भारतीय खुफिया एजेंसियों को मिली जानकारी के अनुसार पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस यानी ISI हमास से जुड़ी नेटवर्क और गाजा संघर्ष का इस्तेमाल करके जम्मू-कश्मीर में अपने आतंक तंत्र को फिर से सक्रिय करने की कोशिश कर रही है.
इंडिया टुडे को मिले इनपुट्स में हमास से जुड़ी प्रचार सामग्री, पाकिस्तान आधारित आतंकी समूहों, छिपे हुए हथियारों और स्थानीय युवाओं को कट्टर बनाने के प्रयासों के संभावित मेलजोल का जिक्र है. आकलन के अनुसार पाकिस्तान हमास की ऑपरेशन एक्टिविटी की स्टडी कर रहा है. उन्हें भारत के खिलाफ सक्रिय समूहों के लिए अनुकूलित करने की कोशिश में है.
खुफिया आकलन के मुताबिक आईएसआई लश्कर-ए-तैयबा के पंजाबी गुट के कार्यकर्ताओं को हमास से जुड़ी एक्टिविटी से जानकारी दिलाने की कोशिश कर रही है. इनमें कॉर्डिनेटेड घुसपैठ, मोबाइल लॉजिस्टिक्स और शहरी हमले की तकनीकें शामिल हैं.
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इनपुट्स में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान आधारित समूह समुद्री अभियानों जैसे क्षेत्रों में हमास के कार्यकर्ताओं से पारस्परिक अनुभव लेने की कोशिश कर सकते हैं. यह रणनीति पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर ज्यादा संगठित और आधुनिक आतंकी तरीकों को अपनाने की ओर इशारा करती है.

रावलकोट में महत्वपूर्ण बैठक
खुफिया जानकारी में पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर के रावलकोट को महत्वपूर्ण मंच के रूप में चिन्हित किया गया है. 5 फरवरी 2025 को रावलकोट में कश्मीर और हमास के नेतृत्व वाले गाजा संघर्ष को लेकर एक सम्मेलन आयोजित किया गया था. इसमें हमास से जुड़े लोग लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के प्रतिनिधियों के साथ नजर आए. इस तरह की बैठकें दोनों पक्षों के बीच सहयोग बढ़ाने और अनुभव साझा करने का माध्यम बन सकती हैं.
भारतीय खुफिया एजेंसियों के अनुसार यह रणनीति ठंडे पड़े नेटवर्क को फिर से एक्टिव करने और ऑनलाइन कट्टरपंथ फैलाने पर भी केंद्रित है. गाजा संघर्ष के भावनात्मक प्रभाव का इस्तेमाल करके युवाओं तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है.
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सुरक्षा एजेंसियां खास तौर पर सोशल मीडिया, धार्मिक मंचों और प्रचार सामग्री पर नजर रख रही हैं जो आतंकवाद को राजनीतिक और सामाजिक शिकायतों का जवाब बताती हैं. युवाओं को गुमराह करके आतंकी गतिविधियों में शामिल करने की यह कोशिश चिंता का विषय है.
तुर्की में बनी पिस्तौल की मौजूदगी
इनपुट्स में जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकियों के बीच तुर्की मूल की 9 मिमी जिगाना पिस्तौलों का भी जिक्र है. ये छोटी और आसानी से छिपने वाली पिस्तौलें भूमिगत ऑपरेटिव्स द्वारा इस्तेमाल की जा रही हैं क्योंकि पारंपरिक हथियारों की तुलना में इन्हें छिपाना आसान है.

सुरक्षा बलों ने पहले भी श्रीनगर और पूंछ-राजौरी क्षेत्र में तुर्की में बनी पिस्तौलें बरामद की हैं. 2023-24 के अभियानों में पुंछ-राजौरी सेक्टर के आतंकी ठिकानों से ऐसी कॉम्पैक्ट फायरआर्म्स बरामद हुई थीं. हल्के हथियारों की उपलब्धता छोटे आतंकी सेल्स को कठिन इलाकों में आसानी से घूमने और लॉजिस्टिक्स का बोझ कम करने में मदद कर रही है.
आकलन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आईएसआई पाक अधिकृत कश्मीर में आतंक ढांचे पर ज्यादा नियंत्रण हासिल करने की कोशिश में हो सकती है. इससे पाकिस्तानी खुफिया तंत्र पारंपरिक स्थानीय नेटवर्क पर निर्भरता कम कर सकता है जो ऐतिहासिक रूप से आतंकी गतिविधियों में शामिल रहे हैं. यह बदलाव आतंक तंत्र को और केंद्रीकृत तथा नियंत्रित बनाने की दिशा में हो सकता है.
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भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है
भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता की बात आईएसआई समर्थित आतंक ढांचे, हमास से जुड़ी प्रचार सामग्री, ऑनलाइन कट्टरपंथ और आसानी से छिपने वाले हथियारों का संभावित संयोजन है. खुफिया आकलन के अनुसार तत्काल उद्देश्य पश्चिम एशियाई संघर्ष से कहानियां और रणनीतियां आयात करके जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के समर्थन तंत्र को फिर से खड़ा करना हो सकता है.
ये घटनाएं याद दिलाती हैं कि सीमा पार से आतंक को बढ़ावा देने की कोशिशें नए रूप में जारी हैं. भारतीय एजेंसियां इन इनपुट्स के आधार पर अपनी रणनीति को और मजबूत कर रही हैं ताकि किसी भी संभावित खतरे को समय रहते रोका जा सके. आधिकारिक जांच और निगरानी जारी है तथा स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है.