भारत की समुद्री सुरक्षा अब सिर्फ पारंपरिक सैन्य चुनौतियों तक सीमित नहीं रह गई है. ड्रग्स और हथियारों की तस्करी, अवैध प्रवासन, समुद्री आतंकवाद और ग्रे जोन वॉरफेयर जैसी चुनौतियां समुद्री सुरक्षा के लिए नए खतरे पैदा कर रही हैं. आजतक के ‘सुरक्षा सभा’ के सेशन ‘समुद्र का सुरक्षा कवच’ में इंडियन कोस्ट गार्ड के डायरेक्टर जनरल परमेश शिवमणि ने समुद्री सुरक्षा से जुड़े इन अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की, उन्होंने बताया कि विशाल समुद्री क्षेत्र की निगरानी से लेकर ड्रग्स तस्करी रोकने, तटीय सुरक्षा मजबूत करने, समुद्र में फंसे लोगों की जान बचाने और समुद्री पर्यावरण की रक्षा तक भारतीय तटरक्षक की जिम्मेदारियां लगातार बढ़ रही हैं.
परमेश शिवमणि ने कहा कि भारत के समुद्री क्षेत्र का इस्तेमाल केवल वैध गतिविधियों के लिए सुनिश्चित करना भारतीय तटरक्षक की अहम जिम्मेदारी है. समुद्र में तैनात जहाजों और एयरक्राफ्ट के जरिए लगातार सर्विलांस किया जाता है और संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखी जाती है.
उन्होंने बताया कि हाल में बड़ी मात्रा में नशीले पदार्थों की जब्ती की गई है. करीब 66,000 किलोग्राम मादक पदार्थ पकड़े जाने का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इसकी भारतीय बाजार में कीमत लगभग ₹600 करोड़ आंकी गई थी, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत इससे दो से तीन गुना तक हो सकती है.
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1993 और 26/11 ने दिखाई समुद्री सुरक्षा की कमजोरी
समुद्र के रास्ते आतंकवाद और हथियारों की तस्करी के खतरे का जिक्र करते हुए शिवमणि ने 1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट और 26/11 मुंबई आतंकी हमले का उदाहरण दिया, उन्होंने कहा कि 1993 में हथियार और गोला-बारूद समुद्री रास्ते से देश में पहुंचाए गए थे, इसके बाद 2008 में मुंबई आतंकी हमले में भी आतंकवादी समुद्र के रास्ते भारत में दाखिल हुए.
इन घटनाओं के बाद तटीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई स्तरों पर काम किया गया. कोस्टल सिक्योरिटी स्कीम के तहत भारतीय तटरक्षक और तटीय राज्यों को बोट्स, क्राफ्ट्स और अन्य संसाधन उपलब्ध कराए गए. अब इस व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए कोस्टल सिक्योरिटी स्कीम के अगले चरणों में बड़े जहाजों, रडार और टेक्नोलॉजी आधारित सिस्टम को शामिल किया जा रहा है.
ग्रे जोन वॉरफेयर को लेकर शिवमणि ने कहा कि यह पीस और कॉन्फ्लिक्ट के बीच का वह क्षेत्र है, जिसका इस्तेमाल भारत विरोधी ताकतें देश को नुकसान पहुंचाने के लिए कर सकती हैं, इसमें सीधे युद्ध के बजाय ड्रग्स, हथियार, अवैध गतिविधियों और दूसरे गैर-पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है. उन्होंने बताया कि भारतीय तटरक्षक के करीब 50-55 जहाज लगातार सर्विलांस मिशन पर रहते हैं, जबकि 10-15 एयरक्राफ्ट एरियल सर्विलांस करते हैं, इसके अलावा कोस्टल सर्विलांस नेटवर्क के जरिए समुद्री गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जाती है.
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रडार नेटवर्क बना बड़ा फोर्स मल्टीप्लायर
शिवमणि के मुताबिक, तटीय निगरानी को मजबूत करने में रडार नेटवर्क और टेक्नोलॉजी की भूमिका बेहद अहम है, कोस्टल सर्विलांस नेटवर्क के पहले चरण में 46 रडार स्टेशन पूरी तरह ऑपरेशनल हैं, दूसरे चरण में लगभग 31 अतिरिक्त रडार स्टेशन शामिल किए जा रहे हैं, जिनमें से अधिकांश ऑपरेशनल हो चुके हैं. उन्होंने कहा कि ये रडार स्टेशन समुद्री क्षेत्र में मौजूद जहाजों और दूसरी गतिविधियों पर नजर रखने की क्षमता को बढ़ाएंगे और तटरक्षक के लिए एक महत्वपूर्ण फोर्स मल्टीप्लायर साबित होंगे.
छोटी फिशिंग बोट्स की भी हो रही निगरानी
समुद्र में बड़े टैंकर या जहाजों की पहचान अपेक्षाकृत आसान होती है, लेकिन छोटी फिशिंग बोट्स और ट्रॉलर्स की निगरानी ज्यादा चुनौतीपूर्ण है. इस बारे में शिवमणि ने बताया कि कोस्टल सर्विलांस नेटवर्क में डिसीजन सपोर्ट सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जा रहा है, इस तकनीक की मदद से यह पता लगाने में मदद मिलती है कि कोई बोट अपने निर्धारित उद्देश्य के मुताबिक चल रही है या नहीं. संदिग्ध गतिविधि सामने आने पर तटरक्षक बोर्डिंग ऑपरेशन के जरिए उस जहाज या बोट की जांच कर सकता है. उन्होंने कहा कि फिजिकल बोर्डिंग बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि संबंधित जहाज या बोट किसी तरह की आपराधिक या संदिग्ध गतिविधि में शामिल तो नहीं है.
नशामुक्त भारत के लिए तीन स्तरों पर काम
ड्रग्स तस्करी रोकने के लिए भारतीय तटरक्षक की रणनीति के बारे में शिवमणि ने बताया कि नशामुक्त भारत के लक्ष्य के तहत तीन प्रमुख क्षेत्रों पर फोकस किया जा रहा है. पहला, तटरक्षक के संबंधित जिलों और स्टेशनों में एंटी-नारकोटिक्स सेल स्थापित कर मौजूदा व्यवस्था को मजबूत किया गया है. दूसरा, मित्र देशों के साथ सूचना साझा करने की व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है. भारत के जिन देशों के साथ सहयोग और समझौते हैं, उन्हें भी इस नेटवर्क में शामिल किया जा रहा है, ताकि किसी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तेजी से साझा हो और उस पर समय रहते कार्रवाई की जा सके.
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तीसरा, भारत के समुद्री क्षेत्र का इस्तेमाल केवल वैध गतिविधियों के लिए सुनिश्चित करने पर लगातार जोर दिया जा रहा है. भारत के विशाल समुद्री क्षेत्र और लंबी तटरेखा की निगरानी के लिए तटरक्षक को लगातार अपनी क्षमताएं बढ़ानी पड़ रही हैं. शिवमणि ने बताया कि सरकार की ओर से तटरक्षक की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए हेवी वेदर सर्विलांस वेसल्स, इमरजेंसी रिस्पॉन्स वेसल्स और स्पेशल रोल वेसल्स जैसे प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराए जा रहे हैं.
इन बड़े वेसल्स के शामिल होने से सर्विलांस क्षमता और समुद्र में ऑपरेशन करने की क्षमता बढ़ेगी. साथ ही बेहतर उपकरण और क्रू के लिए बेहतर सुविधाएं भी मिलेंगी. शिवमणि ने कहा कि किसी भी मशीन के पीछे काम करने वाला इंसान सबसे महत्वपूर्ण है, इसलिए क्रू कम्फर्ट भी ऑपरेशनल क्षमता का अहम हिस्सा है.
समुद्र में जिंदगी बचाना भी बड़ी जिम्मेदारी
भारतीय तटरक्षक की भूमिका सिर्फ समुद्री सीमाओं की निगरानी तक सीमित नहीं है. समुद्र में संकट में फंसे लोगों को बचाना भी उसकी अहम जिम्मेदारी है, शिवमणि ने बताया कि भारत में तीन Maritime Rescue Coordination Centres हैं- मुंबई, चेन्नई और श्रीविजयपुरम में. समुद्र में किसी दुर्घटना की सूचना मिलने पर इन केंद्रों में से संबंधित केंद्र से सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया जाता है. स्थिति के अनुसार जहाज या एयरक्राफ्ट को मौके पर भेजा जाता है और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त संसाधन भी लगाए जाते हैं.
उन्होंने बताया कि भारतीय तटरक्षक ने अपनी स्थापना से अब तक 11,867 लोगों की जान बचाई है. यानी औसतन हर दिन लगभग एक जीवन बचाने के बराबर यह जिम्मेदारी निभाई जा रही है.
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ब्लू इकोनॉमी और समुद्री पर्यावरण की सुरक्षा
समुद्री सुरक्षा का एक अहम हिस्सा समुद्री संसाधनों और पर्यावरण की रक्षा भी है. शिवमणि ने कहा कि भारत की ब्लू इकोनॉमी के लिए समुद्री संपदा, मछली और समुद्री जीवन बेहद महत्वपूर्ण हैं. भारतीय तटरक्षक की जिम्मेदारी है कि भारतीय समुद्री क्षेत्र में अवैध फिशिंग और पोचिंग को रोका जाए और समुद्री संसाधनों का अवैध दोहन न हो. उन्होंने कहा कि लगातार सक्रिय निगरानी के कारण भारतीय जलक्षेत्र में पोचिंग की घटनाएं अब लगभग नगण्य स्तर पर हैं. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कभी-कभार होने वाली घटनाओं की आवृत्ति पहले की तुलना में काफी कम हुई है.
AI से संदिग्ध जहाजों पर नजर
बढ़ते समुद्री ट्रैफिक के बीच हर जहाज और बोट पर नजर रखना आसान नहीं है. ऐसे में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स भारतीय तटरक्षक की मदद कर रहे हैं, शिवमणि ने बताया कि कंट्रोल सेंटर में AI आधारित प्रेडिक्टिव एनालिटिकल टूल्स का इस्तेमाल किया जा रहा है. उदाहरण के तौर पर अगर कोई जहाज मिडिल ईस्ट के किसी पोर्ट से निकलकर भारत के पश्चिमी तट की ओर आ रहा है और रास्ते में अपनी निर्धारित दिशा से हटता है, अचानक रुकता है या उसके मूवमेंट में असामान्य बदलाव आता है, तो टेक्नोलॉजी इसकी पहचान करने में मदद करती है.
इससे यह पता लगाने में भी मदद मिल सकती है कि जहाज ने कब अपना इंजन बंद किया, कब दोबारा शुरू किया और उसके मूवमेंट में क्या बदलाव आए. ऐसे डेटा के आधार पर संदिग्ध गतिविधियों की पहचान कर आगे की कार्रवाई की जा सकती है.
समुद्री सुरक्षा अब सिर्फ सीमा की सुरक्षा नहीं
भारतीय तटरक्षक की बढ़ती भूमिका यह दिखाती है कि समुद्री सुरक्षा अब केवल सीमा की निगरानी का विषय नहीं रह गई है. ड्रग्स तस्करी, आतंकवाद, ग्रे जोन वॉरफेयर, अवैध फिशिंग, समुद्री दुर्घटनाओं और पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए एक मजबूत और टेक्नोलॉजी-आधारित समुद्री सुरक्षा तंत्र की जरूरत है.
परमेश शिवमणि के मुताबिक, आधुनिक तकनीक, बेहतर सर्विलांस नेटवर्क, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और पर्याप्त संसाधनों के साथ भारतीय तटरक्षक लगातार अपनी क्षमता बढ़ा रहा है. इसका मकसद साफ है भारत के समुद्री क्षेत्र को सुरक्षित रखना और समुद्र से जुड़े हर वैध आर्थिक, सामरिक और मानवीय हित की रक्षा करना.
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