रेरित कर सकती है. 

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