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क्या अब ईरान में घुसेगी अमेरिका-इजरायल की सेना... खामेनेई के खात्मे के बाद क्या होगा अगला कदम

अभी अमेरिका और इजरायल ने ईरान में ग्राउंड इनवेजन नहीं किया है. हवाई हमला हुआ. नेवल बेस उड़ाए गए. अब जमीनी हमले की बात हो रही है. ट्रंप का फोकस हवाई हमलों से ईरान की सरकार को कमजोर करना है ताकि ईरानी लोग खुद रेजीम चेंज करें. दोनों देशों का मुख्य लक्ष्य न्यूक्लियर प्रोग्राम रोकना और लीडरशिप को हिलाना है, बिना बड़े पैमाने पर सैनिक भेजे.

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जरूरत पड़ने पर प्रमुख इमारतों और संस्थानों पर कब्जा करने के लिए कमांडो फोर्स उतार सकता है अमेरिका और इजरायल. (File Photo: Reuters)
जरूरत पड़ने पर प्रमुख इमारतों और संस्थानों पर कब्जा करने के लिए कमांडो फोर्स उतार सकता है अमेरिका और इजरायल. (File Photo: Reuters)

अभी ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद पूरी दुनिया की नजर इस पर है कि क्या अमेरिकी और इजरायली सैनिक ईरान की जमीन पर उतरेंगे. 28 फरवरी 2026 को शुरू हुए इस हमले में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की घोषणा की और कहा कि यह हमला ईरान की सरकार को बदलने के लिए है. 

विशेषज्ञ कहते हैं कि हवाई हमलों से ही सरकार बदलना मुश्किल है. अगर सैनिक उतारे गए तो यह बड़ा जोखिम होगा. ईरान ने जवाब में कई देशों पर मिसाइलें दागीं लेकिन ज्यादातर रोक ली गईं. अब सवाल यह है कि क्या यह हमला जमीन पर उतरकर जारी रहेगा या सिर्फ हवाई और मिसाइल हमलों तक सीमित रहेगा. 

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अमेरिका और इजरायल का कहना है कि उनका मकसद ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को खत्म करना. सरकार को कमजोर करना है ताकि ईरान के लोग खुद अपनी सरकार बदल सकें. लेकिन इतिहास बताता है कि ऐसे हमलों से अक्सर अराजकता फैलती है. युद्ध  लंबा चलता है.

ग्राउंड इनवेजन की संभावना कितनी?

अभी तक अमेरिका और इजरायल ने साफ कहा है कि वे ईरान में ग्राउंड ट्रूप्स नहीं भेजेंगे. वॉल स्ट्रीट जर्नल और बीबीसी की रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने कहा कि यह हवाई हमला है. अमेरिकी जनता ग्राउंड इनवेजन नहीं चाहती. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सैनिक उतारे गए तो अमेरिका को बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है क्योंकि ईरान की सेना मजबूत है. वह गुरिल्ला वॉरफेयर कर सकती है. 

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US-Israel ground invasion Iran

काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के एक्सपर्ट कहते हैं कि सरकार गिराने के लिए ग्राउंड इनवेजन जरूरी है लेकिन ट्रंप ने ऐसा ऑर्डर नहीं दिया. अगर ऐसा हुआ तो प्लानिंग यह होगी कि पहले हवाई हमलों से ईरान की सेना को कमजोर किया जाए, फिर स्पेशल फोर्सेज भेजकर महत्वपूर्ण जगहों पर कब्जा किया जाए. अमेरिका के पास मिडिल ईस्ट में 30-40 हजार सैनिक हैं लेकिन ईरान जैसे बड़े देश में इनवेजन के लिए लाखों सैनिक चाहिए.

इजरायल की सेना छोटी है इसलिए वह भी ग्राउंड ऑपरेशन में ज्यादा हिस्सा नहीं लेगी. अगर इनवेजन हुआ तो अमेरिका और इजरायल ईरान के बॉर्डर से घुसेंगे, महत्वपूर्ण शहरों जैसे तेहरान पर कब्जा करेंगे और न्यूक्लियर साइट्स को सुरक्षित करेंगे. लेकिन यह बहुत खतरनाक होगा क्योंकि ईरान के प्रॉक्सी ग्रुप्स जैसे हिजबुल्लाह और हूती हमले कर सकते हैं.

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क्या पहले कभी ऐसा हुआ है?

अमेरिका और इजरायल ने पहले कभी किसी देश पर संयुक्त रूप से ग्राउंड इनवेजन नहीं किया. रिपोर्ट्स बताती हैं कि दोनों देशों के बीच मिलिट्री रिलेशन बहुत मजबूत हैं. 1967 के सिक्स-डे वॉर में इजरायल ने अकेले हमला किया लेकिन अमेरिका ने हथियार दिए. 1981 में इजरायल ने इराक के न्यूक्लियर रिएक्टर पर हमला किया लेकिन अमेरिका को पहले नहीं बताया. 

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2003 में अमेरिका ने इराक पर इनवेजन किया लेकिन इजरायल शामिल नहीं था. इजरायल और अमेरिका ने हमेशा हथियार, इंटेलिजेंस और मिसाइल डिफेंस में साथ काम किया है जैसे आयरन डोम सिस्टम. लेकिन कोई जॉइंट ग्राउंड ऑपरेशन नहीं किया है. 1956 के सुएज क्राइसिस में इजरायल ने ब्रिटेन और फ्रांस के साथ मिलकर मिस्र पर हमला किया लेकिन अमेरिका नाराज हो गया था.  

US-Israel ground invasion Iran

इतिहास बताता है कि अमेरिका ने ईरान में 1953 में रेजीम चेंज किया था लेकिन वह सीआईए का गुप्त ऑपरेशन था, कोई मिलिट्री इनवेजन नहीं था. अगर अब ग्राउंड इनवेजन हुआ तो यह पहला मौका होगा जब अमेरिका और इजरायल मिलकर किसी देश की जमीन पर उतरेंगे. विशेषज्ञ कहते हैं कि इससे मिडिल ईस्ट में नया युद्ध छिड़ सकता है.

दोनों देशों का रेजीम चेंज प्लान क्या है?

ट्रंप और नेतन्याहू का प्लान है कि हवाई हमलों से ईरान की सरकार को इतना कमजोर कर दो कि ईरान के लोग खुद बगावत कर दें. ट्रंप ने कहा कि ईरान के लोग अपनी सरकार पर कब्जा कर लें. फॉरेन अफेयर्स मैगजीन की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ईरान के न्यूक्लियर साइट्स, मिसाइल फैक्ट्री और कमांड सेंटर्स पर हमला कर रहा है.

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इजराइल का फोकस लीडरशिप को मारना है जैसे खामेनेई को निशाना बनाया. अगर रेजीम चेंज हुआ तो अमेरिका नई सरकार को सपोर्ट करेगा लेकिन बिना सैनिक भेजे. काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस कहता है कि अमेरिका को ईरान के लोगों को मदद देनी चाहिए लेकिन ग्राउंड फोर्स से नहीं. 

प्लान यह है कि पहले ईरान की सेना को तोड़ो, फिर प्रोटेस्टर्स को हथियार और इंटेलिजेंस दो. लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि हवाई हमलों से रेजीम चेंज नहीं होता, जैसे इराक में 2003 में इनवेजन करना पड़ा. ट्रंप का कहना है कि यह हमला ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को रोकने के लिए है. लेकिन उनका असल मकसद सरकार बदलना है. अगर प्लान फेल हुआ तो ईरान में सिविल वॉर हो सकता है और लाखों शरणार्थी निकलेंगे.

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विशेषज्ञों की राय क्या है?

विशेषज्ञों का मानना है कि ग्राउंड इनवेजन बहुत खतरनाक होगा. अमेरिका को इससे बचना चाहिए.

  • काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के सुजैन मालोनी कहते हैं कि अमेरिका को ईरान में लीडरशिप चेंज के लिए तैयार रहना चाहिए लेकिन एक्टिवली रेजीम चेंज नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे एस्केलेशन हो सकता है.
  • अटलांटिक काउंसिल के एक्सपर्ट कहते हैं कि ट्रंप का प्लान रेजीम चेंज है लेकिन हवाई हमलों से यह मुश्किल है, ग्राउंड फोर्स के बिना सफलता नहीं मिलेगी. 
  • मोहम्मद हाफेज, नेवल पोस्टग्रेजुएट स्कूल के प्रोफेसर कहते हैं कि ट्रंप को रेजीम चेंज के लिए पूरी तरह जाना पड़ेगा लेकिन बिना सैनिकों के यह संभव नहीं.
  • चैथम हाउस के सनम वकील कहते हैं कि हवाई हमलों से रेजीम चेंज नहीं होता, यह लंबा युद्ध बन सकता है जो ट्रंप नहीं चाहते.
  • इलिया सोमिन, जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कहते हैं कि यह युद्ध असंवैधानिक है क्योंकि कांग्रेस ने मंजूरी नहीं दी.ट्रिटा पारसी, क्विंसी इंस्टीट्यूट के कहते हैं कि यह युद्ध सरकार का पतन और सिविल वॉर ला सकता है. 

कुल मिलाकर विशेषज्ञों की राय है कि ग्राउंड इनवेजन से बचना चाहिए क्योंकि इससे मिडिल ईस्ट में अराजकता फैलेगी और अमेरिका को बड़ा नुकसान होगा.

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