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कारगिल से ऑपरेशन सिंदूर तक.. कैसे बदली युद्ध की तकनीक, पूर्व एयर मार्शल ने बताया

आज के युद्ध में सिर्फ हथियारों की ताकत ही नहीं, बल्कि रियल-टाइम इन्फॉर्मेशन, नेटवर्किंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सटीक निशाने की क्षमता भी निर्णायक भूमिका निभाती है.

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एयर मार्शल नर्मदेश्वर तिवारी (सेवानिवृत्त)
एयर मार्शल नर्मदेश्वर तिवारी (सेवानिवृत्त)

आजतक के कार्यक्रम ‘सुरक्षा सभा’ के सेशन ‘वर्दी, वीरता, विजय’ में पूर्व वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ, एयर मार्शल  नर्मदेश्वर तिवारी ने कारगिल युद्ध से लेकर ऑपरेशन सिंदूर तक युद्ध के बदलते तौर-तरीकों और तकनीक की भूमिका पर विस्तार से बात की. उन्होंने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना के सामने किस तरह की चुनौतियां थीं और लेजर गाइडेड बम जैसी तकनीक ने किस तरह युद्ध का रुख बदलने में मदद की. उन्होंने यह भी बताया कि आज के युद्ध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), नेटवर्किंग और रियल-टाइम इन्फॉर्मेशन किस तरह निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं.

कारगिल युद्ध के दौरान नर्मदेश्वर तिवारी स्क्वाड्रन लीडर थे, उन्होंने बताया कि उस समय भारतीय वायुसेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऊंची पहाड़ियों पर मौजूद छोटे-छोटे टारगेट को सटीक तरीके से निशाना बनाना था, उन्होंने कहा कि शुरुआती दो-तीन दिनों में भारतीय वायुसेना ने कुछ विमान खोए थे, पाकिस्तानी सैनिक ऊंची चोटियों पर बैठे थे और वहां से मिसाइलें भी दाग रहे थे. ऐसे में भारतीय विमानों के लिए कम ऊंचाई पर जाकर बमबारी करना जोखिम भरा था. दूसरी तरफ, अधिक ऊंचाई से बम गिराने पर छोटे टारगेट को देखना और उन्हें सटीक तरीके से निशाना बनाना चुनौती थी.

उन्होंने बताया कि कारगिल क्षेत्र में औसतन करीब 15 हजार फीट की ऊंचाई थी. मिसाइलों से सुरक्षित रहने के लिए भारतीय विमानों को करीब 25 से 30 हजार फीट की ऊंचाई से हमला करना पड़ता था, लेकिन उस ऊंचाई से इतने छोटे टारगेट पर हथियारों का इस्तेमाल पहले उस तरह से परीक्षण नहीं किया गया था. कारगिल में टारगेट बेहद छोटे थे, पहाड़ों पर बने बंकर और सैन्य ठिकाने ऐसे स्थानों पर थे, जहां बम के कुछ मीटर इधर-उधर गिरने से भी उसका प्रभाव पूरी तरह बदल सकता था. यदि बम 100 मीटर भी इधर-उधर गिरता तो वह घाटी में जा सकता था और उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता. दूसरी ओर, अगर वह गलत दिशा में गिरता तो अपने ही सैनिकों के लिए खतरा पैदा कर सकता था. इसलिए इस पूरे ऑपरेशन में सटीकता सबसे महत्वपूर्ण थी. यही वह जगह थी, जहां लेजर गाइडेड बम और लेजर डिजाइनशन तकनीक बेहद महत्वपूर्ण साबित हुई.

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लेजर गाइडेड बम ने बदला खेल

एयर मार्शल तिवारी ने बताया कि उस समय जिस तकनीक पर काम किया जा रहा था, वह पहले से विकास के चरण में थी. लेजर डिजाइनशन और लेजर गाइडेड बम की तकनीक पर करीब दो साल से काम चल रहा था, उन्होंने बताया कि इस तकनीक की मदद से विमान से टारगेट को कई गुना जूम करके देखा जा सकता था, इसके बाद टारगेट पर लेजर डाला जाता था और लेजर गाइडेड बम उसी लेजर बीम को फॉलो करते हुए सटीक निशाना साधता था.

तिवारी ने कारगिल के अपने अनुभव को याद करते हुए कहा कि 1999 में वे द्रास में बैठकर टाइगर हिल की ओर देख रहे थे. भारतीय लड़ाकू विमान वहां पहुंच रहे थे, बमबारी कर रहे थे और बेहद सटीक तरीके से अपने टारगेट को निशाना बना रहे थे.

कारगिल से ऑपरेशन सिंदूर तक पहुंची तकनीक

एयर मार्शल तिवारी ने कारगिल और ऑपरेशन सिंदूर के बीच तकनीकी बदलाव की तुलना करते हुए कहा कि दोनों युद्धों में तकनीक की भूमिका महत्वपूर्ण रही, लेकिन पिछले कुछ दशकों में भारतीय वायुसेना की क्षमताओं में बड़ा बदलाव आया है. उन्होंने बताया कि पिछले 10 से 15 वर्षों में कई महत्वपूर्ण क्षमताएं विकसित की गई हैं. इनमें इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) प्रमुख है, उन्होंने कहा कि इस सिस्टम की क्षमता को विकसित करने की प्रक्रिया दो दशक से भी अधिक समय से चल रही थी और ऑपरेशन सिंदूर में इसकी उपयोगिता देखने को मिली.

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उन्होंने बताया कि अब सेना और नौसेना भी इसी तरह की क्षमताओं को विकसित कर रही हैं और भविष्य में तीनों सेनाओं के सिस्टम को एक साझा नेटवर्क में जोड़ा जा सकता है. तिवारी के मुताबिक, नेटवर्किंग का सबसे बड़ा फायदा यह है कि सभी रडार और हथियार प्रणालियां आपस में जुड़ जाती हैं,. इससे एक कॉमन एयर पिक्चर और कॉमन सिस्टम पिक्चर तैयार होती है. इसका मतलब है कि अलग-अलग स्तरों पर मौजूद कमांडरों और मुख्यालयों को एक ही समय में एक जैसी जानकारी मिलती है. इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होती है और युद्ध के मैदान में बेहतर तालमेल स्थापित होता है.

उन्होंने कहा कि आज का युद्ध मूल रूप से इन्फॉर्मेशन का युद्ध है, जिसके पास सही जानकारी है और जो उस जानकारी को तेजी से इस्तेमाल करके सही निर्णय ले सकता है, वह अपने प्रतिद्वंद्वी से आगे रह सकता है.

AI बताएगा सामने क्या खतरा है?

युद्ध में बढ़ती जानकारी और डेटा के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका पर बात करते हुए तिवारी ने कहा कि IACCS में भी कई AI मॉड्यूल काम करते हैं, उन्होंने बताया कि रडार पर किसी खतरे की पहचान सिर्फ एक ‘ब्लिप’ के रूप में होती है. AI आधारित सिस्टम यह समझने में मदद कर सकते हैं कि वह ब्लिप वास्तव में क्या है एक लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, ट्रांसपोर्ट विमान, क्रूज मिसाइल या बैलिस्टिक मिसाइल.

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इसके अलावा सिस्टम उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह भी अनुमान लगाने में मदद कर सकता है कि संबंधित हथियार या विमान किस क्षेत्र को निशाना बना सकता है. इससे कमांडर को पहले से चेतावनी मिलती है और उसके पास उपलब्ध हथियार प्रणालियों में से सबसे प्रभावी विकल्प चुनने में मदद मिलती है. उन्होंने कहा कि AI का उद्देश्य इंसानों को हटाना नहीं है, बल्कि उनकी क्षमता को सप्लीमेंट और कॉम्प्लीमेंट करना है. यानी AI इंसानों की मदद करेगा, उनकी जगह नहीं लेगा.

ऑपरेशन सिंदूर में रियल-टाइम इन्फॉर्मेशन बनी ताकत

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की ओर से ड्रोन और मिसाइलों के इस्तेमाल का जिक्र करते हुए  उन्होंने कहा कि नेटवर्क आधारित सिस्टम ने भारतीय सेना को रियल-टाइम जानकारी उपलब्ध कराने में मदद की. सिस्टम यह आकलन करने में मदद करता है कि खतरा कहां से आ रहा है, उसका प्रोफाइल क्या है और उसे रोकने के लिए कौन-सी हथियार प्रणाली ज्यादा प्रभावी होगी, इससे कमांडर तेजी से निर्णय ले सकता है. उन्होंने कहा कि भारतीय सिस्टम ने इस तरह के खतरों के खिलाफ प्रभावी ढंग से काम किया और कई मिसाइलों और हथियारों को इंटरसेप्ट किया गया.

मोबाइल सिस्टम और AI से दुश्मन की स्थिति का आकलन आसान

तिवारी ने यह भी बताया कि आज के युद्ध में हथियार प्रणालियों का मोबाइल होना एक बड़ी चुनौती है. स्थिर सिस्टम को निशाना बनाना अपेक्षाकृत आसान होता है, लेकिन मोबाइल सिस्टम लगातार अपनी लोकेशन बदलते रहते हैं. ऐसे में अलग-अलग स्रोतों से मिलने वाली खुफिया जानकारी को एक साथ जोड़ना बेहद जरूरी हो जाता है. AI आधारित टूल्स इस जानकारी को एकत्रित और विश्लेषित करके दुश्मन के ऑर्डर ऑफ बैटल को समझने में मदद कर सकते हैं.

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उन्होंने कहा कि AI की मदद से कमांडर को युद्ध के मैदान की ज्यादा स्पष्ट तस्वीर मिलती है और वह तेजी से और ज्यादा सटीक निर्णय ले सकता है. युद्ध में सबसे बड़ी समस्या कई बार जानकारी की कमी होती है.  कारगिल युद्ध का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उस समय भारतीय पक्ष के पास शुरुआत में पूरी जानकारी नहीं थी कि घुसपैठ कितने बड़े स्तर पर हुई है, कहां-कहां हुई है, वहां कितने लोग हैं और उनके पास किस तरह के हथियार हैं.

आज तकनीक और नेटवर्किंग के कारण ऐसी जानकारी को ज्यादा तेजी और बेहतर तरीके से एकत्रित और विश्लेषित किया जा सकता है, उन्होंने कहा कि आने वाले युद्धों में सूचना की गति, उसकी सटीकता और उस पर आधारित निर्णय लेने की क्षमता बेहद महत्वपूर्ण होगी, जिसके पास सही जानकारी होगी और जो उससे तेज और सही निर्णय ले पाएगा, वही युद्ध के मैदान में बढ़त बनाए रखेगा.
 

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